Saturday, July 25, 2020

कम खर्च करना ही एक नई जीवन पद्दति की मांग है


कम खर्च करना ही एक नई जीवन पद्दति की मांग है
पुरे विश्व में कोविद 19 संकट के शुरू होने के पश्चात अंग्रेजी का दो नए शब्द इजाद हुए l न्यु नार्मल(नया सामान्य), जिसके मायने है कि कोविद संकट के पश्चात चलने वाली जिंदगी और उसके नए नियम l शायद ही किसी को पता था कि जीवन में कुछ ऐसा बड़ा संकट आएगा, जिसमे हर क्षेत्र में उथल-पुथल मच जाएगी और मानव और जीव-जंतु अपने अस्तित्व के लिए दुबरा संघर्ष करते हुए दिखाई देंगे l इस पृथ्वी के अस्तित्व के आने के पश्चात, पिछले पचास करोड़ वर्षों में, इसने पांच बार अपना संपूर्ण विनाश देखा है, जो कि हिम युग के पहले के युग से शुरू हो कर अभी के ‘छठवे विलुप्त’ होने की कगार पर है l कोविद संकट इसमें एक कड़ी है l पर हर बार पृथ्वी दुबारा से हरी-भरी हो कर उठ खड़ी होती है l इसमें जीवन के अति सूक्ष्म कण मौजूद है कि वें दुबारा जीवन से भर जाते हैं l यह बात तो तय है कि कोविद संकट के पश्चात हमारी जिंदगी पहले जैसी नहीं होगी l कई चीजे बदल जाएगी, जिसमे रहन-सहन के नए तरीके और जद्दोजहेद आधारित जीवन पद्दति होगी l यह माना जा रहा है कि कम खर्च करना और छोटी छोटी खुशिया ढूँढना अब नई सदी की मांग बन गयी हैं l नया सामान्य अब वो सामान्य नहीं है, जो उपभोक्तावादी संस्कृति पर टिका हुवा था l तीज-त्यौहार, शादी और अन्य समारोह अपनी परंपरागत तौर–तरीके को खोते हुए एक नए क्षतिज पर चढ़ गए है, जिसमे मार्केटिंग की चासनी से लिपटे हुए संस्कार उसके नए रक्षक बन गए है l अत्याधिक खर्च और दिखावे से त्रस्त माध्यम वर्ग और निम्न माध्यम वर्ग को कई त्योहार बोझ से लगने लगे है l इतना ही नहीं, शादियों में जरुरत से ज्यादा दिखावे ने लोगों के बजट को बुरी तरह से बिगाड़ कर रख दिया है l एक नए सामाजिक परिवेश की सृष्टि हो गयी है, जिसे मध्यम वर्ग नकारने के लिए तैयार है, पर उपभोक्तावादी संस्कृति उसे बार बार ऐसा करने से रोक रही है l जब देश में लॉकडाउन शुरू हुवा था, तब ऐसी सैकड़ो शादियों के महंगे रिसेप्शन कैंसिल हो गए थे, जिनमे हजारों के तादाद में मेहमान बुलाये गए थें l कई शादियाँ आगे की तिथि पर पुनर्निर्धारित हो गयी थी l लॉकडाउन के दौरान हमने कईयों की बारात जाते देखा, जिसमे कुल बीस लोग ही शामिल थे l शायद ‘नया सामान्य’ युग में एक सामान्य शादी ही एक जरुरत बन गयी है l मेहमानों को नहीं बुलाये गए, और किसी को कोई आपत्ति भी नहीं हैं l ऐसा इसलिए हुवा, क्योंकि समय की मांग है l अब इस नए सामान्य के दौर में तीज त्यौहार और मंगल को किस तरह से मनाये, इसके तरीके भी हमे ही खोजने हैं l कोविद एक अवसर बन सकता है, एक सामाजिक बदलाव का और एक नए समाज सुधार का l इसमें किसी दल संगठन की आवशयकता नहीं है, खुद ही हम इस नए अवसर का साक्षी बन, कल्पना के घोड़ों को दौड़ना है, जिससे सचमुच उत्सव की तरह लगे हमारे तीज त्यौहार l सभी लोग एक खुली हवा में सांस ले सके l जिनके पास कम है, वे भी और जिनके पास भरपूर है, वे भी l
स्नान, दान, परिमार्जन, पुण्यार्जन और वरण हमारे दर्शन से उठाये हुए कुछ अवसर है, जिनको हम अपनी संस्कृति का एक मुख्य अंग मानते आये हैं l कोविद के समय में सभी त्योहारों को घरों से मानाने पर मजबूर है l शादियों के मामले में स्थितियां थोड़ी भिन्न हैं l जब आमदनी के साधन संतुलित हो गए है, ऐसे में महंगे आयोजन की कल्पना करना चाँद को हाथ से पकड़ने जैसा हैं l एक प्रस्ताव आया है कि वर और वधु, दोनों पक्षों की आपसी सहमती से, शादी का आयोजन एक ही दिन में संपन्न हो, दिन में शादी और शाम को घर के लोगों के बीच पार्टी l प्रस्ताव में इसलिए दम है , क्योंकि शादी सप्तपदी और मंत्रोच्चारों के बीच संपन्न होने वाली क्रिया है, जिसको बड़ी सिद्दत से निभाया जाता है l दूसरी रस्मों को छोटा करके उनमे आवश्यक बदलाव किया जा सकता है l तभी हम यह कह सकते है कि हमने नए समान्य की और एक सार्थक कदम उठाया है l शादी विवाह पर इस चर्चा को करने के पीछे उद्देश्य यह है कि एक नई पहल आजकल के पढ़े-लिखे शिक्षित लोग करना चाहतें है l यह चर्चा इस लिए भी जरुरी है क्योंकि, पानी अब सिर से उपर चला गया है l माध्यम वर्ग अब त्रस्त हो कर बदलाव की उम्मीद कर रहा है l


