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Friday, August 9, 2024

दुनिया भर के छात्र आंदोलन एक विचार पर चलते हैं

 

    

छात्र आंदोलन एक विचार पर चलते हैं



बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुखिया नोबल शांति पुरस्कार विजेता मुहम्मद युनुस ने आंदोलन कर रहे छात्रों की भरपूर तारीफ की हैं और कहा कि छात्र उन्हें जो राह दिखलायेंगे, वे उसी राह पर चलेंगे l इतना ही नहीं सेना द्वारा समर्थित अंतरिम सरकार में छात्र आंदोलन के अगुवा दो छात्रों को जगह ही नहीं दी गयी, बल्कि उनको महत्वपूर्ण विभाग भी आवंटित किये गए हैं l पूरी दुनिया में इतिहास है कि छात्र आंदोलनों की वजह से सत्ता परिवर्तन देखे गए हैं l फ्रांस में 1960 में छात्र आंदोलन की वजह से उसके राष्ट्र नायक की देश छोड़ कर भागना पड़ा था l बांग्लादेश में भी यही हुवा l शेख हसीना को भी इस्तीफा दे करे देश छोड़ कर भागना पड़ा l छात्र आंदोलन एक विचार पर चलता है l असम में छह वर्षों तक छात्र आंदोलन चला l विचार था, असम की भूमि से विदेशी नागरिकों को हटाना और असम के नागरिकों के अधिकारों को सुरक्षित करना और असमिया लोगों के  लिए एक सुरक्षा कवच कायम करना l उल्लेखनीय है कि उन्नीसवीं सदी और खासतौर पर आज़ादी बाद यह क्षेत्र खास तरह के राजनीतिक पुनर्जागरण के दौर से गुज़रा, जिसने असम लोगों में अपनी भाषा, संस्कृति, साहित्य, लोक कला और संगीत के प्रति गर्व की भावना पैदा की। राज्य की सांस्कृतिक, भाषायी और धार्मिक विविधता को देखते हए ऐसा लग रहा था कि किसी एक भाषा और संस्कृति को मान्यता देना एक जटिल प्रक्रिया थी । एकीकृत असमिया संस्कृति की तरफ़दारी करने वाले बहुत से लोगों का यह भी मानना रहा है कि आदिवासी इलाकों को अलग से विशेष अधिकार देकर या मेघालय, मिजोरम, नगालैण्ड और अरुणाचल प्रदेश जैसे अलग राज्यों को निर्माण करके केंद्र सरकार ने एक व्यापक असमिया पहचान के निर्माण में रुकावट डालने का काम किया है। इसीलिए असम के युवाओं में केंद्र के प्रति एक नकारात्मकता और आक्रोश की भावना रही है l बांग्लादेश की तरह असम आंदोलन का नेतृत्व भी यहाँ के छात्र ही कर रहे थे l उसका केंद्र भी ढाका विश्वविद्यालय ही था l आंदोलनके समय आसू के मुख्य कार्यालय भी गौहाटी विश्वविध्यालय ही था l असम के छात्र भी स्थनीय लोगों के लिए नौकरियों में शत-प्रतिशत आरक्षण की मांग कर रहें थें l भूमि, रोजगार जैसे मुद्दे असम आंदोलनका मुख्य हिस्सा थे l असम आंदोलनके समय जब हितेश्वर सैकिया के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार ने दमनकारी निति से छात्र आंदोलन को दबाने की चेष्टा की, लेकिन  आंदोलन और अधिक प्रखर और जीवंत हो गया l राज्य के बुद्धिजीवियों ने खुल कर आंदोलन के पक्ष में बयान देना शुर कर दिया था l इसी बीच असम सरकार ने विधानसभा चुनाव भी करवाएं, पर उसका भारी विरोध हुवा और इतिहास बनने के पश्चात न्यूनतम मतदान होने के पश्चात हितेश्वर सैकिया असम के मुख्यमंत्री बने l पर आंदोलनरुका नहीं l पुरे देश में असम आंदोलनकी गूंज थी l अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं ने खुल कर आंदोलन कर समर्थन किया था l बांग्लादेश के छात्र आंदोलन और असम आंदोलनमें जमीन आसमान का फर्क है l बांग्लादेश के छात्र आंदोलन आरक्षण वरोधी आंदोलनकब हसीना हटाओं आंदोलनबन गया, इसका किसी को पता नहीं चला l एक बड़ा फर्क यह भी था कि असम आंदोलन गाँधी के सिद्धांतों पर कायम था l शांतिपूर्ण औरे विवेकपूर्ण l थोड़ी बहुत हिंसा को छोड़ कर ज्यादातर छह वर्ष तक चले आंदोलन के दिन शांतिपूर्ण रहे l यहाँ पर इमारतों को नहीं जलाया गया, गैर असमिया को नहीं मारा गया l बड़ी संख्या में रह रहे भारतीय मूल कर लोगों को किस किस्म का नुकसान आन्दोलनकारियों ने नहीं पहुचाया l उलटे, यह भी देखने में आया कि असम में रह रहे गैर असमिया लोगों ने आंदोलनका भारी समर्थन किया और 1983 में हुए चुनावों का बहिष्कार भी किया l आसू आज तक भी गैर असमिया लोगों के उस सहयोग को मान्यता प्रदान करता हैं l पुरे आंदोलन में 855 स्थानीय छात्रों की मृत्यु हुई, जो पुलिसिया बर्बत्ता के शिकार हुए l हजारों छात्रों को जेल भेजा गया और आंदोलन को दबाने की चेष्टा की गयी l राजनैतिक तौर पर और डंडे के जोर पर भी l जब केंद्र सरकार ने 1983 में असम में विधानसभा चुनाव कराने का फ़ैसला किया। इसका बड़े पैमाने पर बहिष्कार किया गया । इन चुनावों में बहुत कम वोट डाले गये। जिन क्षेत्रों में असमिया भाषी लोगों का बहुमत था, वहाँ तीन प्रतिशत से भी कम वोट पड़े। मतदान केंद्र सुने पड़े थे l कांग्रेस सरकार ने अलग अलग भाषाई लोगों में फुट डालने का कार्य करके आंदोलनको ध्वंश करने की असफल चेष्टा भी की l चुनावों के बाद कांग्रेस पार्टी की सरकार ज़रूर बनी, लेकिन इसे कोई लोकतांत्रिक वैधता हासिल नहीं थी। 1983 की नेल्ली कांड असम आंदोलन के बीच का एक हिंसक वाकया था, जो इतिहास के पन्ने पर दर्ज हो गया, जिसमे 3000 से ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतर दिया गया था l 15 अगस्त 1985 को केंद्र की राजीव गाँधी सरकार और आंदोलन के नेताओं के बीच समझौता हुआ जिसे असम समझौते के नाम से जाना गया। इसके तहत 1951 से 1961 के बीच आये सभी लोगों को पूर्ण नागरिकता और वोट देने का अधिकार देने का फ़ैसला किया गया। असमिया लोगों की सांस्‍कृतिक, सामाजिक, भाषायी पहचान व विरासत को सुरक्षित एवं संरक्षित करने के लिए असम समझोते में छह नंबर धारा महत्वपूर्ण है l फैसला यह भी हुवा कि जो लोग 1971 के बाद असम में आये थे, उन्हें वापस भेज दिया जाएगा। असम के आर्थिक विकास के लिए पैकेज की भी घोषणा की गयी और यहाँ ऑयल रिफ़ाइनरी, पेपर मिल और तकनीक संस्थान स्थापित करने का फ़ैसला किया गया। विधानसभा को भंग करके 1985 में ही चुनाव कराए गये, जिसमें नवगठित असम गण परिषद को बहुमत मिला। पार्टी के नेता प्रफुल्ल कुमार महंत, जो कि आसू के अध्यक्ष भी थे, मुख्यमंत्री बने। उस समय उनकी उम्र केवल 32 वर्ष की थी। छह वर्षों तक चले आंदोलनका एक सुखद अंत हुवाl

