Wednesday, February 10, 2021

पूर्वोत्तर के कई छोटे कस्बों और शहरों में लोगों को अपने बच्चों के लिए उपयुक्त जीवन साथी ढूंढने में क्यों असुविधा हो रही हैं

 


यद्यपि समाज सुधार के कई कार्यक्रम और परिचर्चाएं मारवाड़ी समाज की प्रतिनिधि संस्थाएं विगत कई वर्षों से पृथक पृथक करती आई है, पर पिछली 26 जनवरी को मोरानहाट के समस्त मारवाड़ी समाज ने एक ही छत के नीचे समाज के एक ज्वलंत समस्या को सभी के समक्ष चर्चा के लिए रखा l विषय था, ‘छोटे गावों और कस्बों के बच्चों के विवाह संबंधों में आ रही कठिनाइया’ l मोरानहाट के उत्साही युवा विमल अगरवाल के प्रयास से मोरानहाट की श्री राधाकृष्ण विवाह भवन समिति. मारवाड़ी सम्मलेन, मारवाड़ी महिला सम्मलेन और मारवाड़ी युवा मंच के तत्वाधान में एक बड़ी परिचर्चा गणतंत्र दिवस के दिन संपन्न हुई l यहाँ सबसे बड़ी बात यह हुई कि समस्त मोरानहाट के समाज एक साथ खुल कर इस समस्या पर विवेचना कर रहे थें l विगत में मारवाड़ी युवा मंच और मारवाड़ी सम्मलेन ने अपने समाज सुधार कार्यक्रम के तहत ऐसी परिचर्चाएं आयोजित की गयी थी, पर समाज के सभी घटकों को एक छत पर लाना दुस्कर कार्य साबित हुवा और प्रयास असफल होते गए l मारवाड़ी युवा मंच को समाज सुधार कार्यक्रम सन 1991 में एक आंशिक सफल कार्यक्रम के रूप में देखा जाता है, जब समाज कि इस प्रतिनिधि संस्था ने समाज में लड्डू नहीं बांटने का एक अभियान चलाया था l उस कार्यक्रम कि एक जबदस्त प्रक्रिया देखने को मिली थी l समाज का एक वर्ग इस का जबर्दस्त विरोध कर रहा था l बहुत ज्यादा विरोध होने के पश्चात मारवाड़ी युवा मंच ने इस कार्यक्रम को स्थगित कर दिया था l पर ज्यों ज्यों दवा डी, त्यों त्यों मर्ज बढ़ता गया वाली कहावत मारवाड़ी समाज पर सिद्ध होती चली गयी l समाज में जो अघोषित तंत्र था, वह टूट कर चरमरा गया l बच्चों के संबंधों को करवाने के लिए कोई भी मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए तैयार नहीं होना, इस बात का गवाह है कि स्थिति कितनी गंभीर हो गयी हैं l आज हालात यह हो गए है कि गावों और छोटे शहरों के बच्चों के विवाह होने मुश्किल हो गए है l कारणों को अगर ढूंढने जाए, तब पाएंगे कि एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव पढ़ी लिखी लड़कियों पर पड़ चूका है कि छोटे शहरों में सविधाओं का आभाव हैं l

मोरानहाट की इस सभा में टाउन के तमाम बड़े-छोटे संस्थाओं के पधाधिकारी, कार्यकर्त्ता और आमजन उपस्थित थे, जिन्होंने सिर्फ समस्या पर विवेचना ही नहीं की, बल्कि उनके समाधान की और भी एक कदम चल कर आगे आये हैं l वस्तुतः यह परिचर्चा तीन चार बड़े बिन्दुवों पर समाहित की गयी l एक, छोटे टाउन और शहरों और कस्बों में लड़कियों का शादी जाने से इनकार l दूसरा, समाज में ख़तम होती मध्यस्थ की भूमिका और उसकी जरुरत क्यों l तीसरा, कुछ लोगों द्वारा बच्चों के बारे में भ्रम फैलाना और चोथा, मोरन टाउन की बहु बेटियों को मोरन टाउन का ब्रांड अम्बेसडर बनने के लिए प्रेरित करना l अब रही बात शिक्षित लड़कियों का छोटे शहरों और कस्बों में जाने से इनकार करना, यह एक आम समस्या बन चुकी है, जिस पर इसलिए विवेचना हो रही है, क्योंकि पानी सर पर से गुजर चूका है l  बच्चों ने हाल ही में नए सपने बुन लिए है, उनके अभिभावकों ने भी तमाम तरह के नए उपक्रमों को अपने अंदर घर कर लिया है l ऐसे में गावों, कस्बों और शहरों का नम्बर कैसे आएगा l रही बात मध्यस्थ की तो, यह एक बीती बात हो चुकी है l एकल परिवार के गठन होने के पश्चात बच्चों ने बेहतर शिक्षा और नए परिवेश में रहना सीख लिया है l उन्होंने अपने लिए भविष्य की कल्पना भी कर ली है l ऐसे में उनका खुद का निर्णय ही सर्वोपरी माना जायेगा, जिससे अभिभावकों को भी ख़ुशी होती है l मध्यस्थों की भूमिका इसलिए जरुरी है, क्योंकि दोनों पक्षों में कोई अनावश्यक विचार ना बने, और शादी ख़ुशी से संपन्न हो जाए l