Friday, July 3, 2020

पहले तो एक बार विरोध करना ही है


पहले तो एक बार विरोध करना ही है
कोरोना काल के दौरान तमाम तरह की विचलित करने वाली ख़बरें लगातार सोसिएल मीडिया पर छाई रहती है l मजदुर, मूल्यवृद्धि, घरेलु हिंसा, बलात्कार, इत्यादि l विपक्ष लगातार हमले कर रहा है l कभी चीन के मामले को लेकर तो कभी निजीकरण के निर्णय पर l असम में बाघजान में तेल के कुएं में लगी हुई आग अभी बुझी हुइ नहीं है कि एक नए मसले में यहाँ पर विरोध की गति पकड़ ली है l असम में मध्यम, लघु और शुक्ष्म उद्द्योग लगाने के लिए अब तीन वर्षों के लिए किसी भी तरह के अनुज्ञापत्र की जरुरत नहीं होगी l इस नए अध्यादेश के आने से दुबारा से व्यापारियों के विरुद्ध जहर उगला जा रहा हैं l खासकरके जातिवादी सगठनों को यह लगने लगा है कि असम में बड़े अनासमिया व्यापरियों को लाभ पहुचने के लिए इस अध्यादेश को पारित किया गया है l जबकि उद्द्योग मंत्री ने साफ़ कर दिया है कि कोरोना संकट के दौरान लौट कर वापस आये स्किल्ड लोगों को स्वरोजगार पाने के लिए एक सुविधा प्रदान की गयी है l पर सरकार के इस व्यक्तव्य से कोई भी यकीन नहीं कर रहा हैं और व्यापरियों के विरुद्ध लगातार बयानबाजी हो रही है l कुछ संगठन इसे असम समझोते की 6 नंबर दफा के विरुद्ध बता रहें है तो कुछ इसे असमिया जातिविरोधी अध्यादेश करार दे रहें हैं l मजे की बात है कि अध्यादेश अभी लागु भी नहीं हुवा है कि विरोध शुरू हो गया है l असम में उद्द्योग लगाना इसलिए सहज नहीं है क्योंकि यहाँ पर कई सरकारी अनुज्ञापत्रों को पहले लेना पड़ता है, उपर से सामाजिक रूप से यह समझा जाता है कि एक उद्द्योग यहाँ के सहज-सरल सामाजिक परिवेश को ख़त्म कर सकता है l उपर से जातिवादी संगठनों का भारी दबाब बना हुवा रहता हैं l अगर स्थानीय युवकों के लिए, जो कोरोना संकट के दौरान अपने गृह राज्य की और लौटे है, उनको इस योजना से लाभ मिलेगा, तब यह तो एक सोने में सुहागे वाली योजना है l तीन वर्षों तक कोई अनुज्ञापत्र नहीं, नहीं तो प्रस्ताव की फ़ाइल हाथों में लिए सरकारी ऑफिसों के चक्कर लगते हुए अक्सर लोगों की चप्पलें घिस जाती है l असम में बड़े पैमाने में उद्द्योग नहीं होने के एक कारण यह भी है कि स्थानीय लोग रिस्क लेने में कतराते है, और उद्द्योग का फैलाव नहीं हो पाता l किसी भी प्रदेश की समृद्धि उसके नागरिकों के खरीदारी करने की क्षमता से आंकी जाती है l खरीददारी करने की क्षमता व्यापार,वाणिज्य और रोजगार से होने वाली आमदानी से बढ़ता है l कोरोना संकट से बड़े पैमाने में हुए बेरोजगार लोगों के लिए खाने-पिने तक की समस्या हो गयी हैं l इसके साथ ही राज्य में उद्द्योग-धंधों पर भी इसका विपरीत असर पड़ा हैं l अप्रैल और मई के महीने में असम के चाय उद्योग को भारी नुकसान झेलना पड़ रहा हैं l   
ऐसा क्यों होता है कि जब भी असम में कोई विरोध होता है, उसका केंद्र बिंदु व्यापरियों को बनाया जाता हैं l उसको कई सारे अलंकारों से सजाया जाता हैं l पिछले हफ्ते में जब गुवाहाटी में लॉकडाउन में दो दिनों की छुट दी गयी थी, तब आलू के भाव में अचानक उछाल देखा गया, जिसके लिए भी फैंसी बाज़ार के व्यपारियों को दोषी ठहराया गया था l स्थानीय न्यूज़ चनेलों पर कई बुद्धिजीवियों को व्यापरियों के विरुद्ध जहर उगलते हुए देखा गया l इतना ही नहीं, कोविड संकट से उबरने के किये सरकार को सहयोग कर रहें कुछ ठेकदारों को भी बलि का बकरा बनाया गया l अभी इस अध्यादेश के जारी होने से दुबारा से विरोध की सुई व्यापरियों की तरफ टनी हुई हैं l असम को आन्दोलन की भूमि कहा जाता है l एक संवेदनशील कौम होने के नाते, एक आम असमिया अपनी भाषा, संस्कृति को लेकर अति संवेदनशील रहता है l जरा सी आहत से वह चोकन्ना हो कर कुछ करने को उतारू हो जाता है l पिछले वर्ष नागरिकता संसोधन कानून के विरोध में जो गन आन्दोलन चला, उसके तार भी इसी संवेदनशीलता से जुड़े हुए थे l फिर भी जो लोग असम में पीढ़ी-दर पीढ़ी असम में रहा रहें है, उनकों अब अनासमिया नहीं कहा जा सकता l हो सकता है कि कुछ नए आये हुए विभिन्न भाषा-भाषी, असाधु व्यवसायियों ने मूल्य वृद्धि की हो, पर इसका यह मतलब तो नहीं निकला जा सकता कि हर बार व्यापारियों को ही टार्गेट किया जाय l आलू मूल्य वृद्धि पर व्यापारी अपना पक्ष रखने में नाकामयाब रहें l  
और अंत में रुडयार्ड किपलिंग की कविता अगरकी अंतिम लाइनें  अगर तुम भीड़ से बहस कर सकते हो, और बरकरार रख सकते हो अपने सद्गुण
या राजाओं के साथ टहलते हुए, गँवाते नहीं हो ख़ुद में साधारणता का स्पर्श
अगर ना तो शत्रु ना ही प्यारे मित्र तुम्हें आहत कर सकते हैं
अगर हर सह-जीवी का तुम्हारे लिए महत्व है, और कोई उनमें विशिष्ट नहीं है
अगर तुम एक निर्दयी मिनट के दरमियाँ
भर सकते हो
लंबी दौड़ के लिए मूल्यवान साठ सेकेंड्स
..तो ये जहान तुम्हारा है, और वो सबकुछ जो इसमें है
औरइस सबसे बढ़करतुम इंसान होगे, मेरे बच्चे!