बांग्लादेश में कई बाहरी और अंदरूनी ताकतों ने छात्र आंदोलन के रुख को मोड़ा हैं l बांग्लादेश की मुक्ति के समय जमात ए इस्लामी पार्टी ने बांग्लादेश नेशनल पार्टी के साथ मिल आर बांग्लादेश की स्वतंत्रता का विरोध किया था l अभी उसके कैडरों ने आंदोलनके नाम अपर जम कर हिंसा की है और छात्र आंदोलनको हिंसक आंदोलन में बदल दिया l बड़े पैमाने पर बांग्लादेशी हिन्दू नागरिकों के घरों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों को क्षति पहुचाई l इतना ही नहीं, छात्रों ने सेना तक को यह सन्देश देना कि उनके समर्थन से ही बांग्लादेश में अंतरिम सरकार बनेगी, इस बात को रेखांकित करती है कि छात्रों के साथ बहुत से लोग अँधेरे में खड़े है, जो पीछे से उकसा रहे हैं l बांग्लादेश का छात्र आंदोलन अब पीछे रह चूका है l             

Saturday, July 2, 2022

पांच वर्षों का जीएसटी कानून, कितना सफल

 

पांच वर्षों का जीएसटी कानून, कितना सफल

अगर मोटे तोर पर कहा जाय कि जीएसटी कानून देश के लिए कितना उपयोगकारी सिद्ध हुवा है, तब एक सुर में सभी यह कहेंगे कि 1 जुलाई सन 2017 के बाद से देश में एतिहासिक रूप से परोक्ष कर सुधारों में एक बड़ा कदम सरकार ने उठाया है l विक्री कर के क्षेत्र में ‘एक देश एक कर’ का प्रावधान रखते हुए सरकार ने आर्थिक सुधारों, देश के लोगों को अतरिक्त कर के बोझ से निकालने, कर ढांचे का सरलीकरण करना और देश को तकनिकी रूप से सबल बनने के उद्देश्य से पांच वर्षों पहले जीएसटी कानून को लागु किया था l ख़ुशी की बात यह है कि वर्ष 2022-23 के इन शुरुवाती दिनों से ही राजस्व में बेहताशा बृद्धि देखने को मिल रही है l जीएसटी के प्रावधानों के अनुपालन के लिए अब व्यापारियों औरे उद्योगपतियों की सोच में एक बड़ा बदलाव आया है, जिसके लिए अब यह कानून एक ‘व्यापार सुधार कानून और ‘व्यापार सुधार व्यवस्था’ का रूप ले चूका हैं l जीएसटी रजिस्ट्रेशन अब एक स्टेटस और सफलता सिंबल बन गया हैं l जिन व्यापारियों ने जीएसटी के तहत रजिस्ट्रेशन करवाया है, उनके लिए सोने पे सुहागा उस समय बन, जब खरीदारों को इनपुट लेने के लिए जीएसटी बिल की जरुरत आन पड़ी थी l जिन व्यापारियों ने नए कर ढांचे के दरम्यान अपने आप को ढाल लिया, उनके लिए व्यस्था में अंतर्गत अगर तिथियों के अनुपालन का दबाद है,तो उनके पास इनपुट क्रेडिट लेने के लिए प्रावधान भी हैं l ऐसा माना जा रहा है कि यह एक मानव रहित ऑटोमेटेड कर प्रणाली है, और सिस्टम द्वारा संचालित है, जिसमे डाटा एंट्री किये जाने पर अपने आप से आंकड़े निकल कर आते हैं l इस सुविधा का फायदा लाखों रजिस्टर्ड होल्डर बड़े मजे से निभा रहे हैं l एस अभी कहा जा रहा है कि व्यापारियों द्वारा अगर जीएसटी बिल दिया जाता है, तब उसका स्टेटस अचानक से बढ़ जाता हैं l जीएसटी कानून ने पिछले पांच वर्षों में देश के व्यापार जगत में एक नया परिवर्तन ला दिया हैं, जिससे देश के माल धुलाई तो तेजी से बढ़ी ही है, साथ ही में व्यापार की मात्रा और परिमाण भी बढ़ गया हैं l ‘एक देश एक कर’ के नारे को तो धरातल पर  उतारने के लिए सरकार की यह चेष्टा सफल हुई हैं l एक जटिल व्यवस्था को लोगों के समझाने में जितनी मेहमत सरकार को करनी पड़ी, उसके परिणाम आज आ रहे हैं l उल्लेखनीय है कि जून महीने के जीएसटी कलेक्शन 1लाख40 हज़ार करोड़ रुपये से ज्यादा का हुवा हैं l जीएसटी कानून भले ही आम उपभोक्ता को नहीं छेड़ता, पर जब 17 केंद्रीय और राज्य करों और 13 उप कानूनों को रद्द करके एक जीएसटी कानून में सम्मिलित किया गया है, इसका सीधा असर आम अपभोक्ता पर जरुर पड़ रहा हैं l उपर से एक कर ने व्यापारियों को मुक्त रूप से देश भर में माल बेचने की आजादी भी प्रदान कर दी हैं l जीएसटी कानून लाने के पीछे सबसे बड़ा कारण था, समानता का फार्मूला और अति आवशयक वस्तुओं पर जीएसटी के प्रावधानों को नहीं लगाना l इन दोनों बिन्दुवों पर सरकार ने अभी तक स्थिति कायम राखी हैं पर बड़ी बात यह है कि नए करों से क्या महंगाई बढ़ नहीं गयी l यह अलग बात है कि यह शिकायत भी है कि कुछ व्यापारी कर तो उठा लेते है, फिर रिटर्न भरने में देरी करते है, जिसके फलस्वरूप सामने वाले व्यापारी को इनपुट क्रेडिट नहीं मिल पता l इनमे से कुछ धूर्त व्यापारी कारोबार करके छु मंतर भी हो गए थे, जिनका पता आज तक नहीं चला l कुछ व्यापारी  सेल का रिटर्न ही नहीं डालते, और कुछ समय पर रिटर्न दाखिल नहीं करते, जिसका खामियाजा दुसरे व्यापारी भुगतते हैं l उपर से जीएसटी के अनुपालना के लिए अभी भी व्यापरियों के लिए सरकार के लिए कोई प्रोत्साहन सौगात नहीं हैं l