इस समय ज्यादातर भारतीय लोगों की मेहनत से कमाई हुई गाढ़ी कमाई अपने बच्चों की शादियों पर हो रही हैं l चाहे लड़का हो या लड़की, शादियाँ अब एक महंगा इवेंट बन गयी हैं l मानो एक अदद इंसान के जीवन का उद्देश्य अपने बच्चों की धूमधाम से शादी करना ही हो गया हो l एक एक पैसा जोड़-जोड़ कर रखना, जिसे शादी के लिए बस खर्च करना हैं l कोई अगर पूछे कि कैसे, शादी तो सात फेरे की रस्म है, कही भी आयोजित की जा सकती हैं l इसका जबाब सीधा और सपाट नहीं हैं l यह कहा जा रहा हैं कि शादी सिर्फ फेरे की रस्म मात्र नहीं है, यह एक इच्छा और आकांशा पूरी करने का अवसर है, जिसे अभिभावक इस समय पूरी करके, अपने बच्चों को प्यार का तोहफा देतें हैं l जीवन भर की कमाई एक ही रात में महंगे रिसेप्शन पर खर्च करके बेशक वह अपनी पीठ खुद ही थपथपा लेता है, पर दिल के किसी कौने में उसे इस बात का भी मलाल रहता हैं कि उसने क्यों इतना खर्च किया l शायद सामाजिक प्रतिष्ठा की वजह से, या फिर भेड़ चाल में, नहीं तो कैसे होती उसके बच्चे की शादी l इतना तो जरुरी है, भाई.. l यह कितना जरुरी है, इसके मापदंड क्या हैं l कौन तय करेगा ?  सामर्थ नहीं होते हुए भी खर्च करने की इच्छा करना और बाहरी सुन्दरता और दिखावा मानो जीवन का एक ध्येय बन गया हैं l बड़ी बात यह होनी चाहिये कि बड़े और आकर्षक मंडप को सामाजिक मॉडल नहीं बनने देना है l नहीं तो माध्यम वर्ग इसी कुंठा में आ जायेगा कि उसने बच्चों की शादी में वह इस तरह के मंडप क्यों नहीं बनवा सकता l अभ्भावाकों नको अब अपने बच्चों के रिश्ते ढूंढने में दिक्कत आ रही हैं l महँगी शादियों के चक्कर में जो पड़ गया हैं समाज l पूर्वोत्तर के कई छोटे कस्बों और शहरों में लोगों को अपने बच्चों के लिए उपयुक्त जीवन साथी ढूंढने में असुविधा हो रही हैं l उनका कहना हैं कि नई जीवन शैली से प्रभावित बच्चे, अपने लिए जीवनसाथी का चयन करने में पहले से ज्यादा समय ले रहें हैं l शायद एकल परिवार का यह भी एक साईड इफ़ेक्ट हो कि बच्चें अपने निर्णय लेने में खुद ही सक्षम हो गए हैं l पर ज्यादा उम्र होने पर भी शादी नहीं होने, पर वें डिप्रेशन का शिकार भी हो रहें हैं l

शादी विवाह पर इस चर्चा को करने के पीछे उद्देश्य यह है कि एक नई पहल आजकल के पढ़े-लिखे शिक्षित लोग करना चाहतें है l यह चर्चा इस लिए भी जरुरी है क्योंकि, पानी अब सिर से उपर चला गया है l माध्यम वर्ग अब त्रस्त हो कर बदलाव की उम्मीद कर रहा है l पर समस्या यह है कि कैसे संभव हो पायेगा, यह कार्य l मोरानहाट ने एक चर्चा कर एक नई शुरवात की है l अब देखना है कि इस चर्चा को कौन आगे बढाता है l   