Friday, June 26, 2020

शहर से कोरोना को निकालना जरुरी है


शहर से कोरोना को निकालना जरुरी है
असम की राजधानी गुवहाटी में कोरोना संक्रमण के मामले तेजी से बढ़ रहें है, जिसकी वजह से सोमवार से 14 दिनों का लॉकडाउन लगाया गया है l मुंबई में स्थित एशिया की सबसे बड़ी बस्ती धारवी में संक्रमण का सबसे बड़ा खतरा था, क्योंकि वहां पर जनसँख्या घनत्व इतना ज्यादा था कि लोग एक दुसरे के संपर्क में लगातार आ रहें थे l पर महाराष्ट्र सरकार ने संक्रमण का तेजी से पीछा करते हुए एक कारगर योजना के तहत काम करते हुए, वहां संक्रमण को फैलने से रोकने में सफल हुई l इसका मुख्य कारण था संक्रमण को पहली अवस्था में ही रोकना l मुंबई के नगर निगम में वहां पर स्थाई शिविर लगा दिए, जिसमे डॉक्टरों की टीम मुश्तैदी से कार्य कर रही थी l गुवाहाटी में भी अब मामले बढ़ने से सभी वार्डों में टेस्टिंग शिविर लगाये गए हैं, जिसमे आम आदमी अपना स्वाब टेस्ट करवा सकता हैं l धारवी मॉडल कुछ निश्चित बिन्दुवों पर आधारित था- संक्रमण पर निगाह रखना, उसपर तेजी से वार करना और फिर संक्रमित को अलग कर उसका इलाज करना l धारावी में जब कोरोना फैलना शुरू हुआ तो धीरे-धीरे पूरा इलाका ही कंटेनमेंट जोन बन गया। उसके बाद से प्रशासन ने जैसा काम किया, उसने पूरी तस्वीर ही बदलकर रख दी। अप्रैल से अब तक 47,500 घरों में जाकर अधिकारी लोगों के शरीर के तापमान और ऑक्सिजन की जांच कर चुके हैं। लगभग सात लाख लोगों की स्क्रीनिंग हो चुकी है। जिनमें थोड़े बहुत लक्षण दिखे, उन्हें क्वारंटीन सेंटर बनाए गए स्कूलों और स्पोर्ट्स क्लब्स में भेज दिया गया। असम में भी स्वास्थ्य विभाग ने कोविद संक्रमण को जिस तरह से संभाला है, उसकी चर्चा पुरे देश में हैं l स्वास्थ्य मंत्री में अपने पूरा समय कोरोना संक्रमण को रोकने में दे रहे है, जो काबिले तारीफ है l लगता है कि गुवाहाटी में भी धारवी मॉडल को अपनाया जा रहा है, जिसके के परिणाम हमे आने वाले दिनों में देखने को मिल जायेंगे l जनसँख्या घनत्व वाले इलाकों में सबसे पहले लॉकडाउन लगाया गया l जिन इलाकों में सामाजिक दुरी बनाना मुश्किल है, वहां पर स्वास्थ्य विभाग को कारगर ढंग से कार्य करना होगा l अब पुरे गुवाहाटी में लॉकडाउन की घोषणा की गई है l
कोरोना के बढ़ते संक्रमण के दौरान पिछले दिनों देश ने चीन सीमा पर अपने 20 सैनिक खो दिए l पाकिस्तान के साथ लगातार एक छद्म युद्ध जारी है, जिसकी वजह से पाकिस्तान सीमा पर रुक रुक कर बिना के चेतावनी के होने वाली का गोलीबारी से हर दफा सैनिक शहीद हो जातें है l उधर चीन के उकसावे पर भारत के एकमात्र हिन्दू निवासियों के देश नेपाल ने भी सीमा विवाद खड़ा कर दिया है l कहते है कि वामपंथियों की सरकार ने चीन का खुला समर्थन किया है l दुश्मन के दोस्त को अपनी तरफ करके चीन अपनी कुटिल चाल में सफल हो गया है l इसके अलावा पिछले मार्च से देश भर में जारी लॉकडाउन की वजह से लोग परेशान हो ही रखे हैं l कईयों ने अपने व्यापार खोएं हैं l स्टार्ट अप से लेकर जमे-जमाये व्यापार को कईयों ने खोते हुए देखा है l असम में जब बाढ़ आती है, तब नदी के किनारे बाढ़ के बढे हुए पानी से फ़ैल जाते हैं l भू क्षरण हो कर किनारे पर बसे हुए मकान कई बार नदी में बह जातें हैं l गुवाहाटी के करीब बसा हुवा पलाशबाड़ी भू कटाव का शिकार कई बार हो चूका हैं l इसके समीप कई गावं ब्रह्मपुत्र के बह गए थें l बाढ़ के दौरान कब कटाव हो जाय, कब पानी एकाएक घरों में घुस कर तबाही मचाने लगता है, इसका अंदाजा सहज ही नहीं लगता और एक मजबूत मकान भी अचानक नदी में समा सकता है l मकान का स्वामी अपनी किस्मत पर रोने के अलावा कुछ नहीं कर पाता l कोचकडाउन के बाद कई लोग, जो आमतोर पर एक सम्मान भरी जिंदगी गुजार रहे थें, मानसिक रूप से टूट कर अवसाद में घिर गए है l बोलीवुड में उभरते हुए होनहार कलाकार सुशांत सिंह राजपूत कुनबा-परस्ती का शिकार हो गए और मानसिक रूप से टूट कर उन्होंने आत्महत्या कर ली l लॉकडाउन के बीच देश में इस तरह की विचलित करने वाली घटनाओं से लोग अलग से परेशान हैं l घरेलु हिंसा, बलात्कार और चोरी-डैकेती की घटनाएँ कम नहीं हुई l लगता है कि अपराध करने की प्रवृति कोरोना के संक्रमण के संकट के दौरान भी विद्यमान है l या, इसको इस तरह से कहेंगे कि अपराध के लिए एक नया दल बन गया है, कुछ बेरोजगार हो कर अपराधिक गतिविधियों में संलग्न हो गए हैं l पर इसे हमारे सभ्य समाज की सबसे बड़ी विफलता नहीं कहेंगे तो क्यां कहेंगे l