अब बात करते है, समस्याओं की, जीएसटी का सरकारी पोर्टल को लेकर कर सलाहकारों और चार्टर्ड अकाउंटेंट वर्ग में भारी रोष हैं l प्रख्यात जीएसटी सलाहकार और चार्टर्ड अकाउंटेंट ओमप्रकाश अगरवाल से जब उनका जीएसटी का पांच साल का अनुभव पूछा गया, तब उन्होंने ग़ालिब के इस शेर से शुरुवात की ‘मरीजे इश्क पर रहमत खुदा की, मर्ज बढ़ता गया, ज्यो-ज्यो दावा की l उनका कहना है कि वर्त्तमान जीएसटी पोर्टल यूजर फ्रेंडली नहीं है, डाटा डालने के लिए सीमित स्थान उपलब्ध करवाए गए हैं l इसके अलावा, शिकायत के लिए हेल्पलाइन डेस्क भी कारगार नहीं हैं l जीएसटी के रिटर्न दाखिल करने की तारीखों पर अगर व्यापारी रिटर्न नहीं भरता, तब सामने वाले व्यापारी को इनपुट क्रेडिट उस महीने में नहीं मिलता l अगर कोई व्यापारी छह महीने तक रिटर्न नहीं देता, तब खरीदने वाले व्यापारी को इनपुट क्रेडिट कभी भी नहीं मिलेगा l जब एक डीलर सरकार के लिए कर वसूली करता है, तब यह उसका दायित्व बन जाता है कि वह वसूला हुवा कर सरकार को दे l पर वही डीलर उस कर का पेमेंट नहीं करता, तब देने वाले व्यापारी कू इनपुट क्रेडिट क्यों नहीं मिलेगा l उनका मानना है कि लगातार हो रहे कानून में बदलाव से समस्या और अधिक उलझ रही हैं l जो अधिकारी कानून बना रहे है उनको विक्रय कर के बार में जानकारी नहीं है, जीएसटी के अंतर्गत, डीलरों की समस्याओं को अनदेखा किया जा रहा हैं l डीलरों के लिए छुट की कोई व्यवस्था नहीं है, जिन्होंने तकनिकी कारणों से रिटर्न दाखिल नहीं किया है, उनपर पेनल्टी और ब्याज लगाया जा रहा हैं l उन्होंने यह भी कहा है कि भारत एक कल्याणकारी देश है, जहा की अधिकांश जनता अभी भी तकनीकी शिक्षा से वंचित है l कोरोना काल में लाखों लोगों से चुक हुई है, जिसका खामियाजा उनको आज भुगतना पड़ रहा हैं l सरकार को डीलरों के उपर लगाये गए व्याज और पेनाल्टी के उपर सहानभूतिपूर्वक विचार करना चाहिये l

भारत में इस समय आम आदमी, खास करके देश के मंझले और खुदरा व्यापरियों के मुश्किल भरें दिन चल रहें है l यह बात हम इसलिए कह रहे है क्योंकि व्यापरियों के माथे पर चिंता की लकीरे साफ़ दिखाई दे रही है l उन्हें चिंता है अपने भविष्य की, जो इस समय उन्हें चुनौती दे रहा है l मंडियों में नदारद ग्राहकों और ऑनलाइन का बढ़ता व्यापार एक बड़ी चिंता व्यापारियों के लिए बन गयी हैं l इसके लिए एक नई जद्दोजहेद शुरू करनी होगी l इधर जीएसटी में हो रहे लगातार हो रहे बदलाव और उससे होने वाले बदलाव से क्या नया बदलने वाला है, इस बात से बेखबर व्यापारी, इस चिंता को लेकर परेशान है कि बाजारों में पसरा सूनापन, अगर इसी तरह से चलता रहा, तब उस किस तरह से अपने आप को बचाना हैं l

         

Friday, August 20, 2021

हम बहनों के लिए मेरे भैया, आता है एक दिन साल में..

 

हम बहनों के लिए मेरे भैया, आता है एक दिन साल में..

कहने को तो उपरोक्त शीर्षक हिंदी फिल्म अंजना के एक गाने का मुखड़ा है, पर गाने के मायने इतने अधिक है कि शब्दों में व्याख्या नहीं की जा सकती l गाना संवेदना का एक ज्वार है, जिसे महसूस किया जा सकता हैं l रक्षा बंधन आम जनमानस का त्यौहार है l दिवाली और होली के पश्चात यह एक ऐसा त्यौहार है, जिसमे सभी की भागीदारी रहती है l स्वतंत्रता आंदोलन में दो प्रमुख त्योहारों ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी l एक थी गणेश चतुर्थी और दूसरा रक्षा बंधन l भाई-बहन, ननद-भोजी, पंडित-जजमान, हर रिश्तों में रक्षा सूत्र बांधे जाते हैं l पूरा भारतवर्ष रिश्तों के धागों में बंध कर प्रेम, भाईचारे और सामाजिकता को अक्षुण रखने का संदेश रक्षा बंधन त्यौहार के जरिये प्रेषित करता हैं l l समाज में एकबद्धता बनी रहे, इसके लिए रक्षा बंधन जैसे त्यौहार ने कड़ियों को ना सिर्फ जोड़ा है, बल्कि त्यौहार के माध्यम से परिवारों के बीच अटूट संबंध कायम किये है l अब तो प्रकृति संरक्षण हेतु वृक्षों को राखी बाँधने की परम्परा भी प्रारम्भ हो गयी है। संकेत भर से यह जताया जा रहा है कि रक्षा सूत्र बांध कर पेड़ों की रक्षा की जाएगी l उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत में यह पर्व अलग नाम एवं अलग-अलग पद्धतियों से मनाया जाता है। उत्तर भारत में 'श्रावणी' नाम से प्रसिद्ध यह पर्व ब्राह्मणों का सर्वोपरि त्योहार है। यजमानों को यज्ञोपवीत एवं रक्षा-सूत्र देकर दक्षिणा प्राप्त की जाती है। महाराष्ट्र में इस अवसर पर समुद्र के स्वामी वरुण देवता को प्रसन्न करने के लिए नारियल अर्पित करने की परंपरा भी है। दक्षिण भारतीय ब्राह्मण इस पर्व को अवनि अवित्तम कहते हैं। यज्ञोपवीतधारी ब्राह्मण स्नान करने के बाद ऋषियों का तर्पण कर नया यज्ञोपवीत धारण करते हैं। भारत में प्रजापति ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविध्यालय की बहनों ने हमेशा से ही रक्षा बांधकर सन्देश दिया है कि मन वचन और कर्म से पूर्ण पवित्र व्यवहार की भावना बढे l रक्षाबंधन का उत्सव एक आध्यात्मिक उत्सव है। व्यावहारिक रूप में तो इस पर्व को बहनों के द्वारा भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर बहनों की रक्षा के संकल्प दिलाना होता है। लेकिन उत्सव का आध्यात्मिक संदेश यह है कि रक्षाबंधन से व्यक्ति के जीवन में उमंग उत्साह निरोगी और दीर्घायु बनाने की परमात्मा से कामना की जाती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पुरुष सदस्य परस्पर भाईचारे के लिये एक दूसरे को भगवा रंग की राखी बाँधते हैं। हिन्दू धर्म के सभी धार्मिक अनुष्ठानों में रक्षासूत्र बाँधते समय कर्मकाण्डी पण्डित या आचार्य संस्कृत में एक श्लोक का उच्चारण करते हैं, जिसमें रक्षा बंधन का संबंध राजा बलि से स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। भविष्यपुराण के अनुसार इन्द्राणी द्वारा निर्मित रक्षासूत्र को देवगुरु बृहस्पति ने इन्द्र के हाथों बांधते हुए निम्नलिखित स्वस्तिवाचन किया (यह श्लोक रक्षा बंधन का अभीष्ट मंत्र है)-

येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबल:।

तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल ॥

इस श्लोक का हिन्दी भावार्थ है- "जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बाँधा गया था, उसी सूत्र से मैं तुझे बाँधता हूँ। हे रक्षे (राखी)! तुम अडिग रहना (तू अपने संकल्प से कभी भी विचलित न हो।)" भारतीय स्वत्रंता संग्राम में जन जागरण के लिये भी इस पर्व का सहारा लिया गया। श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने बंग-भंग का विरोध करते समय रक्षा बंधन त्यौहार को बंगाल निवासियों के पारस्परिक भाईचारे तथा एकता का प्रतीक बनाकर, इस त्यौहार का राजनीतिक उपयोग आरंभ किया। 1905 में उनकी प्रसिद्ध कविता "मातृभूमि वंदना" प्रकशित हुई, जिसमें वे लिखते हैं-

