Friday, July 3, 2026

असम में मारवाड़ी समाज का प्रकल्प श्री मारवाड़ी दातव्य औषधालय में मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा

 

श्री मारवाड़ी दातव्य औषधालय में हिमंत

श्री मारवाड़ी दातव्य औषधालय के 110 वर्ष पूर्ण होने पर आयोजित एक कार्यक्रम में असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा फैंसी बाज़ार के माछखोवा स्थित आईटीए सेंटर में आये थे l उन्होंने अपने भाषण में मारवाड़ी लोगों का 400 वर्षों का असम में बसावट का इतिहास तो रखा ही, साथ ही में साफ़ शब्दों में यह कहा कि मारवाड़ी को अगर कोई गाली देता है और उन्हें अना असमिया कहता है, तो उन्हें दुःख होता है l असम के साथ उनका गहरा और पुराना संबंध है, और 470 वर्ष पहले आये प्रथम मारवाड़ी सरदार विजय सिंह का उन्होंने जिक्र भी किया l इस कार्यक्रम में करीब एक हज़ार लोग आये थे, ज्यादातर मारवाड़ी समाज के लोग थे l उनके समक्ष राज्य के मुख्यमंत्री का मारवाड़ियों के अवदान को स्वीकारना इस बात की पुष्टि करता है कि मारवाड़ी एक जनगोष्ठी के रूप में असम में रह रही है और असम के सर्वांगीण विकास के लिए प्रतिबद्ध है l उन्होंने यह भी कहा कि मारवाड़ी समाज अपने उत्कृष्ट व्यावसायिक कौशल और अपनी मजबूत परोपकारी एवं सामाजिक सेवा की परंपराओं के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं l इन्हें भारत में सबसे बड़े परोपकारी समुदायों में से एक माना जाता है। उन्होंने बेहद साफ़ शब्दों में कहा कि आज मारवाड़ी असम के सामाजिक तानेबाने का हिस्सा बन गए हैं l श्री मारवाड़ी दातव्य औषधालय मारवाड़ी समाज का एक सेवा प्रकल्प है, जिसकी प्रसिद्धि इतर समाज में इसलिए है क्योंकि बेहद कम खर्चे में यहाँ रोगियों का उपचार होता है l एक समय में जब मारवाड़ी मेटरनिटी हॉस्पिटल खुला था, तब सामान्य रूप से बच्चा होने पर वार्ड में भारती होने पर केवल पांच सो रुपये ही खर्च आता था l आज भी वार्ड में उपचार का खर्च काफी कम ही नहीं, बल्कि उसमे उत्कृष्ट मानदंड का इलाज भी करवाया जाता है l फैंसी बाज़ार स्थित आउटडोर डिस्पेंसरी में तो दस रुपये में रोगियों को देखा जा रहा हैं l इत्तनी बड़ी सुविधा से लेश श्री मारवाड़ी दातव्य औषधालय अपनी स्थापना के 110 वर्ष पुरे कर रहा है l कोई भी संस्थान जब अपनी स्थापना के सौ वर्ष अतिक्रम कर लेता है, तब उसके द्वारा किये गए कार्यों की समीक्षा तो समस्त समाज करता ही है, साथ ही उसके स्थापना के समय जिन महानुभावों ने अपना योगदान दिया था, उनके प्रति कृतज्ञता भी ज्ञापन करता है l आज असम का मारवाड़ी समाज आज इस बात पर गर्व कर रहा है कि फैंसी बाज़ार गुवाहाटी स्थित श्री मारवाड़ी दातब्य औषधालय९(मारवाड़ी हॉस्पिटल के नाम से आजकल इसे संबोधित किया जाता है), आज अपने स्थापना के एक सौ दस वर्ष मना रहा है l इस एक सौ दस वर्ष की यात्रा इस बात के भी संकेत देती है कि इस अहिन्दी प्रदेश में भी परोपकार के उद्देश्य से एक समाज ने ऐसे प्रकल्प की स्थापना की है, जिसका लाभ समस्त लोगों को हो रहा है l फैंसी बाज़ार डिस्पेंसरी में हर वर्षग लगभग 72 हज़ार रोगियों का