 अभी और विचार मंथन की जरुरत है

पिछले हफ्ते समाज सुधार और शादी विवाह पर लिखे गए विचार को समूचे पूर्वोत्तर से प्रतिक्रिया मिली l विषय था, पूर्वोत्तर के कई छोटे कस्बों और शहरों में लोगों को अपने बच्चों के लिए उपयुक्त जीवन साथी ढूंढने में क्यों असुविधा हो रही हैं l  उपरी असम के छोटे छोटे कस्बें जो स्वर्ण चतुर्भुज राजमार्ग योजना के बाद से मुख्य सड़कों से जुड़ गए थे, वहां से युवाओं ने अपने आप को पूर्वोत्तर के बड़े शहरों से जोड़ा और शिक्षा एवं रोजगार के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है l बहुत से बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्य से देश के मेट्रो शहरों में चले गए, कई शिक्षा प्राप्त करके जॉब करने लगे, कुछ वही रुक गए l इन बीस वर्षों में शिक्षा, रोजगार और सामाजिक परिवेश की पूरी तश्वीर बदल गयी है l नए युवा, उन युवकों को पढ़ लिख कर सेटल होता देख, ख़ुशी महसूस करने लगे, कि वें भी इसी तरह किसी हॉस्टल या पीजी में रह कर बड़े शहर में शिक्षा करेंगे और फिर जॉब लेकर सेटल हो जायेंगे l नए सपने बुने जाने लगे l इन सपनों में अपना गावं, शहर, लोग और समाज कही छुटने सा लगा है l असम के चारों और फैला हुवा मारवाड़ी समाज के बच्चे अपने पुश्तैनी व्यापार को छोड़, मल्टीनेशनल कंपनियों में ऊचें पदों पर आसीन होने लगे l बहुत से बच्चे विदेश रहने लगे l अभिभावकों को इस बात की चिंता होने लगी कि उनके बाद उनका व्यापार कौन संभालेगा l एक बड़ा सामाजिक बदलाव भी देखने को मिला, वह था, प्रेम विवाह को समाज की स्वीकृति l फिर बहुसमुदाय विवाह भी समाज में होने लगे, जिनके लिए भी कोई आपतियां नहीं हुई l नए सामाजिक विचार को ठोस जमीन मिल रही थी l परिवारों में पहनावें और रहन सहन में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला l भाषा संस्कृति हर बात एक कुछ नए मायने बनने लगे l शायद नयी सदी का सबसे नायब तोहफा था, लोगों के लिए जिसमे एकल परिवार के अभिभावकों द्वारा बनाई हुई अपनी दुनिया थी, जिनमे आधुनिक सोच विद्ध्यमान थी, स्वछंदता थी और आत्मविश्वास था l सामाजिक स्तर पर अगर इस नए आधुनिक सोच को तोले तो पाएंगे कि समाज नामक पिंजरे से आगे निकल चुकी है, यह नयी सोच l

वर्षों पहले मारवाड़ी युवा मंच की एक समीति हुवा करती थी, वधु प्रताड़ना एवं परित्यक्त महिला समीति l इस समीति का मुख्य कार्य था, वैवाहिक संबंधी मामलों को सामाजिक स्तर पर सुलझाना l समिति के पास तलाक, पुनर्विवाह और प्रेम विवाह के मामले आते रहते थे l आजकल युवा मंच के पास इस तरह के मामले नहीं आते l सामजिक स्तर पर विवाह संबंधी मामले सुलझाने के लिए, अब कोई अघोषित तंत्र भी मौजूद नहीं है और ना ही कोई पंचायत के आदेश मानने पर बाध्य है l पर इन सब से वैवाहिक मामलों में कमी तो नहीं आई है l ऐसे सैकड़ों मामले आज भी फैमिली कोर्ट में लंबित पड़े है, जिन पर आने वाले छह महीनों में फैसले होने हैं l इतना ही नहीं, बहुत से मामले बिना सुलझाये हुए भी यूँ ही रुके हुए है, जिनमे पक्षों ने अदालतों में लड़ा हैं l लिखने का आशय यह है कि सभ्य समाज की जरूरतों को बच्चें पूरा कर रहे हैं, पर जब भी बात स्वच्छन्दता की आती है, तब नयी नयी समस्याएं पैदा हो जाती है l एकल परिवार की संरचना भी इन्ही बिन्दुवों पर भी टिकी हुई है l छोटे गावों और कस्बों में बच्चों के रिश्तों के होने में आ रही परेशानियों से हर कोई जुंझ रहा है l कस्बों और छोटे शहरों की अपनी खूबियाँ है, और बड़े शहरों और मेट्रोज की अलग परेशानियाँ है  l मैंने कई परिवारों को देखा है, जो शहरों की चकाचौंद से प्रभावित हो कर एक बार तो शहर में जा बसे, पर खर्चों से तंग आ कर वापस अपने गावों और कस्बों और रुख किया है, और अपना रोजगार दुबारा से शुरू किया हैं l