"हे प्रभु! मेरे बंगदेश की धरती, नदियाँ, वायु, फूल - सब पावन हों;

है प्रभु! मेरे बंगदेश के, प्रत्येक भाई बहन के उर अन्तःस्थल, अविछन्न, अविभक्त एवं एक हों।"

रक्षा बंधन का संबंध महिलाओं के मान की रक्षा से हैं l देश में महिलाओं को पुरुष के बराबर सम्मान दिए जाने से महिलाएं अब अपनी रक्षा खुद करने में सक्षम हो गयी हैं l देश की महिलाओं के लिए उभरी नई संभावनाओं ने उन्हें एक नए क्षितीज पर ला कर खड़ा कर दिया है l टोकियों ओलंपिक्स इसका जीता जाता उदाहरण है l देश में महिलाओं के शशक्तिकरण के लिए नए द्वार खुल चुके हैं l  देश के कई राज्यों ने रक्षा बंधन के दिन महिलाओं के लिए योजनाओं की झड़ी लगाने का भी निर्णय लिया है l उत्तर प्रदेश में रक्षा बंधन के दिन महिलाओं के लिए कई योजनायें शुरू होने जा रही हैं l रक्षाबंधन के पर्व पर इस बार भी महिलाओं को सरकार ने रोडवेज बसों में निशुल्क बस यात्रा का तोहफा दिया है। रक्षा बंधन के दिन प्रदेश की महिलाओं को प्रदेश के अंदर उत्तराखंड परिवहन निगम द्वारा संचालित रोडवेज बसों के किराये में शत-प्रतिशत की छूट दी जाएगी। इतना ही नहीं कई स्वयंसेवी संगठनों ने लड़कियों के लिए पाठ्य पुस्तकें और कलम-कागज भी भेंट स्वरुप देने की तैयारी की हैं l   

रक्षा बंधन त्यौहार को भाषाई या धार्मिक लघुता में बांधना, उसके महत्त्व को कम करना जैसा है l राष्ट्रिय अस्मिता को पहचान दिलाने वाला यह त्यौहार, बहन के विश्वास एवं भाई का संकल्प का प्रतिरूप हैं l समरसता, एकता और क्षेत्रीय समन्वयता को दीर्घ काल के लिए जीवित रखने और सभी को एकसूत्र में पिरोकर रखने का यह एक उत्तम त्यौहार हैं l देश भर में इस दिन सामूहिक रूप से यह त्यौहार मनाया जाता हैं l परिवार के लोग एक जगह इकठ्ठा हो कर एक साथ एक दुसरे को राखी बांधते हैं l हां, बाजारवाद का कुछ असर इस त्यौहार में भी देखने में आया है l मंहंगी राखियाँ और कीमती गिफ्ट देने की एक आधुनिक परंपरा चल पड़ी है l पर भारत जैसे विशाल देश में हर श्रेणी के लोग रहते है, जो इन सब से उपर उठ कर रक्षा बंधन त्यौहार बड़े प्रेम से मानते हैं l हर तरह की सीमाओं को लांघ कर यह पर्व अपनी एक अलग पहचान बनाये हुए हैं l    

Friday, January 22, 2021

गणतंत्र का आनंद

 

गणतंत्र का आनंद

इस बार 26 जनवरी को हम आजाद भारत का 72वां गणतंत्र दिवस मानाने जा रहे हैं l भारत 26 जनवरी 1950 को एक गणतंत्र बना l भारतीय संविधान की दो हस्तलिखित कोपियों पर संविधान सभा के 308 सदस्यों ने हस्ताक्षर किये थे l फिर जा कर देश में संविधान 26 जनवरी से लागु हुवा l इसकी प्रस्तावना हम भारत के लोग से शुरू होती है और मूल रूप से इस तरह से शुरू होती है l’ हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को: सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता, प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सब में, व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्पित होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ईस्वी (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत दो हजार छह विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैंएक ऐसा गणतंत्र जो जीवंत है, जोश से भरा है l सबसे बड़ा लोकतंत्र का दर्जा इसे प्राप्त है, जिसमे एक लिखित संविधान है, एक चुनी हुई सरकार है, एक कार्यपालिका है और एक स्वतंत्र न्यायपालिका है l इस सभी को मिला कर ही तो एक गणतंत्र बनता है l ख़ुशी कि बात है कि सबसे बड़े गणतंत्र का उदहारण पूरी दुनिया के सामने रखा जाता है l

अमेरिका, जो विश्व का सबसे पुराना गणतंत्र माना जाता है, वहा नागरिकों को हर तरह के अधिकार प्राप्त है l एक फ्री प्रेस है और विरोध का अधिकार है l इस बार राष्ट्रपति के चुनाव के दौरान हुई हिंसा और वाइट हाउस में ट्रम्प समर्थक द्वारा किया गया उत्पात, लोकतंत्र के लिए एक काला अध्याय था l कहने को तो भारत में भी हर नागरिकों को हर तरह के अधिकार है, पर उन अधिकारों पर अंकुश ज्यादा है, जिससे वें अधिकार सीमित हो कर संकुचित हो गए है l पर फिर भी भारतीय लोकतंत्र को दुनिया में एक सफल मॉडल के रूप में देखा जाता है l इसका मुख्य कारण है, यहाँ का एक संघीय ढांचा, जिसके उपर सभी को विश्वास है l राज्य सरकारों और केंद्र के बीच सहमती के लिए संविधान में व्यवस्था और न्यायपालिका पर विश्वास ने यहाँ के लोगों को गणतंत्र के इसी तरह के मॉडल पर सहमति व्यक्त की हैं l भारत एक विभिन्न संस्कृति वाला देश है, जहाँ अनेकों राज्यों में भाषाई लोग विराज करते हैं l इतनी विविधता के बीच भारत मॉडल का सफल होना, एकता में अनेकता का द्वोतक है l इसके बावजूद भी यहाँ एक असहमति के बादल फैले हुए है l असहमति विचारों की भी है और कार्यों की भी हैं l अब सिघु बॉर्डर पर पिछले करीब 60 दिनों से किसान कानूनों के विरोध में आंदोलन कर रहे किसानों की और पूरा देश देख रहा हैं, पर कोई समाधान नहीं निकल रहा है l असम में तिनसुकिया में मिसिंग समुदाय के लोग पिछले 31 दिनों से स्थाई पुनर्वास के लिए खुले में आंदोलन कर रहे हैं l इन सब के बीच भी लोकतंत्र मजबूती से भारत में विराज कर रहा है l      

Friday, August 7, 2020

बहुसंख्यक लोगों की एक मुराद पूरी हुई

 