Friday, June 5, 2020

जीने के लिए अब जद्दोजहेद करना होगा


जीने के लिए अब जद्दोजहेद करना होगा
कोविद संकट के दौरान किये गए लॉकडाउन में आम जनता द्वारा घरों में रह कर नए नए प्रयोग किये, जिनमे कई एक नए सामाजिक बदलाव की दिशा में कारगर सिद्ध हो रहे हैं l खास करके जब आमदनी के साधन नाममात्र के रह गए थे, ऐसे में बेहिसाब खर्च पर अपने आप ही पाबंदी लग गयी थी l एक बदलाव यह आया कि लोगों ने अपने बेहिसाब खर्चे पर लगाम लगा ली l जाहिर सी बात थी कि जब आमदानी कम तो खर्च भी कम l एक महत्वपूर्ण विषय विवेचना के लिए रख रहा हूँ, जिन पर टिपण्णी चाहूँगा l जो भी शादी हुई लॉकडाउन के दौरान वें, एकदम से शादी थी l मंत्रो के बीच ही शादियाँ संपन्न हुई हैं l इसे भी कोविद का वरदान मान कर एक उदहारण के रूप में ले लेना चाहिये और आने वाले दिनों में शादियों में होने वाले गैर जरुरी खर्चों पर पूरी तरह से पाबंदी लगाने पर विचार होना चाहिये l सामाजिक संगठन अपनी सभाओं में इस विषय को एक अहम् विषय मान कर विवेचना के लिए रखे और समाज से विचार आमंत्रित करें, तब एक आम राय बन सकती है l अभी कोविद के संकट के बाद समाज में शान-शौकत और दिखावे के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिये, जिसे मध्यमवर्गीय और निम्न-मध्यमवर्गीय लोगों को अवसाद की स्थिति नहीं भोगनी पड़े l विफलता की स्थिति ना आये, इसके लम्बे प्रयास करने होंगे l सामाजिक संगठन अपने समाज के लोगों के लिए क्या मदद कर सकती है, इस पर भी चर्चा हो सकती है l लगातार संघर्ष करने वाली जातियों के समक्ष यह समस्या है कि वें अपना स्वाभिमान नहीं छोड़ सकती, वे लगातार संघर्ष करके दुबारा अपने अस्तित्व को बचने में कामयाब हो जातें है l पर वर्त्तमान परिदृश्य में दो महीने के लॉकडाउन ने कईयों की कमर तोड़ दी हैं l इस स्थिति अंदाजा लोगों के बुझे हुए चेहरों को देख कर लगाया जा सकता है l क्यों नहीं उन लोगों की नेपथ्य में मदद की जाय, जिनको वाकई में समस्या हैं l आने वाले दिनों में चौनातियाँ दुगुनी है, क्योंकि स्कूल-कॉलेज सभी खुल रहें है, उनमे दाखिले के लिए मोटी रकम की आवश्यता होगी, जिसके आमजन को परेशानी होनी निश्चित ही है l इस बात में भी सच्चाई है कि समाज की जनसँख्या का एक बड़ा भाग अभी भी गरीबी का दंश भोग रहा है l इसी समाज के लोग पुरे देश में छोटी-छोटी नौकरी भी करतें है, और किसी तरह से अपने परिवार का भरण-पोषण करतें है l राजस्थान से उठ कर अपनी रोजी-रोटी तलाशने वाला समाज, प्रतिकूल पर्तिस्थितियों में भी दृढ इच्छा शक्ति रखता है, और दिक्कतों को चुनौतियां मानते हुए, उनका सामना करता है l अपनी जिजीविषा और अदम्य साहस का परिचय वह हर परिस्थिति में देता है l दो महीने में मध्यमवर्गीय लोगों पर मानों संकट का पहाड़ टूट पड़ा था l प्याज, भिन्डी और आलू के भाव को वह तलाशता है कि कही उसे पांच रुपये किलो कम में मिल जाए l इसे आम स्वभाव कह कर टालने का प्रयास ना कीजिये, यह एक स्थितिजनिक समस्या थी l लॉकडाउन के दौरान खाने के खर्च को छोड़ कर दुसरे खर्च, जैसे शौपिंग, सिनेमा या रेस्टोरंट जैसे खर्च बंद हो गए थे, जिससे लोगों के स्वभाव में एक नया सकारात्मक बदलाव भी देखने को मिल रहा है l लॉकडाउन ख़त्म होने के पश्चात अब जीवन सामान्य तो नहीं है, चुनौती दुगनी हो गयी है l कहने को तो दुकानें खुली हुई हैं, पर ग्राहक नदारद है l कर्मचारियों ने दुबारा से अपनी ड्यूटी ज्वाइन कर ली हैं l एक ऐसे परिदृश्य जिसे हम कहतें है, ‘जीवन के लिए जद्दोजहेद’, जिसमे हर तरह के उपक्रम होतें हैं l अथक प्रयास और जिजीविषा से तैयार की हुई जमीन अगर घिसकती हुई नजर आये, तब तकलीफ होनी स्वाभाविक है l मगर इस समय कुछ साहसिक व्यापारियों ने इस चुनौती को अवसर बना लिया है, कोविद संबंधित सामानों की बिक्री करके l मास्क, सेनिताइज़र और स्प्रे की बिक्री कई गुना हो गयी है l यें सामान अब आम आदमी की पहुच में आ गए है l बात अगर आर्थिक स्थिति कि करें, तब पाएंगे कि रेडीमेड कपड़ों की दुकानों, सजावट के समानों की दुकानों और यात्रा संबंधित उपकरणों की दुकानों और ज्वेलेर्री, घड़ी एवं सौन्दर्य प्रसाधनों की दुकानों पर लॉकडाउन का सबसे बड़ा प्रभाव पड़ा है l इन दुकानदारों के लिए बने रहने के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं l
संकट के समय उल्लास एवं उत्सव का समय नहीं है, अपितु चुनौती को अवसर बनाने का समय है l सबसे बड़ी बात है हौसले को बनाये रखना l इस मौके पर एक अनजान सी साभार कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ l
लहरों को साहिल की दरकार नहीं होती,
हौसला बुलंद हो तो कोई दीवार नहीं होती,
जलते हुए चिराग ने आँधियों से ये कहा,
उजाला देने वालों की कभी हार नहीं होती।      