उपचार केवल दस रुपये की रजिस्ट्रेशन फीस के साथ किया जाता हैं l राज्य में जहाँ बड़े बड़े सरकारी अस्पतालों में रोगोयों का इलाज निशुल्क होता बताया जाता है, इस डिस्पेंसरी में सही में केवल दस रुपये में कुशल डोक्टरों द्वारा रोगियों को देखा जाता हैं l अगर समाज सेवा की मिशाल देखनी है, तब किसी को फैंसी बाज़ार स्थित मारवाड़ी दातव्य औषधालय आना चाहिये. जहाँ निशुल्क रक्त सर्करा जांच भी रोजाना सुबह 7 बजे से 9 बजे तक की जाती है l एक धर्मार्थ करने वाली जाति की मानवता की सेवा करने की एक सदी पुरानी जीवित विरासत है और हम सभी इसे समाज के लिए समय पर उन्नयन और प्रासंगिकता के लिए हमारे व्यक्तिगत योगदान के माध्यम से संरक्षित कर सकते हैं। समय के साथ मारवाड़ी हॉस्पिटल ने अपनी सेवा का विस्तार भी किया हैं l कई दानदाताओं ने अपने सीएसआर कार्यक्रम के तहत हॉस्पिटल को नए विस्तार में मदद भी की हैं l हॉस्पिटल ने हाल के दिनों में एक साधन संपन्न कार्डियोलॉजी डिपार्टमेंट की शुरुवात की है l उसने एक एम्आरआई मशीन की भी स्थापना की है l इसके अलावा, प्रसूति गृह को साधन संपन्न बनाया गया है, जिसका एक मात्र उद्देश्य है, हॉस्पिटल में रोगियों को पर्याप्त सुसिधा मिले l यहाँ एक आइविएफ़ केंद्र शुरू करने की दिशा में भी काम हो रहा है, जिसकी शुरुवात बहुत जल्दी होने वाली है l किसी भी हॉस्पिटल में इमरजेंसी विभाग उसकी रीढ़ की हड्डी होती है l मारवाड़ी हॉस्पिटल ने अपनी इमरजेंसी विभाग का विस्तार करने की दिशा में कदम बढाया है l अगर हम हॉस्पिटल के मिशन की ओर ध्यान देते है, तब पाते है कि यह हॉस्पिटल जाति, पंथ और धर्म से परे, मानवता की सेवा करता है, और उचित मूल्य पर बेहतरीन स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करना एवं संगठन के समग्र विकास को बनाए रखने के लिए कार्यक्षमता में लगातार सुधार करना तथा  विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में विस्तार करना और समाज के आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं पर सब्सिडी देना। पिछले बीस वर्षों में चिकित्सा के क्षेत्र में आई क्रांति के साथ एकरूप होने के लिए हॉस्पिटल ने आधुनिक मशीनों की स्थापना की है, जिससे बेहतर इलाज हो सके l इसने अपने लिए एक कुछ उच्च मापदंड बना लिए है, जिसके लिए प्रबंधन की टीम पूरी तन्मयता से कार्य कर कर रही है l रोगियों की स्वास्थ्य आवश्यकताओं अनुसार उच्च गुणवत्ता सेवा प्रदान करना। बेहतरीन सेवा के माध्यम से रोगियों की संतुष्टि सुनिश्चित करना, और रोगियों की गरिमा तथा अधिकारों की रक्षा करना। मुख्यमंत्री के संबोधन का वीडियो पुरे असमवासियों ने वायरल हुए विडियो के माध्यम से देखा है, जिसमे उन्होंने 10 से ज्यादा ऐसे मारवाड़ियों के नाम लिए, जो असमिया भाषा संस्कृति को समृद्ध कर रहे हैं l मुख्यमंत्री द्वारा मारवाड़ी समाज का लेखाजोखा पेश करना एक एतिहासिक घटना इसलिए मानी जाएगी, क्योंकि इस वक्त समूचे असम में जतियातावादी सोच वाले संगठनों ने मारवाड़ी के विरोध में मोर्चा खोल रखा हैं l मुख्यमंत्री के इस भाषण से उनको समुचित जबाब मिल गया है l