बहुसंख्यक लोगों की एक मुराद पूरी हुई

चाहे कोई कुछ भी कहे, पर 5 अगस्त को राममंदिर के निर्माण की आधारशिला जब रखी गयी, तब पूरी दुनिया में हिन्दुओं में ख़ुशी की लहर देखने को मिली l विश्व भर में करोड़ों लोगों ने इसका सीधा प्रसारण देखा l देश के कुछ घोर चरमपंतियों में इसे लोकतंत्र की हत्या बताया तो कुछ ने प्रधानमंत्री पर शपथ तोड़ने का आरोप लगाया l हद तो तब हो गयी, जब पाकिस्तान ने मंदिर निर्माण को  बहुसंख्यकवाद करार दे दिया और जम कर विष वमन किया l सत्य यह है कि देश भर में बहुसंख्यक हिन्दु राम मंदिर निर्माण को लेकर हमेशा से ही संवेनशील रहे, और चाहते थे की राम मंदिर का निर्माण शीघ्र हो l अगर इतनी शीघ्रता नहीं थी, तब 6 दिसंबर सन 1992 को बिना कोई मशीनी ओजार के उपयोग से कार सेवक, एक बनी हुई ईमारत को अपने हाथों से नहीं गिराते l यह एक धार्मिक आस्था का प्रश्न ही महज नहीं था, बल्कि एक बहुसंख्यक हिन्दू देश के लोगों की पहचान का सवाल भी था l जब आक्रान्ताओं ने देश के अस्थतिव को मिटने की चेष्टा की और सभी प्रतीकों को नष्ट कर दिया, तब भी वें बहुसंख्यक लोगों की भावना को बदल नहीं सके, और दुबारा से धार्मिक आस्थाएं प्रबल रूप से संचित हो गयी हैं l इतना ही नहीं ढांचा गिरने के पश्चात भी बहुसंख्यक लोगों ने उच्चतम न्यायालय के फैसले का इंतजार किया और फैसले के आने के पश्चात ही मंदिर निर्माण का कार्य प्रारंभ किया l नहीं तो मंदिर निर्माण के अपने वादे के साथ एक बहुमत के साथ सत्ता में आने वाली एक पार्टी बड़ी आसानी से एक अध्यादेश जरी करके मंदिर निर्माण करवा सकती थी, पर उसने ऐसा नहीं किया, क्योंकि उसे विश्वास था की सत्य की जीत होगी और निर्णय बहुसंख्यक लोगों के हक़ में ही आएगा l भारत और नेपाल में राम सामाजिकता का हिस्सा है, जब किसी से नेपाली भाषा में पूछा जाता है कि कैसे हो, तब सामने से जबाब आता है राम्रो छो !!, यानी अच्छा हूँ l राम अच्छाई का प्रतिक है l यह पश्चिम एशिया में वास करने वाले बहुसंख्यक लोगों के जीवन यापन करने का तरीका है, जिसमे राम शब्द सनातन है, सिर्फ ईश्वरीय नहीं बल्कि अभिवादन करने का तरीका है, सामाजिकता है, जिसे बहुसंख्यक समाज ने सिद्दत से अपने जीवन में आत्मसात किया है l राम राज्य की कल्पना किसी चरम हिंद्वादी चरित्र मात्र का एक स्वप्न नहीं है, एक ऐसे समाज की कल्पना है, जहाँ सभी मनुष्य आपस में प्रेम करें और अपने अपने धर्म का पालन करके एक आदर्श शासन की स्थापना की जाय l इस शब्द के साथ एक दिनचर्या जुड़ी है l ना जाने कितनी ही बार दिन में बहुसंख्यक समाज राम राम के उच्चारण को अनायास की करतें हैं, जिसका कोई धार्मिक महत्त्व नहीं भी हो सकता हैं l क्या इसको हम लोकतंत्र की हत्या कहेंगे l क्या किसी कानून से या सेकुलर शब्द के जुड़ने से बहुसंख्यक आबादी के आचार व्यवहार और सभ्यता को बदला जा सकता है l शायद नहीं, संयम और सहिष्णुता का प्रतिक रहा हिन्दू समाज हर जाति, धर्म के लोगों को अपने साथ रहने का सामान अवसर देता है, जिससे जीव मात्र की सेवा हो सके l पुरे दक्षिण एशिया क्षेत्र में राम नाम और उनसे जुड़ी हुई तमाम किंवदंतियां छिपी हुई है, जिन पर अभी भी शोध चल रहा हैं l कंबोडिया देश में अंकोरवाट मदिर एक पर्यटन क्षेत्र है, जिस पर भारतीय संस्कृति और धर्म ग्रंथों के के प्रसंगों के चित्रण है l इंडोनेशिया विश्व के एक देश है जहाँ भारतीय संस्कृति और हिन्दू धर्म का प्रचार आज भी है l

राम मंदिर के निर्माण कार्य शरु होने से भाजपा का एक चुनावी वादा पूरा होने जा रहा है l अनुछेद 370 हटाने का अपना वादा वह पहले ही पूरी कर चुकी है l अब इसके सामने एक बड़ी चुनौती है, देश की आर्थिक स्थिति को दुबारा से पटरी पर लाना l घोर गरीबी की मार झेल रहे लोगों को कैसे देश की मुख्य धारा में शामिल करें, यह एक बड़ा प्रश्न हो सकता है उसके सामने l कोरोना काल में जो मजदुर वापस अपने गावं लौट कर आ गए है, उनके रोजगार के लिए क्या किया जा सकता है,  उनको दुबारा कैसे बसाया जा सकता हा, भाजपा का अगले कुछ वर्षों का यह एक एजेंडा हो सकता है l क्योंकि सब कुछ रामभरोसे तो छोड़ा नहीं जा सकता है l   

 

           