फ़रवरी माह के अंत में मारवाड़ी युवा मंच का एक अधिवेशन गुवाहाटी में आयोजित हो रहा है l मारवाड़ी युवा मंच समाज सुधार के मामलों में एक अग्रणी संस्था रह चुकी है, जिन्होंने खुले मंच पर इस विषय पर खुल कर चर्चा आयोजित की है l मेरा आयोजकों से निवेदन रहेगा कि पूर्वोत्तर में लोगों को इस गंभीर सामाजिक विषय पर एक अलग सत्र करवा कर, इस समस्या पर विचार मंथन किया जाए, ताकि कुछ भ्रांतियों का अनावरण हो, तो कुछ नए समाधान के विचार भी सामने आ सके l लड़के-लड़की की शादी किस गावं, शहर में हो, यह एक काल्पनिक सवाल हो सकता है, पर शहरों में स्वस्थ्य, शिक्षा कि बेहतर सुविधा होने की वजह से बच्चों को शायद शहर पसंद हो l इस प्रश्न के जबाब में एक सज्जन ने कहा है कि शहर में सविधा भले ही गावों से अच्छी हो, पर खर्चा भी तो गावों से कई गुना हो सकता हैं l उपर से अभी तक का इतिहास है कि पूर्वोत्तर के गावं गावं से कई एक हीरे निकले है, जिन्होंने शिक्षा जगत में घूम मचाई हैं, और आज एक जिम्मेदार नागरिक की भूमिका निभा रहें हैं l एक उदहारण महाराष्ट्र के बीड जिले से आई है, जहाँ झटपट विवाह आयोजित जाते है, दो शुद्ध शाकाहारी परिवारों के लोग मंदिर में लड़के-लड़की आपस में देख वही पर शादी कर लेतें है l दूसरा, मारवाड़ी शादियाँ दिनोदिन महँगी होती जा रही है, अगर समाज यह निर्णय ले कि आदर्श विवाह पद्दति शुरू कि जाय, तब कई परिवारों के अभिभावक आगे आ सकते है l खर्चे के डर से भी कई बार अभिभावक चुप्पी साध लेते हैं l तीसरा, समुदाय के घटकों के बीच भी शादियाँ हो सकती है, जिसके उदहारण किसी कारण से कम दिखाई देतें हैं l  

शादी विवाह के मामले में सभी विषय एक साथ गुँथे हुए है, इनको समग्र रूप में भी देखना होगा l जरुरत इस बात कि भी है कि सामाजिक संस्थाओं को इस विषय को अपने एजेंडा में रखना होगा, और विचार मंथन कि प्रक्रिया शुरू करनी होगी l क्या निष्कर्ष निकलेगा, यह बाद की बात है l 