किसी भी समाज के लिए संयम रख कर इस तरह से सेवा प्रकल्पों को चलाते रहना, इस बात को दर्शाता है कि असम में मारवाड़ी समाज सिर्फ व्यवसाय के लिए ही नहीं आया हैं l उसकी यहाँ के समाज के प्रति भी कुछ कर्तव्य, जिसे वह बखूबी निभा रहा है l श्री मारवाड़ी दातव्य औषधालय यही कार्य कर रहा है l   

Saturday, March 7, 2026

नस्लीय टिप्पणियां दिल में छेद कर देती हैं

 

हाल ही में दिल्ली के मालवीय नगर में अरुणाचल की रहने वाली तीन छात्राओं के साथ जबरदस्त दुर्व्यवहार किया गया l वहां रहने वाले एक दंपति ने पूर्वोतर के लोगों के ऊपर भद्दी नस्लीय टिप्पणियां की, जिससे समूचे नार्थ ईस्ट के लोग इस समय महिला द्वारा की गई नस्लीय टिप्पणियों से आहत हैं l यह उनकी पहचान और संस्कृति पर सीधा प्रहार है, और उनकी नागरिकता पर वार है l तुम लोग नार्थ ईस्ट के हो ना..., तुम लोग ऐसे ही हो..l यह बात बार बार सुनना, इस बात के संकेत देता है कि कही ना कही एक ग्रंथि यह कह रही है कि नार्थ एस्ट के लोग भारत के मेनलैंड के लोगों से ज्ञान और शिक्षा के मायने में काफी नीचे हैं l इस तरह से पूर्वोत्तर के लोगों का मूल्यांकन करना, यहाँ के लोगों के प्रति एक विचलित मानसिकता को दर्शाता है l जब मालवीय नगर की उस महिला ने यह कहा कि नोर्थ ईस्ट की लडकियां मसाज पार्लर में काम करती है, हमारे यहाँ की नहीं.., तब उसने एक विभाजन की एक बड़ी लकीर खींच दी है, और एक निर्णय सुना दिया कि मसाज पार्लर नार्थ ईस्ट के लोगों की पहचान हैं l उनके अस्तित्व को एकाएक संकट में डाल दिया, दिल्ली की इस महिला रूबी जैन ने l यह एक संयुक्त निर्णय था, जिसे समूचे पूर्वोत्तर को एक अदालत में खड़ा कर दिया l इतना ही नहीं जिस मकान में तीनों अरुणाचली युवतियां रह रही थी, उसके दलाल ने बिना कुछ जाने तीनों युवतियों से बिल्डिंग खाली करने का भी निर्णय तुरंत सुना दिय l पूर्वोत्तर के बारे में अभी भी उत्तर भारत के लोगों को भ्रम और भ्रांतियां बनी हुई हैं l ज्यादातर लोगों को पूर्वोत्तर के बारे में पताही नहीं l यहाँ की संस्कृति, वेश-भूषा और भाषा कैसी है, उनको नहीं पता l बस पता है कि नार्थ ईस्ट कहाँ है, यह पता नहीं है कि नार्थ ईस्ट कैसा है और वहाँ के लोग कैसे हैं l कभी कभी ऐसा भी लगता है कि शेष भारत के लोगों को यहाँ की जमीनी हकीकत के बारे में जानने की इच्छा ही नहीं है, भूगोल और व्याकरण की बात तो छोड़ ही दीजिये है l नस्लीय टिपण्णी करना भारतीय लोगों का स्ववभाव बन चूका हैं l बंगाली, बिहारी, मारवाड़ी...इस तरह से किसी को संबोधन करना किसी के लिए भी एक आम बात हैं l जैसे नेपाली कह कर किसी को बुलाना, उसके चरित्र को दर्शाता है, एकाएक नेपाल से आये हुए एक युवक की छवि आँखों के आगे तैरने लगी है l मारवाड़ी कह कर सबोधन करना, इस बात को इंगित करता है कि व्यक्ति राजस्थान से उठ कर दुसरे प्रदेश में बस गया है और एक आगंतुक है l ऐसे हजारों वाकये घटित हुए है, जिनसे यह पता चलता है कि मनुष्य स्वाभाव से ही जातिवाद को बड़ी सिद्द्दत से पालन करता है और ताउम्र उसी को मानते हुए चलता है l इस जड़ता को दर्शाया है,दिल्ली के उस दंपति ने, और पुरे नार्थ ईस्ट के लोगों को ही कठघड़े में खड़ा कर दिया l इतना ही नहीं, उन्होंने