Saturday, July 25, 2020

कम खर्च करना ही एक नई जीवन पद्दति की मांग है


कम खर्च करना ही एक नई जीवन पद्दति की मांग है
पुरे विश्व में कोविद 19 संकट के शुरू होने के पश्चात अंग्रेजी का दो नए शब्द इजाद हुए l न्यु नार्मल(नया सामान्य), जिसके मायने है कि कोविद संकट के पश्चात चलने वाली जिंदगी और उसके नए नियम l शायद ही किसी को पता था कि जीवन में कुछ ऐसा बड़ा संकट आएगा, जिसमे हर क्षेत्र में उथल-पुथल मच जाएगी और मानव और जीव-जंतु अपने अस्तित्व के लिए दुबरा संघर्ष करते हुए दिखाई देंगे l इस पृथ्वी के अस्तित्व के आने के पश्चात, पिछले पचास करोड़ वर्षों में, इसने पांच बार अपना संपूर्ण विनाश देखा है, जो कि हिम युग के पहले के युग से शुरू हो कर अभी के ‘छठवे विलुप्त’ होने की कगार पर है l कोविद संकट इसमें एक कड़ी है l पर हर बार पृथ्वी दुबारा से हरी-भरी हो कर उठ खड़ी होती है l इसमें जीवन के अति सूक्ष्म कण मौजूद है कि वें दुबारा जीवन से भर जाते हैं l यह बात तो तय है कि कोविद संकट के पश्चात हमारी जिंदगी पहले जैसी नहीं होगी l कई चीजे बदल जाएगी, जिसमे रहन-सहन के नए तरीके और जद्दोजहेद आधारित जीवन पद्दति होगी l यह माना जा रहा है कि कम खर्च करना और छोटी छोटी खुशिया ढूँढना अब नई सदी की मांग बन गयी हैं l नया सामान्य अब वो सामान्य नहीं है, जो उपभोक्तावादी संस्कृति पर टिका हुवा था l तीज-त्यौहार, शादी और अन्य समारोह अपनी परंपरागत तौर–तरीके को खोते हुए एक नए क्षतिज पर चढ़ गए है, जिसमे मार्केटिंग की चासनी से लिपटे हुए संस्कार उसके नए रक्षक बन गए है l अत्याधिक खर्च और दिखावे से त्रस्त माध्यम वर्ग और निम्न माध्यम वर्ग को कई त्योहार बोझ से लगने लगे है l इतना ही नहीं, शादियों में जरुरत से ज्यादा दिखावे ने लोगों के बजट को बुरी तरह से बिगाड़ कर रख दिया है l एक नए सामाजिक परिवेश की सृष्टि हो गयी है, जिसे मध्यम वर्ग नकारने के लिए तैयार है, पर उपभोक्तावादी संस्कृति उसे बार बार ऐसा करने से रोक रही है l जब देश में लॉकडाउन शुरू हुवा था, तब ऐसी सैकड़ो शादियों के महंगे रिसेप्शन कैंसिल हो गए थे, जिनमे हजारों के तादाद में मेहमान बुलाये गए थें l कई शादियाँ आगे की तिथि पर पुनर्निर्धारित हो गयी थी l लॉकडाउन के दौरान हमने कईयों की बारात जाते देखा, जिसमे कुल बीस लोग ही शामिल थे l शायद ‘नया सामान्य’ युग में एक सामान्य शादी ही एक जरुरत बन गयी है l मेहमानों को नहीं बुलाये गए, और किसी को कोई आपत्ति भी नहीं हैं l ऐसा इसलिए हुवा, क्योंकि समय की मांग है l अब इस नए सामान्य के दौर में तीज त्यौहार और मंगल को किस तरह से मनाये, इसके तरीके भी हमे ही खोजने हैं l कोविद एक अवसर बन सकता है, एक सामाजिक बदलाव का और एक नए समाज सुधार का l इसमें किसी दल संगठन की आवशयकता नहीं है, खुद ही हम इस नए अवसर का साक्षी बन, कल्पना के घोड़ों को दौड़ना है, जिससे सचमुच उत्सव की तरह लगे हमारे तीज त्यौहार l सभी लोग एक खुली हवा में सांस ले सके l जिनके पास कम है, वे भी और जिनके पास भरपूर है, वे भी l
स्नान, दान, परिमार्जन, पुण्यार्जन और वरण हमारे दर्शन से उठाये हुए कुछ अवसर है, जिनको हम अपनी संस्कृति का एक मुख्य अंग मानते आये हैं l कोविद के समय में सभी त्योहारों को घरों से मानाने पर मजबूर है l शादियों के मामले में स्थितियां थोड़ी भिन्न हैं l जब आमदनी के साधन संतुलित हो गए है, ऐसे में महंगे आयोजन की कल्पना करना चाँद को हाथ से पकड़ने जैसा हैं l एक प्रस्ताव आया है कि वर और वधु, दोनों पक्षों की आपसी सहमती से, शादी का आयोजन एक ही दिन में संपन्न हो, दिन में शादी और शाम को घर के लोगों के बीच पार्टी l प्रस्ताव में इसलिए दम है , क्योंकि शादी सप्तपदी और मंत्रोच्चारों के बीच संपन्न होने वाली क्रिया है, जिसको बड़ी सिद्दत से निभाया जाता है l दूसरी रस्मों को छोटा करके उनमे आवश्यक बदलाव किया जा सकता है l तभी हम यह कह सकते है कि हमने नए समान्य की और एक सार्थक कदम उठाया है l शादी विवाह पर इस चर्चा को करने के पीछे उद्देश्य यह है कि एक नई पहल आजकल के पढ़े-लिखे शिक्षित लोग करना चाहतें है l यह चर्चा इस लिए भी जरुरी है क्योंकि, पानी अब सिर से उपर चला गया है l माध्यम वर्ग अब त्रस्त हो कर बदलाव की उम्मीद कर रहा है l


Friday, June 26, 2020

शहर से कोरोना को निकालना जरुरी है


शहर से कोरोना को निकालना जरुरी है
असम की राजधानी गुवहाटी में कोरोना संक्रमण के मामले तेजी से बढ़ रहें है, जिसकी वजह से सोमवार से 14 दिनों का लॉकडाउन लगाया गया है l मुंबई में स्थित एशिया की सबसे बड़ी बस्ती धारवी में संक्रमण का सबसे बड़ा खतरा था, क्योंकि वहां पर जनसँख्या घनत्व इतना ज्यादा था कि लोग एक दुसरे के संपर्क में लगातार आ रहें थे l पर महाराष्ट्र सरकार ने संक्रमण का तेजी से पीछा करते हुए एक कारगर योजना के तहत काम करते हुए, वहां संक्रमण को फैलने से रोकने में सफल हुई l इसका मुख्य कारण था संक्रमण को पहली अवस्था में ही रोकना l मुंबई के नगर निगम में वहां पर स्थाई शिविर लगा दिए, जिसमे डॉक्टरों की टीम मुश्तैदी से कार्य कर रही थी l गुवाहाटी में भी अब मामले बढ़ने से सभी वार्डों में टेस्टिंग शिविर लगाये गए हैं, जिसमे आम आदमी अपना स्वाब टेस्ट करवा सकता हैं l धारवी मॉडल कुछ निश्चित बिन्दुवों पर आधारित था- संक्रमण पर निगाह रखना, उसपर तेजी से वार करना और फिर संक्रमित को अलग कर उसका इलाज करना l धारावी में जब कोरोना फैलना शुरू हुआ तो धीरे-धीरे पूरा इलाका ही कंटेनमेंट जोन बन गया। उसके बाद से प्रशासन ने जैसा काम किया, उसने पूरी तस्वीर ही बदलकर रख दी। अप्रैल से अब तक 47,500 घरों में जाकर अधिकारी लोगों के शरीर के तापमान और ऑक्सिजन की जांच कर चुके हैं। लगभग सात लाख लोगों की स्क्रीनिंग हो चुकी है। जिनमें थोड़े बहुत लक्षण दिखे, उन्हें क्वारंटीन सेंटर बनाए गए स्कूलों और स्पोर्ट्स क्लब्स में भेज दिया गया। असम में भी स्वास्थ्य विभाग ने कोविद संक्रमण को जिस तरह से संभाला है, उसकी चर्चा पुरे देश में हैं l स्वास्थ्य मंत्री में अपने पूरा समय कोरोना संक्रमण को रोकने में दे रहे है, जो काबिले तारीफ है l लगता है कि गुवाहाटी में भी धारवी मॉडल को अपनाया जा रहा है, जिसके के परिणाम हमे आने वाले दिनों में देखने को मिल जायेंगे l जनसँख्या घनत्व वाले इलाकों में सबसे पहले लॉकडाउन लगाया गया l जिन इलाकों में सामाजिक दुरी बनाना मुश्किल है, वहां पर स्वास्थ्य विभाग को कारगर ढंग से कार्य करना होगा l अब पुरे गुवाहाटी में लॉकडाउन की घोषणा की गई है l
कोरोना के बढ़ते संक्रमण के दौरान पिछले दिनों देश ने चीन सीमा पर अपने 20 सैनिक खो दिए l पाकिस्तान के साथ लगातार एक छद्म युद्ध जारी है, जिसकी वजह से पाकिस्तान सीमा पर रुक रुक कर बिना के चेतावनी के होने वाली का गोलीबारी से हर दफा सैनिक शहीद हो जातें है l उधर चीन के उकसावे पर भारत के एकमात्र हिन्दू निवासियों के देश नेपाल ने भी सीमा विवाद खड़ा कर दिया है l कहते है कि वामपंथियों की सरकार ने चीन का खुला समर्थन किया है l दुश्मन के दोस्त को अपनी तरफ करके चीन अपनी कुटिल चाल में सफल हो गया है l इसके अलावा पिछले मार्च से देश भर में जारी लॉकडाउन की वजह से लोग परेशान हो ही रखे हैं l कईयों ने अपने व्यापार खोएं हैं l स्टार्ट अप से लेकर जमे-जमाये व्यापार को कईयों ने खोते हुए देखा है l असम में जब बाढ़ आती है, तब नदी के किनारे बाढ़ के बढे हुए पानी से फ़ैल जाते हैं l भू क्षरण हो कर किनारे पर बसे हुए मकान कई बार नदी में बह जातें हैं l गुवाहाटी के करीब बसा हुवा पलाशबाड़ी भू कटाव का शिकार कई बार हो चूका हैं l इसके समीप कई गावं ब्रह्मपुत्र के बह गए थें l बाढ़ के दौरान कब कटाव हो जाय, कब पानी एकाएक घरों में घुस कर तबाही मचाने लगता है, इसका अंदाजा सहज ही नहीं लगता और एक मजबूत मकान भी अचानक नदी में समा सकता है l मकान का स्वामी अपनी किस्मत पर रोने के अलावा कुछ नहीं कर पाता l कोचकडाउन के बाद कई लोग, जो आमतोर पर एक सम्मान भरी जिंदगी गुजार रहे थें, मानसिक रूप से टूट कर अवसाद में घिर गए है l बोलीवुड में उभरते हुए होनहार कलाकार सुशांत सिंह राजपूत कुनबा-परस्ती का शिकार हो गए और मानसिक रूप से टूट कर उन्होंने आत्महत्या कर ली l लॉकडाउन के बीच देश में इस तरह की विचलित करने वाली घटनाओं से लोग अलग से परेशान हैं l घरेलु हिंसा, बलात्कार और चोरी-डैकेती की घटनाएँ कम नहीं हुई l लगता है कि अपराध करने की प्रवृति कोरोना के संक्रमण के संकट के दौरान भी विद्यमान है l या, इसको इस तरह से कहेंगे कि अपराध के लिए एक नया दल बन गया है, कुछ बेरोजगार हो कर अपराधिक गतिविधियों में संलग्न हो गए हैं l पर इसे हमारे सभ्य समाज की सबसे बड़ी विफलता नहीं कहेंगे तो क्यां कहेंगे l