 समाज सुधार और मारवाड़ी युवा मंच

पूर्वोत्तर भारत में मारवाड़ी युवा मंच हमेशा से ही समाज सुधार का झंडाबरदार रहा है l उसके पांच दर्शनों में समाज सुधार नामक एक दर्शन समाहित हैं l अपने जन्म काल से ही उसने युवाओं की उर्जा को पोषित कर एक सही दिशा की और ले जाने का प्रयास किया है l खास कर के समाज सुधार के क्षेत्र में उसने समाज में कई उल्लेखनीय और सराहनीय कार्य किये है, जिससे समाज को एक दिशा निर्देश मिला है l एक समय जब समाज में दहेज़ प्रथा जोरो से विद्ध्यमान थी, तब मारवाड़ी युवा मंच ने इस प्रथा का सबसे पहले समाज में विरोध किया था और अपने सदस्यों को दहेज़ नहीं लेने की कसमे दिलवाई थी l इसके कई सदस्यों ने आदर्श विवाह भी किये थे l इसी संस्था ने विवाह शादी के मौके पर सड़कों पर होने वाले भोंडे नृत्य रुकवाए थे l इतना ही नहीं, अनावश्यक दिखावे और प्रदर्शन का हमेशा से विरोधी रहा है मारवाड़ी युवा मंच l मारवाड़ी युवा मंच का एक प्रांतीय अधिवेशन आगामी 26 फ़रवरी को गुवाहाटी में शुरू होने जा रहा है, जिसमे एक नए अध्यक्ष का चुनाव और कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की जाएगी l समाज सुधार के विषय समय के साथ पिछली पंक्ति में चले जाने की वजह से इन वर्षों में मारवाड़ी युवा मंच की शाखाओं में विचार गोष्ठियां आयोजित नहीं की जाती, जिससे युवाओं को समाज और समाज से जुड़े विषयों पर सही जानकारी नहीं मिल पाती l मारवाड़ी बच्चों की शादी-विवाह एक महत्वपूर्ण विषय है, जिनसे सभी औत-प्रोत रूप से सभी जुड़े हुए है l जब पूर्वोत्तर के सैकड़ों युवा एक छत के नीचे एकत्र होंगे, तब इस विषय पर चर्चा हो सकती है कि पूर्वोत्तर के कई छोटे कस्बों और शहरों में लोगों को अपने बच्चों के लिए उपयुक्त जीवन साथी ढूंढने में क्यों असुविधा हो रही हैं l जब मोरानहाट में सबसे पहले इस विषय पर चर्चा हो रही थी, तब उन्होंने कुछ ठोस निर्णय लिए थे, जिनमे एक निर्णय था कि मोरानहाट में एक परिणय सेवा सेल बनाया जायेगा, जहाँ पर इस समस्या को प्रचारित किया जायेगा, जिससे शहर और टाउन के बीच की मनोवैज्ञानिक दुरी कम की जा सके l प्राप्त जानकारी अनुसार यह केंद्र बच्चों का बायोडाटा भी संग्रह करेगा और मोरानहाट टाउन की उपलब्धियों के बारे में आने वाले अभिभवकों को अच्छी तरह से बताएगा l मारवाड़ी समाज अभी एक संक्रमण काल से गुजर रहा है, उसकी भाव भंगिमाएं कुछ बदली बदली नजर आ रही है l समाज में नयें रंग इस तरह से भर गएँ है कि उनको अलग करना मुश्किल ही नहीं नामुनकिन हो गया है l समाज, वर्ग, जात और घटक में बांटता हुवा जा रहा है l एक सगज प्रहरी की भांति मारवाड़ी युवा मंच अपने प्रतिनिधि संगठन होने के दायित्वों का पालन करें, यही हमारी अभिलाषा है l एक सभ्य और सुसंस्कृत समाज के नाम से जाने जाना वाला मारवाड़ी समाज, अब बदलाव के चौरस्ते पर खड़ा है l बदलाव के दिनों में सामाजिक संस्कारों से ले कर मानवीय मूल्यों में भी गिरावट हुई है l ऐसे में सामाजिक संस्थाओं का रोल कुछ ज्यादा ही बनता है l सामाजिक संस्थाएं अपना कार्य पूरी जिम्मेवारी के साथ करें, समाज को एक स्पष्ट सन्देश जरुर दिया जाना चाहिये l सामाजिक संस्थाएं हर गावं शहर में उस अघोषित तंत्र तो दौबारा जीवित करे, जिसने समाज को बांधकर, आंचार-संहिता के साथ चलने के लिए हमेशा से प्रेरित किया था l जिस तंत्र ने जन्म-वरण एवं मरण के समय सामाजिक चेतनाओं को अंगीकार करने में मदद की थी, उस तंत्र की जरुरत दुबारा से समाज में महसूस की जा रही है