Friday, May 29, 2020

इस समय गुड गवर्नेंस ही एक मात्र उपाय


इस समय गुड गवर्नेंस ही एक मात्र उपाय

लोकप्रियता के मामले में मोदी सरकार को पुरे नम्बर देना उचित होगा l भाजपा 2.0 सरकार के पश्चात एक वर्ष बीत जाने के बाद भी जोश बना हुवा है l लोकतंत्र में सरकारी इच्छा शक्ति का बहुत बड़ा महत्व है l कोरोना के संकट के दौरान भले ही मजदूरों के मामले में उसकी थोड़ी किरकिरी हुई है, पर कोरोना महामारी से निपटने के लिए उसके द्वारा किये गए उपायों से सरकार को अन्तराष्ट्रीय स्तर पर काफी ख्याति मिली है l चार प्रमुख विषयों पर सरकार को शाबाशी भी मिली तो उसकी घोर आलोचना भी हुई l कश्मीर से अनुछेद 370 और 35ए हटाना, नागरिकता संसोधन 2016, ट्रिपल तलाक और कोविद l 2.0 को हम दो भागों में बाँट सकते है, कोविद के पहले का समय और कोविद के आने के पश्चात का काल l पहले जो राजनीतिक निर्णय लिए गए थे, उसी देश में आन्दोलन का ही दौर चला, एक वर्ग इतना असंतुष्ट था कि उसने लगातार आन्दोलन ही किये l नागरिकता संसोधन बिल और राष्ट्रिय नागरिकता पंजी का नवीनीकरण दो ऐसे विवादित निर्णय थे, जिन पर भारी जन विरोध हुवा हैं l पर अनुछेद 370 और 35ए के हटने और ट्रिपल तलाक को लेकर सरकार के निर्णय पर भारत कि आम जनता ने दिल खोल कर स्वागत किया l दरअसल में, जम्मू कश्मीर और लद्दाक क्षेत्र के विकास के लिए यह एक महत्वपूर्ण कदम था l घाटी में हर वर्ष एक बड़ी राशि बजट में विकास के लिए आवंटित होती थी, जिसका समुचित उपयोग नहीं होता था, नतीजा गरीबी और सरकार के प्रति आक्रोश l इसको इस तरह से भी समझ सकते ही कि अस्सी के दशक में जब असम में छात्र आन्दोलन जोरो से था, और एक सशस्त्र गोरिल्ला युद्ध की तैयारी भी लगभग पूरी हो चुकी थी, तब आम जन में यह समझाया गया कि केंद्र सरकार सभी विकास के मसलों पर रुकावट बन कर खड़ी है, पर राज्य सरकार जनता के साथ है, तब अन्दोलान्कर्ताओं द्वारा आन्दोलन के दौरान केन्द्रीय सरकार के अधीन सम्पतियों को नुकसान पहुचाया जाता था, केंद्रीय सुरक्षा बालों को निशाना बनाया जाता था, केंद्र के मंत्रियों के आगमन पर काले झंडे दिखाए जातें थे l प्रजातंत्र में यह भी एक दुखद पहलु है कि विकास की बयार गावं तक ना पहुचे और इसका ठीकरा हमेशा केंद्र सरकार पर फोड़ा जाए l जबकि समुचित विकास के लिए एक तंत्र बनाया अगया है, जो जिला मजिस्ट्रेट से लेकर गावं पंचायत प्रधान तक जाता है l इसका सीधा कंट्रोल राज्य सरकार के पास रहता है l अगर तंत्र सही तरीके से काम नहीं करेगा, तब आधा अधुरा विकास ही हमें मिलेगा l नारों और जुमलों से बहुत अधिक दिनों तक सरकार नहीं चल सकती l कोविद एक वैश्विक महामारी है, भारत अब चीन के आंकड़ों को पछाड़ कर आगे बढ़ चूका है l इतने बड़े देश में जहाँ जनसँख्या घनत्व इतना ज्यादा है, वहां महामारी से निबटने के लिए सरकार में कोई कसर नहीं छोड़ी है l यह बात अलग है कि महामारी के दौरान विस्थापित हुए मजदूरों को ठीक तरह से संभाला नहीं जा सका l बीच में राजनीति जो आ गयी थी l राज्यों के साथ बेहतर संवाद के बावजूद विपक्ष ने सरकार की योजनाओं पर पानी फेरने के लिए पूरा प्रयास किया l पर लॉकडाउन के समय को लेकर सरकार का मानना है कि उसने सही समय पर लॉकडाउन की घोषणा की है, जिससे लाखों लोगों की जान बचाई जा सकी हैं l विकसित देशों के बनिस्पत कोविद संक्रमण के बावजूद मृत्यु दर काफी कम रही l इससे लॉकडाउन की घोषणा को एक सही कदम माना जायेगा l किन्तु जब प्रवासी मजदुर पैदल ही सड़कों पर उतर आये, तब सरकार कोई त्वरित निर्णय नहीं ले पाई और नतीजा हमारे सामने है l अब सरकार ने श्रमिक स्पेशल ट्रेने चलाई है, जिससे लाखों मजदुर अपने घर पहुच सकें हैं l पर इसी बीच अफवाहों के बाजार इतना गर्म था कि जिन मजदूरों ने पैदल ही मार्च करने का निर्णय लिया था, वे अभी भी अपने गावं नहीं पहुच पायें है l मानव संसाधन की एक बड़ी हानी देश हो होगी, जिसका खामियाजा हम आने वाले दिनों में भुगतेंगे l
आने वाले दिनों में जब लॉकडाउन 4.0 समाप्त हो जायेगा, तब संभवतः लॉकडाउन 5.0 की भी, छुट के साथ घोषणा हो सकती हैं l इस समय चुनौती को अवसर बनाना होगा l कृषि एक ऐसा क्षेत्र है, जिस पर भारत का विश्वास टिका हुवा है l कृषि अब सिर्फ चावल-गेहूं उगाना नहीं है, इसमें कई तरह के उपक्रम आ गए हैं l पशुपालन, दुग्ध उत्पाद, हर्बल खेती, फ़ूड प्रोसेस्रिंग, मछली पालन, मधुमक्खी पालन, इत्यादि, कुछ ऐसे उपक्रम संचित हो गए है, जिनका एक बड़ा रेडीमेड बाज़ार उपलब्ध हैं l बीएस इस क्षेत्र में के बड़ी छलांग कि जरूरत है l कृषि आधारभूत संरचना को सुधारने के लिए जो घोषणा सरकार ने की है, उसको लागु करने के लिए सरकारी तंत्र को काम पर लगाना होगा l जिस तरह से कोरोना के संकट के दौरान पूरा सरकारी तंत्र दिन रात एक किये हुवे था, क्या मंत्री और क्या डिएम, सभी लगे हुए है, उसी तरह से देश की अर्थव्यवस्था को अगर दुबारा से पटरी पर लाना है, तब कृषि क्षेत्र को मजबूत बनाना होगा, जिससे वापस आये मजदुर भी अपनी जमीन पर खुद खेती कर सके l यह कार्य तभी हो सकेगा, जब सरकार कोरोना का ग्राफ गिरने के पश्चात अपने पुरे जज्बे से इस काम में लग जाएगी l         