Friday, May 29, 2020

इस समय गुड गवर्नेंस ही एक मात्र उपाय


इस समय गुड गवर्नेंस ही एक मात्र उपाय

लोकप्रियता के मामले में मोदी सरकार को पुरे नम्बर देना उचित होगा l भाजपा 2.0 सरकार के पश्चात एक वर्ष बीत जाने के बाद भी जोश बना हुवा है l लोकतंत्र में सरकारी इच्छा शक्ति का बहुत बड़ा महत्व है l कोरोना के संकट के दौरान भले ही मजदूरों के मामले में उसकी थोड़ी किरकिरी हुई है, पर कोरोना महामारी से निपटने के लिए उसके द्वारा किये गए उपायों से सरकार को अन्तराष्ट्रीय स्तर पर काफी ख्याति मिली है l चार प्रमुख विषयों पर सरकार को शाबाशी भी मिली तो उसकी घोर आलोचना भी हुई l कश्मीर से अनुछेद 370 और 35ए हटाना, नागरिकता संसोधन 2016, ट्रिपल तलाक और कोविद l 2.0 को हम दो भागों में बाँट सकते है, कोविद के पहले का समय और कोविद के आने के पश्चात का काल l पहले जो राजनीतिक निर्णय लिए गए थे, उसी देश में आन्दोलन का ही दौर चला, एक वर्ग इतना असंतुष्ट था कि उसने लगातार आन्दोलन ही किये l नागरिकता संसोधन बिल और राष्ट्रिय नागरिकता पंजी का नवीनीकरण दो ऐसे विवादित निर्णय थे, जिन पर भारी जन विरोध हुवा हैं l पर अनुछेद 370 और 35ए के हटने और ट्रिपल तलाक को लेकर सरकार के निर्णय पर भारत कि आम जनता ने दिल खोल कर स्वागत किया l दरअसल में, जम्मू कश्मीर और लद्दाक क्षेत्र के विकास के लिए यह एक महत्वपूर्ण कदम था l घाटी में हर वर्ष एक बड़ी राशि बजट में विकास के लिए आवंटित होती थी, जिसका समुचित उपयोग नहीं होता था, नतीजा गरीबी और सरकार के प्रति आक्रोश l इसको इस तरह से भी समझ सकते ही कि अस्सी के दशक में जब असम में छात्र आन्दोलन जोरो से था, और एक सशस्त्र गोरिल्ला युद्ध की तैयारी भी लगभग पूरी हो चुकी थी, तब आम जन में यह समझाया गया कि केंद्र सरकार सभी विकास के मसलों पर रुकावट बन कर खड़ी है, पर राज्य सरकार जनता के साथ है, तब अन्दोलान्कर्ताओं द्वारा आन्दोलन के दौरान केन्द्रीय सरकार के अधीन सम्पतियों को नुकसान पहुचाया जाता था, केंद्रीय सुरक्षा बालों को निशाना बनाया जाता था, केंद्र के मंत्रियों के आगमन पर काले झंडे दिखाए जातें थे l प्रजातंत्र में यह भी एक दुखद पहलु है कि विकास की बयार गावं तक ना पहुचे और इसका ठीकरा हमेशा केंद्र सरकार पर फोड़ा जाए l जबकि समुचित विकास के लिए एक तंत्र बनाया अगया है, जो जिला मजिस्ट्रेट से लेकर गावं पंचायत प्रधान तक जाता है l इसका सीधा कंट्रोल राज्य सरकार के पास रहता है l अगर तंत्र सही तरीके से काम नहीं करेगा, तब आधा अधुरा विकास ही हमें मिलेगा l नारों और जुमलों से बहुत अधिक दिनों तक सरकार नहीं चल सकती l कोविद एक वैश्विक महामारी है, भारत अब चीन के आंकड़ों को पछाड़ कर आगे बढ़ चूका है l इतने बड़े देश में जहाँ जनसँख्या घनत्व इतना ज्यादा है, वहां महामारी से निबटने के लिए सरकार में कोई कसर नहीं छोड़ी है l यह बात अलग है कि महामारी के दौरान विस्थापित हुए मजदूरों को ठीक तरह से संभाला नहीं जा सका l बीच में राजनीति जो आ गयी थी l राज्यों के साथ बेहतर संवाद के बावजूद विपक्ष ने सरकार की योजनाओं पर पानी फेरने के लिए पूरा प्रयास किया l पर लॉकडाउन के समय को लेकर सरकार का मानना है कि उसने सही समय पर लॉकडाउन की घोषणा की है, जिससे लाखों लोगों की जान बचाई जा सकी हैं l विकसित देशों के बनिस्पत कोविद संक्रमण के बावजूद मृत्यु दर काफी कम रही l इससे लॉकडाउन की घोषणा को एक सही कदम माना जायेगा l किन्तु जब प्रवासी मजदुर पैदल ही सड़कों पर उतर आये, तब सरकार कोई त्वरित निर्णय नहीं ले पाई और नतीजा हमारे सामने है l अब सरकार ने श्रमिक स्पेशल ट्रेने चलाई है, जिससे लाखों मजदुर अपने घर पहुच सकें हैं l पर इसी बीच अफवाहों के बाजार इतना गर्म था कि जिन मजदूरों ने पैदल ही मार्च करने का निर्णय लिया था, वे अभी भी अपने गावं नहीं पहुच पायें है l मानव संसाधन की एक बड़ी हानी देश हो होगी, जिसका खामियाजा हम आने वाले दिनों में भुगतेंगे l
आने वाले दिनों में जब लॉकडाउन 4.0 समाप्त हो जायेगा, तब संभवतः लॉकडाउन 5.0 की भी, छुट के साथ घोषणा हो सकती हैं l इस समय चुनौती को अवसर बनाना होगा l कृषि एक ऐसा क्षेत्र है, जिस पर भारत का विश्वास टिका हुवा है l कृषि अब सिर्फ चावल-गेहूं उगाना नहीं है, इसमें कई तरह के उपक्रम आ गए हैं l पशुपालन, दुग्ध उत्पाद, हर्बल खेती, फ़ूड प्रोसेस्रिंग, मछली पालन, मधुमक्खी पालन, इत्यादि, कुछ ऐसे उपक्रम संचित हो गए है, जिनका एक बड़ा रेडीमेड बाज़ार उपलब्ध हैं l बीएस इस क्षेत्र में के बड़ी छलांग कि जरूरत है l कृषि आधारभूत संरचना को सुधारने के लिए जो घोषणा सरकार ने की है, उसको लागु करने के लिए सरकारी तंत्र को काम पर लगाना होगा l जिस तरह से कोरोना के संकट के दौरान पूरा सरकारी तंत्र दिन रात एक किये हुवे था, क्या मंत्री और क्या डिएम, सभी लगे हुए है, उसी तरह से देश की अर्थव्यवस्था को अगर दुबारा से पटरी पर लाना है, तब कृषि क्षेत्र को मजबूत बनाना होगा, जिससे वापस आये मजदुर भी अपनी जमीन पर खुद खेती कर सके l यह कार्य तभी हो सकेगा, जब सरकार कोरोना का ग्राफ गिरने के पश्चात अपने पुरे जज्बे से इस काम में लग जाएगी l         