नार्थ ईस्ट के लोगों को ‘एक गंदगी है की संज्ञा भी दे डाली l पूर्वोत्तर के लोगों को पुरे भारत में एक अलग कौम के रूप में देखा जाता है, जो उनकी वेशभूषा और संस्कृति तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि उनकी एक अलग इमेज गढने की चेष्टा भी की जाती हैं l उनके चरित्र हनन की कौशिश भी की जाती हैं l एक बार यूरो कप फाइनल में इंग्लैंड की हार के पश्चात उनके तीन काले खिलाडियों पर जातिय और नस्लभेदी टिप्पणियों ने समूची मानव जाति के समक्ष यह प्रश् ला कर खड़ा कर दिया कि कही इक्कीसवी सदी की समूची मानव जाति नस्ल, रंग, वर्ण, जाति, ऊँचे, नाटे, सफ़ेद, काले, कथई, नोर्डिक, अल्पाइन, मोंग्लोइड, ऑस्ट्रिक, जैसी नस्लों में बंटी हुई तो नहीं ? इस प्रश्न के पूछे जाने में कई संवेदनाएं छिपी हुई है l इतना ही नहीं, जब इटली के फेंस, स्टेडियम से जब जा रहे थे, तब उनपर जातिय फब्तियां कसी गयी और उनको धक्का भी दिया गया l इंग्लैंड ने अपने ही तीन काले खिलाडियों पर नस्लीय टिपण्णी कर यह साबित कर दिया कि विकसित या विकासशील कुछ भी नहीं होता, मनुष्य जाति में पृथकता कूट कूट कर भरी हुई है l वें झुण्ड में जरुर रहते है, पर झुंडों में भी छोटे छोटे झुण्ड बना लेते हैं l अलग अलग भाषा-भाषियों की तो बात ही छोड़ दीजिये, रंग का भेद अभी भी मनुष्य ह्रदय में विराजमान है l आमिर गरीब के भेद को समझा जा सकता है, घोर गरीबी विद्रोह पैदा करती है l कुछ लोगों के पास अकूट सम्पति जमा होने पर उनके प्रति घृणा सनेह सनेह पनप सकती है l दिल्ली में भी कुछ ऐसा ही हुवा l तीनों युवतियों के खिलाफ, अश्लील शब्दों की बौछार कर दी गयी, उनको धक्का दिया गया और राजनितिक प्रभाव डालने की कौशिश की गयी l यह उनकी घृणा है, पूर्वोत्तर के लोगों के प्रति l उनको निचले पायदान पर रखा जाता हैं l इस बात को समझना होगा कि पूर्वोत्तर के लोग अपनी कद काठी की वजह से भीड़ में पहचाने जाते हैं l यहाँ के सीधे सरल लोग देखने में भी सुंदर होते है और मीठी बोली बोलते हैं l भौगोलिक दुरी होने की वजह से यहाँ ऐसे लाखों लोग है, जिन्होंने अभी भी पूर्वोत्तर की भूमि के बाहर कदम नहीं रखा l दिल्ली कहाँ है, उनको नहीं पता l ऐसे लाखों पूर्वोत्तर के युवा है, जो देश भर में रोजगार करते है, जिनको जातिवाद का दंश सहना पड़ता हैं l दिल्ली में नार्थ ईस्ट के लाखों लोग रहते हैं l उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए या रोजगार के लिए या फिर व्यापार के लिए हर वर्षा लाखों लोग दिल्ली औरे दुसरे शहरों की ओर रुख करते हैं l शुक्रवार को निकले हुए यूपीएससी के परिणाम में नार्थ ईस्ट के 11 लोग उतीर्ण हुए है, जिनमे मणिपुर से 6 लोग शामिल हैं l नार्थ ईस्ट के लोगों के उपर नस्लीय टिपण्णी का वार सिर्फ अरुनाचाली युवतियों पर नहीं पड़ा, बल्कि पूर्वोत्तर में रहने वाले इत्तर भाषियों पर भी पड़ा है, जिन्हें दिल्ली के दंपति के दुर्व्यवहार की वजह से ताने सुनने पड़ रहे हैं l पूर्वोत्तर के सभी जातीय समूहों ने न्याय की मांग करते हुए यह कहा कि लड़ाई दो पड़ोसियों के बीच की नहीं है, बल्कि यह एक पहचान और अस्तित्व की लड़ाई है, जिसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता l  