Friday, May 15, 2020

कोरोना के बाद का एक आत्मनिर्भर भारत


कोरोना के बाद का एक आत्मनिर्भर भारत
हम यह आसानी से सोच सकतें है कि कोरोना महामारी के फैलने के दौरान आम आदमी किस मुसीबत में जीवन यापन कर रहा है l लाखों मजदूर जब सड़कों पर चल रहें है, उनके लिए इस समय कोई प्रोत्साहन पैकेज का कोई मतलब नहीं हैं l उनके लिए सहायता यही हो सकती हैं कि इस समय जरुरी यह है कि कैसे उनको अपने घर पहुचाया जाय l शायद केंद्र सरकार के पास इसकी कोई तात्कालिक योजना नहीं है l ‘आ अब लौट चले’ की तर्ज पर लाखों मजदूरों ने अपने मूल गावों की और पलायन किया हैं l इस समय इस बात की चिंता नहीं होनी चाहिये कि यह किसकी जिम्मेवारी है, क्योंकि जब मजदूर चल रहें है, तब वें किसी ना किसी राज्य कि सीमाओं में चल रहे होतें ही है, फिर इस बात पर बहस क्यों कि यह किसकी जिम्मेवारी है l इस समय हमारा बहुमूल्य मानवसंसाधन , जिसने आजादी के पश्चात से ही सूक्ष्म और लघु उद्योगों में अपने कर्मशक्ति से जान फूंकी है, और कभी भी संकट आया, तो डगमगाया नहीं l इस समय यह संकट एक महामारी का है, उपर से लॉकडाउन का चरण है l अगर राष्ट्रीय राजमार्गों पर चल रहे मजदूरों को सड़कों से बसों के जरिये अपने गंतव्य स्थानों पर नहीं ले जाया गया, तब प्रोतसाहन पैकेज का लाभ बाद में कौन उठाएगा l मजदुर तक तक थक हार कर हताश हो जायेंगे l कोरोना महामारी से जूझने के लिए राज्य सरकारों ने एक अभूतपूर्व योजनाबद्ध पद्दति के तहत पिछले छह महीनों में जुंझारू सैनिकों के तरह इस महामारी से लड़ा है l असम इसमें पुरे देश के समक्ष उदहारण बन गया है l राज्यों के मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों, अधिकारीयों  और स्थानीय निकायों ने अभूतपूर्व कार्य करके कोरोना महामारी से लड़ने के लिए अपने आप को प्रस्तुत किया है l इसमें आम नागरिकों की भूमिका को भी उतना ही सम्मान दिया जाना चाहिये, जितना अन्य सभी को l क्योंकि प्रोत्साहन के साथ सहयोग उन्होंने ही दिया हैं l
एक आत्मनिर्भर भारत के आह्वान प्रधामंत्री ने अपने पिछले संबोधन में दिया है l असम के मुख्यमंत्री यह कह रहे है कि जो मानव संसाधन लौट कर आया है, वें राज्य के लिए सम्पति(एसेट) है ना कि दायित्व(लाइबिलिटी) है l आत्मनिर्भर भारत को बनने के लिए सूक्ष्म, लघु और माध्यम दर्जे के उद्योगों को दुबारा से जीवित करने के उद्देश्य से ही सरकार ने प्रोत्साहन पैकेज प्रस्तुत किया है l प्रोत्सहन पैकेज की तीसरी किस्त में खेती, दुग्ध व्यवसाय, पशुपालन, मछली पालन और फ़ूड प्रोसिंग जैसे व्यवसायों को प्रमुखता दी गई हैं l वित्त मंत्री ने 11 अलग-अलग चरणों में कृषि और कृषि व्यवसाय से जुड़े क्षेत्रों को दी जाने वाली राहत राशि का ऐलान किया हैं l कृषि क्षेत्र के लिए एक लाख करोड़ रुपये, सूक्ष्म खाद्य संस्करण इकाइयों की मदद के लिए 10 हज़ार करोड़ रुपये और मछुआरों और पशुपालकों के लिए 20 हज़ार करोड़ रुपये के फ़ंड का ऐलान किया हैं l पर बड़ा सवाल यह है कि यह पैकेज कितने दिनों तक लागु किया जाएगा या इसकी मियाद कितने दिनों तक रहेगी l योजन के मद में रूपया समाप्त होने तक या फिर सरकार की इच्छा शक्ति रहने तक l जो मजदुर अपने काम को छोड़ कर लौटें है, यह तो तय है कि वें कम से कम एक वर्ष तक वापस अपने पिछले काम में नहीं लौटेंगे l उनको अपने घरों के आस-पास काम दिलवाने के लिए यह जरुरी है कि छोटे-छोटे कल कारखाने खुले, जिससे इन मजदूरों को खपाया जा सके l अब बड़ी बात यह है कि भारत में कई तरह की सामाजिक, क़ानूनी और समस्याएँ और अड़चनें है, जिससे एकाएक नयें उद्योगों का खुलना थोड़ा मुश्किल सा लगता है l सभी तरह की क़ानूनी अड़चने समाप्त हो, इसके लिए सरकार को विशेष पहल करनी होगी, तभी लघु उद्योग पनप पायेगा l इस प्रोत्साहन पैकेज से आर्थिक सहायता के अभाव में बंद होने की कागार पर पड़े हुए उद्योगों को एक नया जीवन मिल सकता हैं l विमुद्राकरण के पश्चात से ही भारतीय लघु उद्योगों की कार्यप्रणाली में शितिलिकरण देखने को मिल रही थी l उपर से कोविद ने बची खुची आशा पर भी पानी फेर दिया है l ऐसे कई उद्योग है जिनमे  बनने वाले उत्पादनों की मांग दुबारा से कब आएगी, यह एक लाख टाका का प्रश्न हो सकता है l मसलन उन माध्यम दर्जे के कारखानों पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है जो पेकिंग मटेरियल, प्रिंटिंग और अन्य सहायक उपकरण बड़े कारखानों के लिए बनाते हैं l उनमे कम करने वाले मजदूरों के लिए अभी संकट आया हैं l या तो उन मजदूरों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है, या फिर संकट की परिस्थिति को देखतें हुए, मजदूरों ने खुद ही पलायन कर दिया हैं l एक स्थिति यह भी है कि लघु उद्योग बिना मजदुर फ़ोर्स के दुबारा कैसे उठ पायेगा, यह भी एक विचारनीय प्रश्न है l ऐसे में ऐसे लघु उद्योगों के लिए यह योजना एक बड़ी राहत लेकर आएगी, इसमें कोई दो राय नहीं है l                 