दरअसल में गावं-कसबे और शहर में शादी की समस्या कुछ और भी हो सकती है l थोड़ा तीखा और सीधा लिखा रहा हूँ l पहला, आजकल शादी विवाह एक महँगी रस्म बनती जा रही है l खासकरके माध्यम वर्गीय परिवारों के लिए तो यह एक जी का जंजाल बन रही है l ना चाहते हुए भी एक अभिभावक अपनी जीवन भर की कमाई एक रात में खर्च कर देता है l बड़े रिसोर्ट और पांच से तीन सितारा होटलों शादियाँ आयोजित होने लगी है l शायद टाउन और कस्बों में यह सब संभव नहीं हो, इसलिए मन की मुराद छोटी जगह पूरी नहीं हो सकती l लड़केवाले ही नहीं, आजकल तो लड़कीवाले भी अपने बच्चे का विवाह आलीशान तरीके से करना चाहते हैं l इससे अभिभावकों और बच्चों, दोनों,  ने देखादेखी यह सोच लिया है कि यह कार्य छोटे शहरों में संभव नहीं l दूसरा, टाउन और कस्बों के पच्चास किलोमीटर की परिधि में क्यां विवाह लायक बच्चें खोजे नहीं जा सकते, जिन्होंने अपने टाउन और कस्बे के माहोल को बेहतर समझा है l ऐसे बच्चों को भला छोटी जगहों से क्यों एतराज होगा ? तीसरा, बड़े शहरों में व्यापार, वाणिज्य एवं रोजगार के नए साधन आसानी से बन जाते है, जिसकी वजह से शहरों की तरफ दौड़ लगाई जा आरही हैं l चौथा, शहरों में एक स्वछंद जिंदगी जी जा सकती, जहाँ पाबंदियां नहीं के बराबर है, स्वरोजगार करते हुए युवा आराम से अपनी जिंदगी जी सकते हैं l छठा, अपने पैरों पर खड़े युवा, अपने जीवन साथी का चुनाव अपनी इच्छा से क्यों नहीं करेगा l समाज और बिरादरी की वह क्यों सुनेगा ? सातवा, प्रोफ्फेसोनल बच्चों शहरों में नौकरियां करतें है और एकल परिवार में रहने के आदि हो जाते हैं l

पूर्वोत्तर के कई छोटे कस्बों और शहरों में लोगों को अपने बच्चों के लिए उपयुक्त जीवन साथी ढूंढने में क्यों असुविधा हो रही हैं ? यह लाख टाकिया प्रश्न है,जिसक कोई स्पष्ट और सटीक जबाब नहीं हो सकता l समय के साथ यह समस्या भी चल कर आई है l समय के साथ ही इसका हल निकलेगा l गावं में होने वाली शादी भी जीवन भर चल सकती है, और शहर में होने वाली शादी किन्ही कारणों से नहीं भी चल सकती l यह तो आपसी सामंजस्य और तालमेल है, जिसकी वजह से रिश्तों में गर्माहट बनी रहती हैं l विषय पर स्थानीय स्तर पर लगातार चर्चा अगर बनी रहे, तब यह बात तो तय है कि किसी के लिए भी किसी गावं, कस्बों और शहर को कमतर बताने में दिक्कत होगी l साथ ही उन मध्यस्थों कि पहचान होगी, जो संबंधों को बनने से पहले ही उजाड़ने में लगे रहते हैं l शादी विवाह की कड़ी को यही समाप्त करता हूँ, इसी आशा के साथ कि सभी विषय पर गहन चिंतन करेंगे l                     

Friday, January 22, 2021

गणतंत्र का आनंद

 

गणतंत्र का आनंद

इस बार 26 जनवरी को हम आजाद भारत का 72वां गणतंत्र दिवस मानाने जा रहे हैं l भारत 26 जनवरी 1950 को एक गणतंत्र बना l भारतीय संविधान की दो हस्तलिखित कोपियों पर संविधान सभा के 308 सदस्यों ने हस्ताक्षर किये थे l फिर जा कर देश में संविधान 26 जनवरी से लागु हुवा l इसकी प्रस्तावना हम भारत के लोग से शुरू होती है और मूल रूप से इस तरह से शुरू होती है l’ हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को: सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता, प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सब में, व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्पित होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ईस्वी (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत दो हजार छह विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैंएक ऐसा गणतंत्र जो जीवंत है, जोश से भरा है l सबसे बड़ा लोकतंत्र का दर्जा इसे प्राप्त है, जिसमे एक लिखित संविधान है, एक चुनी हुई सरकार है, एक कार्यपालिका है और एक स्वतंत्र न्यायपालिका है l इस सभी को मिला कर ही तो एक गणतंत्र बनता है l ख़ुशी कि बात है कि सबसे बड़े गणतंत्र का उदहारण पूरी दुनिया के सामने रखा जाता है l