Friday, August 9, 2024

दुनिया भर के छात्र आंदोलन एक विचार पर चलते हैं

 

    

छात्र आंदोलन एक विचार पर चलते हैं



बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुखिया नोबल शांति पुरस्कार विजेता मुहम्मद युनुस ने आंदोलन कर रहे छात्रों की भरपूर तारीफ की हैं और कहा कि छात्र उन्हें जो राह दिखलायेंगे, वे उसी राह पर चलेंगे l इतना ही नहीं सेना द्वारा समर्थित अंतरिम सरकार में छात्र आंदोलन के अगुवा दो छात्रों को जगह ही नहीं दी गयी, बल्कि उनको महत्वपूर्ण विभाग भी आवंटित किये गए हैं l पूरी दुनिया में इतिहास है कि छात्र आंदोलनों की वजह से सत्ता परिवर्तन देखे गए हैं l फ्रांस में 1960 में छात्र आंदोलन की वजह से उसके राष्ट्र नायक की देश छोड़ कर भागना पड़ा था l बांग्लादेश में भी यही हुवा l शेख हसीना को भी इस्तीफा दे करे देश छोड़ कर भागना पड़ा l छात्र आंदोलन एक विचार पर चलता है l असम में छह वर्षों तक छात्र आंदोलन चला l विचार था, असम की भूमि से विदेशी नागरिकों को हटाना और असम के नागरिकों के अधिकारों को सुरक्षित करना और असमिया लोगों के  लिए एक सुरक्षा कवच कायम करना l उल्लेखनीय है कि उन्नीसवीं सदी और खासतौर पर आज़ादी बाद यह क्षेत्र खास तरह के राजनीतिक पुनर्जागरण के दौर से गुज़रा, जिसने असम लोगों में अपनी भाषा, संस्कृति, साहित्य, लोक कला और संगीत के प्रति गर्व की भावना पैदा की। राज्य की सांस्कृतिक, भाषायी और धार्मिक विविधता को देखते हए ऐसा लग रहा था कि किसी एक भाषा और संस्कृति को मान्यता देना एक जटिल प्रक्रिया थी । एकीकृत असमिया संस्कृति की तरफ़दारी करने वाले बहुत से लोगों का यह भी मानना रहा है कि आदिवासी इलाकों को अलग से विशेष अधिकार देकर या मेघालय, मिजोरम, नगालैण्ड और अरुणाचल प्रदेश जैसे अलग राज्यों को निर्माण करके केंद्र सरकार ने एक व्यापक असमिया पहचान के निर्माण में रुकावट डालने का काम किया है। इसीलिए असम के युवाओं में केंद्र के प्रति एक नकारात्मकता और आक्रोश की भावना रही है l बांग्लादेश की तरह असम आंदोलन का नेतृत्व भी यहाँ के छात्र ही कर रहे थे l उसका केंद्र भी ढाका विश्वविद्यालय ही था l आंदोलनके समय आसू के मुख्य कार्यालय भी गौहाटी विश्वविध्यालय ही था l असम के छात्र भी स्थनीय लोगों के लिए नौकरियों में शत-प्रतिशत आरक्षण की मांग कर रहें थें l भूमि, रोजगार जैसे मुद्दे असम आंदोलनका मुख्य हिस्सा थे l असम आंदोलनके समय जब हितेश्वर सैकिया के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार ने दमनकारी निति से छात्र आंदोलन को दबाने की चेष्टा की, लेकिन  आंदोलन और अधिक प्रखर और जीवंत हो गया l राज्य के बुद्धिजीवियों ने खुल कर आंदोलन के पक्ष में बयान देना शुर कर दिया था l इसी बीच असम सरकार ने विधानसभा चुनाव भी करवाएं, पर उसका भारी विरोध हुवा और इतिहास बनने के पश्चात न्यूनतम मतदान होने के पश्चात हितेश्वर सैकिया असम के मुख्यमंत्री बने l पर आंदोलनरुका नहीं l पुरे देश में असम आंदोलनकी