Friday, May 15, 2020

कोरोना के बाद का एक आत्मनिर्भर भारत


कोरोना के बाद का एक आत्मनिर्भर भारत
हम यह आसानी से सोच सकतें है कि कोरोना महामारी के फैलने के दौरान आम आदमी किस मुसीबत में जीवन यापन कर रहा है l लाखों मजदूर जब सड़कों पर चल रहें है, उनके लिए इस समय कोई प्रोत्साहन पैकेज का कोई मतलब नहीं हैं l उनके लिए सहायता यही हो सकती हैं कि इस समय जरुरी यह है कि कैसे उनको अपने घर पहुचाया जाय l शायद केंद्र सरकार के पास इसकी कोई तात्कालिक योजना नहीं है l ‘आ अब लौट चले’ की तर्ज पर लाखों मजदूरों ने अपने मूल गावों की और पलायन किया हैं l इस समय इस बात की चिंता नहीं होनी चाहिये कि यह किसकी जिम्मेवारी है, क्योंकि जब मजदूर चल रहें है, तब वें किसी ना किसी राज्य कि सीमाओं में चल रहे होतें ही है, फिर इस बात पर बहस क्यों कि यह किसकी जिम्मेवारी है l इस समय हमारा बहुमूल्य मानवसंसाधन , जिसने आजादी के पश्चात से ही सूक्ष्म और लघु उद्योगों में अपने कर्मशक्ति से जान फूंकी है, और कभी भी संकट आया, तो डगमगाया नहीं l इस समय यह संकट एक महामारी का है, उपर से लॉकडाउन का चरण है l अगर राष्ट्रीय राजमार्गों पर चल रहे मजदूरों को सड़कों से बसों के जरिये अपने गंतव्य स्थानों पर नहीं ले जाया गया, तब प्रोतसाहन पैकेज का लाभ बाद में कौन उठाएगा l मजदुर तक तक थक हार कर हताश हो जायेंगे l कोरोना महामारी से जूझने के लिए राज्य सरकारों ने एक अभूतपूर्व योजनाबद्ध पद्दति के तहत पिछले छह महीनों में जुंझारू सैनिकों के तरह इस महामारी से लड़ा है l असम इसमें पुरे देश के समक्ष उदहारण बन गया है l राज्यों के मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों, अधिकारीयों  और स्थानीय निकायों ने अभूतपूर्व कार्य करके कोरोना महामारी से लड़ने के लिए अपने आप को प्रस्तुत किया है l इसमें आम नागरिकों की भूमिका को भी उतना ही सम्मान दिया जाना चाहिये, जितना अन्य सभी को l क्योंकि प्रोत्साहन के साथ सहयोग उन्होंने ही दिया हैं l
एक आत्मनिर्भर भारत के आह्वान प्रधामंत्री ने अपने पिछले संबोधन में दिया है l असम के मुख्यमंत्री यह कह रहे है कि जो मानव संसाधन लौट कर आया है, वें राज्य के लिए सम्पति(एसेट) है ना कि दायित्व(लाइबिलिटी) है l आत्मनिर्भर भारत को बनने के लिए सूक्ष्म, लघु और माध्यम दर्जे के उद्योगों को दुबारा से जीवित करने के उद्देश्य से ही सरकार ने प्रोत्साहन पैकेज प्रस्तुत किया है l प्रोत्सहन पैकेज की तीसरी किस्त में खेती, दुग्ध व्यवसाय, पशुपालन, मछली पालन और फ़ूड प्रोसिंग जैसे व्यवसायों को प्रमुखता दी गई हैं l वित्त मंत्री ने 11 अलग-अलग चरणों में कृषि और कृषि व्यवसाय से जुड़े क्षेत्रों को दी जाने वाली राहत राशि का ऐलान किया हैं l कृषि क्षेत्र के लिए एक लाख करोड़ रुपये, सूक्ष्म खाद्य संस्करण इकाइयों की मदद के लिए 10 हज़ार करोड़ रुपये और मछुआरों और पशुपालकों के लिए 20 हज़ार करोड़ रुपये के फ़ंड का ऐलान किया हैं l पर बड़ा सवाल यह है कि यह पैकेज कितने दिनों तक लागु किया जाएगा या इसकी मियाद कितने दिनों तक रहेगी l योजन के मद में रूपया समाप्त होने तक या फिर सरकार की इच्छा शक्ति रहने तक l जो मजदुर अपने काम को छोड़ कर लौटें है, यह तो तय है कि वें कम से कम एक वर्ष तक वापस अपने पिछले काम में नहीं लौटेंगे l उनको अपने घरों के आस-पास काम दिलवाने के लिए यह जरुरी है कि छोटे-छोटे कल कारखाने खुले, जिससे इन मजदूरों को खपाया जा सके l अब बड़ी बात यह है कि भारत में कई तरह की सामाजिक, क़ानूनी और समस्याएँ और अड़चनें है, जिससे एकाएक नयें उद्योगों का खुलना थोड़ा मुश्किल सा लगता है l सभी तरह की क़ानूनी अड़चने समाप्त हो, इसके लिए सरकार को विशेष पहल करनी होगी, तभी लघु उद्योग पनप पायेगा l इस प्रोत्साहन पैकेज से आर्थिक सहायता के अभाव में बंद होने की कागार पर पड़े हुए उद्योगों को एक नया जीवन मिल सकता हैं l विमुद्राकरण के पश्चात से ही भारतीय लघु उद्योगों की कार्यप्रणाली में शितिलिकरण देखने को मिल रही थी l उपर से कोविद ने बची खुची आशा पर भी पानी फेर दिया है l ऐसे कई उद्योग है जिनमे  बनने वाले उत्पादनों की मांग दुबारा से कब आएगी, यह एक लाख टाका का प्रश्न हो सकता है l मसलन उन माध्यम दर्जे के कारखानों पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है जो पेकिंग मटेरियल, प्रिंटिंग और अन्य सहायक उपकरण बड़े कारखानों के लिए बनाते हैं l उनमे कम करने वाले मजदूरों के लिए अभी संकट आया हैं l या तो उन मजदूरों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है, या फिर संकट की परिस्थिति को देखतें हुए, मजदूरों ने खुद ही पलायन कर दिया हैं l एक स्थिति यह भी है कि लघु उद्योग बिना मजदुर फ़ोर्स के दुबारा कैसे उठ पायेगा, यह भी एक विचारनीय प्रश्न है l ऐसे में ऐसे लघु उद्योगों के लिए यह योजना एक बड़ी राहत लेकर आएगी, इसमें कोई दो राय नहीं है l