Friday, May 8, 2020

व्यापारियों को भी देश के विकास में पार्टनर बनाया जा सकता हैं


व्यापारियों को भी देश के विकास में पार्टनर बनाया जा सकता हैं
कभी कभी ऐसा लगता है कि कोविद के साथ ही अब आगे जीवन जीना पड़ेगा l स्वछता, सामाजिक दुरी और अपने जीवन में आवश्यक बदलाव ही समय कि मांग बन गयी है l संयम जीवन की कल्पना कर रहे लोगों ने हमेशा से ही इस बात कि वकालत की है कि अधिक वस्तुनिस्ट होने से मूल्यों का ह्रास होता है, जिससे एक समय के पश्चात तनाव और अवसाद पैदा होने का खतरा तो बना ही रहता है साथ ही कुछ नया पाने की महत्वाकांक्षा इतनी तीव्र रूप से घर कर लेती है कि उसको पाने के लिए मानव अपनी समस्त उर्जा लगा देता है l अभी लॉकडाउन में इस बात पर चिंतन अधिक हो रही है l अब आर्थिक दृष्टिकोण से कोविद पर बातें करतें है l भारत जैसी इकोनोमी में आम आदमी के लिए बहुत कुछ समाहित है l एक कल्याणकारी राज्य सरकार का एक रूप है जिसमें राज्य समान अवसर, समान वितरण के सिद्धांतों के आधार पर नागरिकों की आर्थिक और सामाजिक  रक्षा और संवर्धन करता है। कोविद के शुरू होने के समय से ही हम सरकार को इस सिद्धांत पर चलते हुवा देख रहें हैं l कोविद के चिन्ह या छाप हमें लगातार दिखाई दे रहें हैं l कही भुखमरी के रूप में तो कही राजपथ पर चलते हुए असहाय मजदूरों के रूप, कही बंद पड़े कारखानों के रूप में तो कही असहाय से व्यापारीवर्ग के रूप में l कोविद में किसी को भी नहीं छोड़ा है l इसके सूक्ष्म कण हमारी आधारभूत संरचनाओं को तहस नहस करने पर तुले हुए है l कोई भी कल्पना कर सकता है कि जो मजदुर वापास अपने गावों की ओर लौट गएँ है, वें वापस काम पर कब जायेंगे l उन कारखानों का क्या हाल होगा, जो अपना ज्यादातर उत्पादन हस्तचालित मशीनों से करतें हैं l मानव संसाधन भारत में इसकी जीडीपी में एक बड़ा रोले अदा कर रहें है l इस समय दुनिया भर के आर्थिक विशेषज्ञ इस बात पर जोर दे रहें हिया कि खंजर हो रही अर्थव्यस्था को दुबारा पटरी पर कैसे लाया जाय l खास करके भारत जैसी विकाशील अर्थव्यस्था को, जो एक साथ कई मानसिकताएं लेकर चलती है, उसको कैसे बचाया जाए l कैसे उसको किक स्टार्ट करे l व्यापार और वाणिज्य किसी भी देश की रीढ़ कि हड्डी होती है l इसको सुगमता से चलाने के लिए अब यह जरुरी हो गया है कि सरकार लाइसेंस राज को जड़ से ख़त्म करे l सिर्फ जीएसटी और आधार को ही हर जगह मान्य माना जाना चाहिये, तभी जा कर सुगमता उपलब्ध हो सकेगी l तभी व्यापारी बिना खौफ से व्यापार कर सकेंगे l उनको सही मायने में देश के विकास में पार्टनर के रूप में देखा जाना चाहिये l उनसे जुडी हुई तमाम चीजों को मान्यता प्रदान है l मसलन जो रोजगार वे देतें है, प्रदाता को कोई भी महत्व नहीं दिया जाता बल्कि ग्रहीता को ही महत्व दिया जाता रहा है l विभिन्न तरह के रोजगार कानून से प्रदाता को बांध दिया जाता है, जिससे देश में इंस्पेक्टर राज आज भी बना हुवा है l l जब देश में व्यापार करने की सुविधा नाम की योजना शुरू की गयी थी, तब ऐसा लगने लगा था कि राज्य सरकारें उन अवरोधों पर काम करेगी, जो व्यापार कि सुगमता में बाधक बन रही थी, पर ऐसा नही हुवा, बल्कि कुछ बड़े व्यापारिक घरानों को अधिक तब्बज्यों मिलने लगी l एमेसेमी उसी तरह से जद्दोजहेद करती हुई नजर आ रही है l घरेलु उद्योग नष्ट होने की कगार पर हैं l कोविद के बाद के परिदृश्य की और अगर देखते है, तब एकाएक बदन में सिहरन सी दौड़ने लगती है l क्योंकि सभी राज्यों के कामगारों ने अपने घरों की और रुख किया है l कुशल और प्रवीन कामगार हो या फिर आम मजदुर हो, सभी ने कोविद की वजह से अपने अपने कर्म क्षेत्र को त्यागा है l अब सवाल उठता है कि इन कामगारों के लिए संबंधित राज्य सरकारें काम कहा से लाएगी l सभी राज्यों में तो बड़े उद्योग या कारखाने नहीं है l खासकरके पूर्वी भारत में संख्या में कम उद्योगिक इकाइयों और छोटे कारखानों में कितने वापस आये हुए मजदुर ही खप पाएंगे, यह एक चिंता का विषय हैं, जो एक नई समस्या को जन्म देंगे l पहले से ही आंदोलनों और रुक रुक कर होने वाली हिंसा से पूर्वोत्तर में निवेश उस स्तर पर नहीं हुवा है, जिस स्तर पर समूचे भारत में हुवा है l उपर से कोविद के दौरान लॉकडाउन ने उद्योग-धंधे की कमर तोड़ दी हैं l  
इस बात में कोई दो राय नहीं है कि संक्रमण से बचाने के लिए कुछ छुट के साथ लॉकडाउन 3.0 लागु किया गया है l लॉकडाउन से सामान्य जीवन की और जाने में अभी कितने महीने लगेंगे, इसके आंकलन लगाना अभी मुश्किल है l केंद्र और राज्य सरकारें इस बात पर चिंता भी व्यक्त कर रही है कि किस तरह से आम लोगों की मुसीबतों को कम की जाय l पर बड़ी बात यह है कि सरकार संवेदनशील हो कर व्यापारियों को व्यापार की सुगमता प्रदान करे l तंत्र तो दुबारा पटरी पर लाने के लिए अगर देश में छोटें और मंझ्लें व्यापारियों को अगले एक वर्ष तक लाइसेंसिंग राज से मुक्त करना, किसानों के उत्पादनों(फल, सब्जी, सभी) को सीधे खरीद कर मंडी तक पहुचना, जीएसटी के भुगतान में 50 फीसदी कि रियायत देना और रोजगार कानून में ढील देना, कुछ ऐसे उपाय हो सकते हैं, जिन पर सरकार विचार कर सकती है l अगर व्यापारी विकास करेंगे, तब देश में रोजगार बढेगा, जीवनयापन में सहायक सिद्ध होंगे और जिंदगियां भी बचायेंगे l एक बार देश की अर्थव्यवस्था दुबारा से पटरी पर आ जाती है, जैसे की कुछ आर्थिक विशेषज्ञ कह रहें हैं, अगले पांच वर्षों के पश्चात भारत को आर्थिक सिरमौर बनने में कोई नहीं रोक सकता है l              