अमेरिका, जो विश्व का सबसे पुराना गणतंत्र माना जाता है, वहा नागरिकों को हर तरह के अधिकार प्राप्त है l एक फ्री प्रेस है और विरोध का अधिकार है l इस बार राष्ट्रपति के चुनाव के दौरान हुई हिंसा और वाइट हाउस में ट्रम्प समर्थक द्वारा किया गया उत्पात, लोकतंत्र के लिए एक काला अध्याय था l कहने को तो भारत में भी हर नागरिकों को हर तरह के अधिकार है, पर उन अधिकारों पर अंकुश ज्यादा है, जिससे वें अधिकार सीमित हो कर संकुचित हो गए है l पर फिर भी भारतीय लोकतंत्र को दुनिया में एक सफल मॉडल के रूप में देखा जाता है l इसका मुख्य कारण है, यहाँ का एक संघीय ढांचा, जिसके उपर सभी को विश्वास है l राज्य सरकारों और केंद्र के बीच सहमती के लिए संविधान में व्यवस्था और न्यायपालिका पर विश्वास ने यहाँ के लोगों को गणतंत्र के इसी तरह के मॉडल पर सहमति व्यक्त की हैं l भारत एक विभिन्न संस्कृति वाला देश है, जहाँ अनेकों राज्यों में भाषाई लोग विराज करते हैं l इतनी विविधता के बीच भारत मॉडल का सफल होना, एकता में अनेकता का द्वोतक है l इसके बावजूद भी यहाँ एक असहमति के बादल फैले हुए है l असहमति विचारों की भी है और कार्यों की भी हैं l अब सिघु बॉर्डर पर पिछले करीब 60 दिनों से किसान कानूनों के विरोध में आंदोलन कर रहे किसानों की और पूरा देश देख रहा हैं, पर कोई समाधान नहीं निकल रहा है l असम में तिनसुकिया में मिसिंग समुदाय के लोग पिछले 31 दिनों से स्थाई पुनर्वास के लिए खुले में आंदोलन कर रहे हैं l इन सब के बीच भी लोकतंत्र मजबूती से भारत में विराज कर रहा है l      

Friday, January 1, 2021

इस पार प्रिये मधु है, तुम हो, उस पार ना जाने क्या होगा

 

इस पार प्रिये मधु है, तुम हो, उस पार ना जाने क्या होगा 

2020 की शुरुवात वन भोज और भ्रमण से आमतोर पर होती है l इस दफे, 2021 एक नए कलेवर में दिखाई देगा l एक नयी संस्कृति के साथ..कोरोना के साथ वाली संस्कृति, जिसको आत्मसात करने के अलावा, किसी के पास कोई उपाय नहीं है l 2020 को पार करके ख़ुशी इस बात की है की कोरोना के संकट से कुछ दुरी तो बनी, पर डर जो अभी भी बना हुवा है l खासकरके कोरोना के एक नए रूप में आने के पश्चात, तनाव बरक़रार है l कोरोना वैक्सीन आने को है, पर इस बात में संशय है कि किसे वैक्सीन प्राप्त होगी और किसे नहीं l असम में जहाँ 2021 में चुनाव होने जा रहे हैं, यह माना जा रहा है कि वैक्सीन असम में सबसे पहले आएगी, और सबसे पहले 30 करोड़ लोगों को वैक्सीन प्राप्त होगी l पर तमाम तरह की अटकलों के बीच कमोवेश हर तरह के आयोजन और जरुरी कार्य निबटाये ही जा रहे हैं l जैसे कि मन को खुश रखने के लिए जितने भी जतन करे, वें सभी जनवरी माह के प्रथम हफ्ते तक शेष हो जाते हैं l एक बार गणतंत्र दिवस गया नहीं कि मनुष्य वापस अपने पुराने रूप में आ जाता हैं l इस पार-उस पार की एक बड़ी समीक्षा इस समय चल रही है l ब्रह्मपुत्र घाटी और बराक घाटी के बीच l दो सिरे है, राजनीति के l सभी नजरे, बराक की और टिकी है, जिसका एक अन्य सिरा कही ना कही बंगाल से भी जुड़ा हुवा है, सिरा नहीं तो, तार तो अवश्य है l करीमगंज में कुछ आयोजन होता है, तो उसका प्रभाव बंगाल में पड़ना निश्चित है l इस समय दिल्ली-हरियाणा सीमा पर चल रहे किसान आन्दोलन ने दिल्ली की सत्ता को हिला कर रख दिया है l यह भी इस पर और उस पार की लड़ाई बन गयी है l बर्फ जमा देने वाली ठंडी हवा के बीच किसानों ने आन्दोलन को जरी रख कर पूरी दुनिया में एक मिसाल कायम कर दी हैं l नमक आन्दोलन, असहयोग आंदोलन और असम आंदोलन, कुछ ऐसे आन्दोलन देश में पूर्व में हुए है, जिससे सत्ता हिल गयी थी l किसानों ने इस बार नए साल का कोई जश्न नहीं मनाया l प्रख्यात कवि हरिवंश राय बच्चन ने एक कविता लिखी थी, जिसका शीर्षक है, ‘इस पार उस पार’ l उनकी इस लम्बी कविता में जीवन के तमाम उतार चढाव के आयाम छिपे हुए है l शायद ही कभी कोई लिख सकता है कि इस पार प्रिये मधु है, तुम हो, उस पार ना जाने क्या होगा  l कभी ऐसा लगता है कि यह एक प्रेम रस की कविता है, या जीवन की सच्चाई नापती हुई, साहस,संघर्ष, जिजीविषा की कविता है l कभी यूँ प्रतीत होता है कि यह एक निराशा भरी कविता है, जो जोश में में लिखी गयी हो l यह किस रस को प्रतिपादित करती है, इस पर कोई शीर्ष नतीजे पर नहीं पहुच सकता है, अपर से विचित्रता और विशेषता से भरी यह कविता ऐसे संकेत देती है, जिस पर एक बार ठिठक आकर आत्ममंथन करना जरुरी हो जाता है l मजहब, पोथियाँ, सब बेकार..उस पार न जाने क्या है l पंडित-मौलवियों और पादरियों की तकरीरों को दर किनारे रखते हुए, सिर्फ प्रारब्ध का जिक्र किया गया है l फिर जैसे जैसे कविता को आगे कोई पढता है, जिन्दगी के फलसफे से रूबरू होता चला जाता है l 2020 के कठिनतम दौर से गुजरने के पश्चात, अब मानव इस नतीजे पर पंहुचा है कि बड़े से बड़ा प्रकृति के आगे झुक जाता है, और प्रणाम करने लगता है l कोविड काल में भी यही हुवा l एक जगह वे लिखते है रविशशिपोषित पृथ्वी कितने दिन खैर मनाएगी...तब तेरा नन्हा सा संसार का क्या होगा l कल्पना के घोड़े कितने दौड़ सकते है, इसका उदहारण हरिवंश राय बच्चन की अन्य कविताओं में भी देखा जा सकता हैं l कुछ आलोचकों ने इसे विरह का गीत करार दिया हैं l