गूंज थी l अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं ने खुल कर आंदोलन कर समर्थन किया था l बांग्लादेश के छात्र आंदोलन और असम आंदोलनमें जमीन आसमान का फर्क है l बांग्लादेश के छात्र आंदोलन आरक्षण वरोधी आंदोलनकब हसीना हटाओं आंदोलनबन गया, इसका किसी को पता नहीं चला l एक बड़ा फर्क यह भी था कि असम आंदोलन गाँधी के सिद्धांतों पर कायम था l शांतिपूर्ण औरे विवेकपूर्ण l थोड़ी बहुत हिंसा को छोड़ कर ज्यादातर छह वर्ष तक चले आंदोलन के दिन शांतिपूर्ण रहे l यहाँ पर इमारतों को नहीं जलाया गया, गैर असमिया को नहीं मारा गया l बड़ी संख्या में रह रहे भारतीय मूल कर लोगों को किस किस्म का नुकसान आन्दोलनकारियों ने नहीं पहुचाया l उलटे, यह भी देखने में आया कि असम में रह रहे गैर असमिया लोगों ने आंदोलनका भारी समर्थन किया और 1983 में हुए चुनावों का बहिष्कार भी किया l आसू आज तक भी गैर असमिया लोगों के उस सहयोग को मान्यता प्रदान करता हैं l पुरे आंदोलन में 855 स्थानीय छात्रों की मृत्यु हुई, जो पुलिसिया बर्बत्ता के शिकार हुए l हजारों छात्रों को जेल भेजा गया और आंदोलन को दबाने की चेष्टा की गयी l राजनैतिक तौर पर और डंडे के जोर पर भी l जब केंद्र सरकार ने 1983 में असम में विधानसभा चुनाव कराने का फ़ैसला किया। इसका बड़े पैमाने पर बहिष्कार किया गया । इन चुनावों में बहुत कम वोट डाले गये। जिन क्षेत्रों में असमिया भाषी लोगों का बहुमत था, वहाँ तीन प्रतिशत से भी कम वोट पड़े। मतदान केंद्र सुने पड़े थे l कांग्रेस सरकार ने अलग अलग भाषाई लोगों में फुट डालने का कार्य करके आंदोलनको ध्वंश करने की असफल चेष्टा भी की l चुनावों के बाद कांग्रेस पार्टी की सरकार ज़रूर बनी, लेकिन इसे कोई लोकतांत्रिक वैधता हासिल नहीं थी। 1983 की नेल्ली कांड असम आंदोलन के बीच का एक हिंसक वाकया था, जो इतिहास के पन्ने पर दर्ज हो गया, जिसमे 3000 से ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतर दिया गया था l 15 अगस्त 1985 को केंद्र की राजीव गाँधी सरकार और आंदोलन के नेताओं के बीच समझौता हुआ जिसे असम समझौते के नाम से जाना गया। इसके तहत 1951 से 1961 के बीच आये सभी लोगों को पूर्ण नागरिकता और वोट देने का अधिकार देने का फ़ैसला किया गया। असमिया लोगों की सांस्‍कृतिक, सामाजिक, भाषायी पहचान व विरासत को सुरक्षित एवं संरक्षित करने के लिए असम समझोते में छह नंबर धारा महत्वपूर्ण है l फैसला यह भी हुवा कि जो लोग 1971 के बाद असम में आये थे, उन्हें वापस भेज दिया जाएगा। असम के आर्थिक विकास के लिए पैकेज की भी घोषणा की गयी और यहाँ ऑयल रिफ़ाइनरी, पेपर मिल और तकनीक संस्थान स्थापित करने का फ़ैसला किया गया। विधानसभा को भंग करके 1985 में ही चुनाव कराए गये, जिसमें नवगठित असम गण परिषद को बहुमत मिला। पार्टी के नेता प्रफुल्ल कुमार महंत, जो कि आसू के अध्यक्ष भी थे, मुख्यमंत्री बने। उस समय उनकी उम्र केवल 32 वर्ष की थी। छह वर्षों तक चले आंदोलनका एक सुखद अंत हुवाl