Thursday, February 6, 2020

मध्यम वर्ग अब त्रस्त हो कर बदलाव की उम्मीद कर रहा है


मध्यम वर्ग अब त्रस्त हो कर बदलाव की उम्मीद कर रहा है
शादी एक पवित्र रस्म है l इसमें कही भी चकाचौंध आड़े नहीं आता l वैदिक मंत्रोचारण और सप्तपदी इसकी सबसे बड़ी जरुरत है l इस रस्म को निभाने के लिए एक मुहर्त रहता है, जिसमे वर-वधु को यह विधि संपन्न करनी पड़ती है l अब रही बात शादी के अवसर पर किया जाने वाला शोर-शराबा l वह तो एक व्यवहारिकता के तराजू पर तौले जाने वाली आचार-संहिता है, जिसको आम जनता इसलिए निभाती है कि समाज में हर रस्म को लेकर एक विधान बना रहे l जीवन की आपाधापी के बीच शादी वह मौका आता है जब इंसान थोड़ी मन की भी की करता है l इस मन की करने के लिए उसके पास इनपुट अपने अडोस-पड़ोस, यार मित्रों और अजीजों की शादियों को देख कर मिलता है l भव्य और शोर-शराबे वाली शादियों के चर्चे कई दिनों तक रहतें है l शादियों के अवसर पर बिताये गए लम्हे दोस्त-यार के बीच चर्चा का कारण बने, यह भी एक दबी हुई इच्छा किसी के भी मन में हो सकती है l माध्यम वर्ग के लिए शादियों जैसे बड़े आयोजन करने में इसलिए समस्या आ रही है क्योंकि यह एक महंगा इवेंट बन गया है l खासकरके अत्यधिक सजावट और बेतुके से कार्यक्रम के आयोजन में काफी धन खर्च करना पड़ रहा है, जिसकी वजह से आयोजकों की कमर ही टूट जाती है l शायद इवेंट वालों ने शादी को एक मार्किट बन दिया है, जिसकी वजह से हर वर्ष खाने की बर्बादी से करोड़ो रुपये यूँ ही स्वाहा हो जातें है l शादी और कम खर्च ये शायद सभी को अजीब लगे, पर अब शादी पर कम खर्च का प्रचलन हो चला है, क्योंकि इससे समय और पैसा दोनों की ही बचत होती है l वर्त्तमान समय में जब देश में इकोनॉमिक्स को लेकर हर कोई चिंतित है, शादियों के खर्चे में कही कोई कमी दिखाई नहीं दे रही है l इसके मुख्य कारण जो समझा जा रहा है, माध्यम वर्ग की एक मानसिकता कि जीवन भर वह एक या दो शादियों के लिए कमाता है, और बड़ी धूम-धाम से खर्च करता है l उसकी यह इच्छा रहती है कि उसने जो कमाया वह इसी शादी में खर्च भी हो जाय तब भी कोई बात नहीं है l यह अपने लिए बस दाल रोटी की व्यवस्था की बात करता है l
आम तौर पर समाज में निम्न आय वर्ग, उच्च आय वर्ग के तौर तरीकों का अनुसरण करता है। आज गांव गांव तक पहुंचे हुए टेंट हाउस इसी बात का सबूत हैं। शादियों में तमाम तरह के व्यंजन परोस देना, यही बीते दो-तीन दशकों का आविष्कार है। आम भारतीय परिवार अच्छी शादी के चक्कर में कर्ज में डूब जाते हैं, लेकिन दबाव ऐसा है कि उधार ले लेकर चकाचौंध भरी शादी करनी पड़ती है। ऐसे समाज के सामने हाल की इन महंगी शादियों और उनकी अंधी मीडिया कवरेज ने बहुत अच्छा उदाहरण पेश नहीं किया है। शादी में पैसा खर्च करना कोई अपराध नहीं है। हाल ही में संपन्न एक शादी के आयोजन में इस बात की चर्चा हो रही थी कि सजावट कितनी जरुरी है l कितने फुल लगने चाहिये, और कितने फ़ूड काउंटर होने चाहिये l यह एक विवेचना का विषय है कि सजावट कितनी होने से एक सुंदर सा मंडप दिखे, जिसमे अथिति सहज महसूस करे l इसका कोई निश्चित मापदंड नहीं है l यह उस व्यक्ति पर निर्भर करता कि वह कितना खर्च करना चाहता है l पर बड़ी बात यह होनी चाहिये कि बड़े और आकर्षक मंडप को सामाजिक मॉडल नहीं बनने देना है l नहीं तो माध्यम वर्ग इसी कुंठा में आ जायेगा कि उसने बच्चों की शादी में वह इस तरह के मंडप क्यों नहीं बनवा सकता l   
इस समय ज्यादातर भारतीय लोगों की मेहनत से कमाई हुई गाढ़ी कमाई अपने बच्चों की शादियों पर हो रही हैं l चाहे लड़का हो या लड़की, शादियाँ अब एक महंगा इवेंट बन गयी हैं l मानो एक अदद इंसान के जीवन का उद्देश्य अपने बच्चों की धूमधाम से शादी करना ही हो गया हो l एक एक पैसा जोड़-जोड़ कर रखना, जिसे शादी के लिए बस खर्च करना हैं l कोई अगर पूछे कि कैसे, शादी तो सात फेरे की रस्म है, कही भी आयोजित की जा सकती हैं l इसका जबाब सीधा और सपाट नहीं हैं l यह कहा जा रहा हैं कि शादी सिर्फ फेरे की रस्म मात्र नहीं है, यह एक इच्छा और आकांशा पूरी करने का अवसर है, जिसे अभिभावक इस समय पूरी करके, अपने बच्चों को प्यार का तोहफा देतें हैं l जीवन भर की कमाई एक ही रात में महंगे रिसेप्शन पर खर्च करके बेशक वह अपनी पीठ खुद ही थपथपा लेता है, पर दिल के किसी कौने में उसे इस बात का भी मलाल रहता हैं कि उसने क्यों इतना खर्च किया l शायद सामाजिक प्रतिष्ठा की वजह से, या फिर भेड़ चाल में, नहीं तो कैसे होती उसके बच्चे की शादी l इतना तो जरुरी है, भाई.. l यह कितना जरुरी है, इसके मापदंड क्या हैं l कौन तय करेगा ? अगर गौर से देखा जाये, तब पाएंगे कि इस समय उपभोक्तावाद संस्कृति मनुष्य पर हावी हो गयी हैं l अब वह खर्च करने ने पिछड़ता नहीं, बल्कि उस होड़ में शामिल हो गया है, जिसको कहते है-आधुनिकता l इक्कीसवीं सदी का अगर कोई सबसे नकरात्मक और नायाब तोहफा अगर हैं तो वह है-उपभोक्तावादी संस्कृति, जिसके विस्तार के लिए पश्चिम के देश ने एक ऐसा जाल बिछाया हैं कि विकासशील देश के लोग उसमे फंसते चलें गए l एक सुनियोजित ढंग से आधुनिकता के नाम पर लोगों को उत्सव और आयोजनों के मौकों पर आधुनिकता के नाम पर बेहिसाब खर्च करने के लिए उकसाना, कुछ लोगों की एक सोची-समझी चाल है, जिसमे माध्यम श्रेणी के लोग फंस गए हैं l सामर्थ नहीं होते हुए भी खर्च करने की इच्छा करना और बाहरी सुन्दरता और दिखावा मानो जीवन का एक ध्येय बन गया हैं l उनको अब अपने  बच्चों के रिश्ते ढूंढने में दिक्कत आ रही हैं l महँगी शादियों के चक्कर में जो पड़ गया हैं समाज l पूर्वोत्तर के कई छोटे कस्बों और शहरों में लोगों को अपने बच्चों के लिए उपयुक्त जीवन साथी ढूंढने में असुविधा हो रही हैं l उनका कहना हैं कि नई जीवन शैली से प्रभावित बच्चे, अपने लिए जीवनसाथी का चयन करने में पहले से ज्यादा समय ले रहें हैं l शायद एकल परिवार का यह भी एक साईड इफ़ेक्ट हो कि बच्चें अपने निर्णय लेने में खुद ही सक्षम हो गए हैं l पर ज्यादा उम्र होने पर भी शादी नहीं होने, पर वें डिप्रेशन का शिकार भी हो रहें हैं l
शादी विवाह पर इस चर्चा को करने के पीछे उद्देश्य यह है कि एक नई पहल आजकल के पढ़े-लिखे शिक्षित लोग करना चाहतें है l यह चर्चा इस लिए भी जरुरी है क्योंकि, पानी अब सिर से उपर चला गया है l माध्यम वर्ग अब त्रस्त हो कर बदलाव की उम्मीद कर रहा है l पर समस्या यह है कि कैसे संभव हो पायेगा, यह कार्य l कौन बनेगा ध्वजधारक, कौन बनेगा इस बदलाव का झंडाबरदार l