बांग्लादेश में कई बाहरी और अंदरूनी ताकतों ने छात्र आंदोलन के रुख को मोड़ा हैं l बांग्लादेश की मुक्ति के समय जमात ए इस्लामी पार्टी ने बांग्लादेश नेशनल पार्टी के साथ मिल आर बांग्लादेश की स्वतंत्रता का विरोध किया था l अभी उसके कैडरों ने आंदोलनके नाम अपर जम कर हिंसा की है और छात्र आंदोलनको हिंसक आंदोलन में बदल दिया l बड़े पैमाने पर बांग्लादेशी हिन्दू नागरिकों के घरों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों को क्षति पहुचाई l इतना ही नहीं, छात्रों ने सेना तक को यह सन्देश देना कि उनके समर्थन से ही बांग्लादेश में अंतरिम सरकार बनेगी, इस बात को रेखांकित करती है कि छात्रों के साथ बहुत से लोग अँधेरे में खड़े है, जो पीछे से उकसा रहे हैं l बांग्लादेश का छात्र आंदोलन अब पीछे रह चूका है l             

Friday, February 23, 2024

असम में हिंदी भाषियों को बार बार संघर्ष क्यों करना पड़ता हैं

 

असम में हिंदी भाषियों को बार बार संघर्ष क्यों करना पड़ता हैं

यह प्रश्न हर बार की तरह इस बार भी पूछा जा रहा है कि असम में सामुदायिक हिंसा इतनी आसानी से क्यों भड़क जाती है l क्यों वर्षों से रह रहे विभिन्न भाषा-भाषी लोगों के बीच रिश्तों के तार इतने कमजोर है कि जरा सी चिंगारी उनके बीच आग पैदा कर देती है और लोग एक दुसरे के जान के दुश्मन बन जाते हैं l इस बार मामला कार्बी आंगलोंग का है, जहाँ स्थानीय कार्बी जनजाति और हिंदी भाषियों के बीच इस समय तनाव चल रहा हैं l हिंदी भाषी संगठन अपनी सुरक्षा की मांग तो कर ही रहे है, साथ ही वें चाहते है कि सभी भाषा-भाषी के लोग आपस में मिल कर रहे और असम में शांति बनी रहे l कार्बी आंगलोंग में बड़ी संख्या में बिहारी समुदाय के लोगों के अलावा, बंगला भाषी और नेपाली समुदाय, बोडो जाति और असमिया भाषी लोग पिछले 100 वर्षों से रहते है, और कार्बी आंगलोंग को अपना घर बना लिया हैं l कुछ असामाजिक तत्वों ने दोनों समुदायों के बीच तनाव बढाने के उद्देश्य से एक स्थानीय युवक की उस समय पिटाई कर दी, जब कुछ स्थानीय लोग शांतिपूर्वक प्रदर्शन करके लौट रहे थे l मामला इतना गंभीर था कि हिंदी भाषी समुदाय के लोग और स्थानीय लोगों के बीच जबरदस्त तनाव बन गया है l उल्लेखनीय है कि कार्बी आंगलोंग में रहने वाले जनजाति के लोगों की सुरक्षा के लिए पहले से ही स्वायत परिषद् का गठन बहुत पहले कर चुकी हैं l असम के मध्य में स्थित इस जिले को मिनी इंडिया भी कहे तो गलत नहीं होगा, क्योंकि यहाँ पर हर जाति और समुदाय के लोग वर्षों से बड़े प्रेम भाव से रहते आये हैं l एक ऐसा सामाजिक तानाबाना बना हुवा है, जिसमे हर जाति और समुदाय का एक रोल है l फिर प्रश्न यह उठता है कि बार बार हिंदी भाषियों को क्यों टारगेट बनाया जाता हैं l कार्बी आंगलोंग प्राक्रतिक सुंदरता से भरपूर है l अगर उस क्षेत्र को पर्यटन क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाय, तब इलाके के लोगों की आय में निश्चित रूप से वृद्धि हो सकती हैं l    

देश की स्वतंत्रता के पश्चातपूर्वोत्तर की कई जनजातियों, जैसे नागामिज़ो बोडो आदि ने अपनी सांस्कृतिक पहचान के आधार पर अलग राज्यों के साथ-साथ पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करना शुरू कर दी थी l यहाँ गौर तलब है कि जब सन 1960 में जब राज्य सरकार ने असमिया भाषा को आधिकारिक भाषा घोषित कर दिया थातब बराक घाटी में आंदोलन शुरू हुवा था, समूचे असम में बड़े पैमाने पर हिंदी भाषियों पर अत्याचार हुए थे l कार्बी आंगलोंग में भी व्यापक हिंसा हुई थी l राज्य की विभिन्न जनजातियां और भाषाओं को बोलने वाले लोग खुद को अलग-थलग महसूस करने लगे थे। इससे आम लोग और स्थानीय विद्रोही समूह आंदोलित हो उठे थे l पूर्वोत्तर में नागा विद्राह की आज आज तक नहीं बुझी है l पूर्वोत्तर में नागालैंड और मेघालय राज्यों का गठन क्रमशः 1963 और 1971 में हुआ था। मेघालय के गठन के बादकार्बी आंगलोंग जिले को इसमें शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया थालेकिन असम से अधिक स्वतंत्रता के वादे के बाद जिले ने मेघालय में शामिल होने से इनकार कर दिया और असम के साथ रहने की ठानी l हालांकि, बाद में असम राज्य सरकार इस जिले को अधिक स्वायत्तता देने के लिए भारतीय संविधान की छठी अनुसूची के अंतर्गत कार्बी आंगलोंग जिला परिषद् बना और बाद में इसे एक स्वायत परिषद् बना कर कार्बी लोगों को अधिक स्वायतता देने की कौशिश की थी l पर विभिन्न दल संगठनों के खड़े होने से अगले कुछ दशकों में तक राज्य में उग्रवाद और आंदोलन का एक नया दौर शुरू हो गया। कार्बी आंगलोंग में हिंसा और हड़ताल का दौर शुरू हो गया था l  

सन 2021 में कार्बी आंगलोंग समझौते पर हस्ताक्षर में, इस जिले को अधिक स्वायत्तता का वादा किया गया है। इस समझौते के बाद, फिलहाल ये उम्मीद की जा रही है कि आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र में शांति और समृद्धि बनी रहेगी। समझोते के तहत राज्य सर्कार प्रति वर्ष 1000 करोड़ रूपये कार्बी आंगलोंग के विकास के लिए खर्च करेगी, जिससे पांच वर्षों तक जारी रखा जायेगा l संविधान के छठी अनुसूची के तहत सभी भूमि अधिकार स्वायत्त कोउसिल के पास है और कानून व्यवस्था राज्य सरकार के पास है l समस्या उस समय विकत रूप ले लेती है, जब करीब 100 वर्षों से रह रहे 10 हज़ार गैर कार्बी लोगों को सरकारी भूमि से बेदखल किया जा रहा था l उस भूमि पर सैकड़ों कच्चे-पक्के घर, मंदिर, मस्जिद पहले से ही बने हुए हैं l हिंदी भाषी समुदाय के घरों को उजाड़ने के अलावा, वहां पर कई घरों को असामजिक तत्वों ने आग लगा दी और घरों में रह रहे लोगों को वहां से खदेड़ दिया गया l ग्राजिंग भूमि पर बने हुए यह घर जिनकी संख्या करीब 10 हज़ार है, उस भूमि पर स्वायत्त शासित परिषद् का अधिकार जरुर है, पर वर्षों से रह रहे वहां पर लोगों के पास बिजली पानी का कनेक्शन बहुत पहले से हैं l इलाके में 27 मंदिर और एक मस्जिद और कई स्कुल भी हैं l सबसे बड़ी बाटी यह है कि इनमे एक भी अवैध नागरिक नहीं है, जिनको राज्य सरकार चर इलाके से हटाती है l पिछले 90 वर्षों से रह रहे लोग शत प्रतिशत भारतीय नागरिक है और अन्य लोगों की तरह उनके पास भी समान अधिकार मौजूद हैं l  

असम को एक आंदोलन की भूमि अगर कहे, तब कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी l भाषा आन्दोलन के पश्चात, यहाँ पर बंगला भाषियों के प्रति नफरत के भाव भी देखे गए थे l हालाँकि असम आंदोलन की पृष्ठ भूमि यही थी कि असम से विदेशी नागरिकों की पहचान करके उनको यहाँ से हटाया जाय l पर छह वर्षों तक चले आन्दोलन के द्वरा भी लाखों बंग भाषी अवैध विदेशी लोगों को यहाँ से भगाया नहीं जा सका l उपर से बड़ी संख्या में रह रहे हिंदी भाषियों पर समय समय पर प्रताड़ना होती रहती हैं l पुरे राज्य में बड़ी संख्या में रह रहे हिंदी भाषियों ने सभी समुदाय के साथ मैत्रीपूर्ण रिश्ते कायम किये और शांतिपूर्वक अपना जीवन यापन किया हैं l सच्चाई यह भी है कि व्यापार और अपनी लम्बी कद काठी की वजह से वें आसानी से पहचाने जाते है और अक्सर बाजारों में व्यापार करते हुए दिखाई दे जाते हैं l समय के साथ शिक्षा के प्रचार-प्रसार के साथ स्थानीय लोगों ने भी शिक्षा के महत्त्व को समझा है और वें भी अपने बच्चों को उच्च शिक्षा प्राप्त करने हेतु देश की नामी-गिरामी संस्थानों में भेजने लगे और देश की मुख्यधारा में शामिल होने का प्रयास करने लगे हैं l शिक्षा ने सभी को अच्छे बुरे के फर्क को धीरे धीरे समझा दिया है l पर सत्य अभी भी यही है कि यहाँ आन्दोलन के बिना पत्ता भी नहीं हिलता l फिर भी असमिया मुख्यधारा में शामिल रह कर असमिया अस्मिता की रक्षा करने के वचन जिन लोगों ने भी लिया है, वे असम के सच्चे हितेषी है l जो लोग राष्ट्र विरोधी लोगों के साथ बैठ कर मंच पर बड़ी शान से मुछों को ताव देतें है, उनको किस तरह की संज्ञा दी जाए, प्रश्न यह भी है lथोड़े थोड़े दिनों में जातिगत हिंसा होने से राज्य के विकासकार्य में बाधा आनी स्वाभाविक है l

इसमें कोई दो राय नहीं है कि वर्षों से रह रहे हिंदी भाषियों ने राज्य के विकास में उतना ही योगदान दिया है, जितना की अन्य लोग दे रहे हैं l उनके योगदान की समीक्षा कभी भी नहीं की गयी l इस समय राज्य सरकार के पास चुनौती यह भी है कि वह कैसे इस मामले का यह न्यायपूर्ण तरीके से समाधान करे, जिससे हिंदी भाषियों को यह विश्वास हो जाय कि जिस राज्य में वें वर्षों से रह रहे है, वह उनके अधिकारों की सुरक्षा तो करेगी ही, साथ ही उनको एक सम्मानजनक जीवन जीने के लिए मार्ग प्रशस्त्र करेगी l इस समय हिंदी भाषी संगठनों ने राज्य सरकार से गुहार लगे है और पीड़ितों की सुरक्षा और मुवावजे की मांग की हैं l