असम में क्षेत्रीय रंग वाली कुछ नई पार्टियों ने पिछले दिनों जन्म लिया है l सत्ता के मोह में नई राजनीतिक पार्टियों का जन्म लेना, इस बात के सबूत है कि चुनाव में कई तरफ़ा प्रतिद्वंद्विता होने वाली हैं l चुनाव के समय अक्सर होता है, जिसका असर होता भी है और नहीं भी l नागरिकता संसोधन कानून का विरोध करते करते कुछ युवाओं ने पार्टियाँ गठित कर ली है और सत्ता को चुनौती देने का मन बना लिया हैं l समय आत्ममंथन का है, जिसको सभी को अपने विवेक का इस्तेमाल करके समझना होगा l असम समझोते की दफा 6 को क्रियान्वयन के लिए गठित कमिटी ने अपनी रिपोर्ट सरकार को दे दी है, जिस पर चर्चा होनी अभी बाकी है l वर्ष 2021 वर्ष असम के लिए एक महत्वपूर्ण वर्ष साबित होने वाला है l एक आर पार की लड़ाई जो होनी है l  

Friday, December 11, 2020

असमिया भाषा संस्कृति के प्रति रूचि बरक़रार है

 

असमिया भाषा संस्कृति के प्रति रूचि बरक़रार है

रविवार को किताब पढने का आन्दोलन दिवस है l हर वर्ष 13 दिसंबर को किताब पढने का दिवस मनाया जाता है l दुसरे शब्दों में हम कहे, तब यह कहना उचित होगा कि पुस्तकालय, पुस्तक और उसके प्रति रूचि बढ़ाने के लिए एक आंदोलन कि शुरवात हुई है l बाजारवाद के युग में किसी की भी दिनचर्या मशीनी बन गयी है l व्यग्रता और चिंता की वजह से लोगों में किताब के प्रति रूचि कम ही हुई है l उपर से आधुनिक संवाद माध्यम से ख़बरों का सम्प्रसारण तेजी से बढ़ा है l इन्टरनेट युजरों की संख्या पिछले दशक की तुलना में कई गुना बढ़ी है l ऐसे में किताब और उसकी गुणवत्ता के प्रति ध्यान दिलाना साहित्य प्रेमियों का कर्तब्य बन जाता है l किसी भी भाषा के साहित्य को विश्व पटल पर ले जाने के लिए सबसे पहली जरुरत होती है, उसका भाव अनुवाद और उसका प्रसारण l असमिया गीतों को जब हम सांस्कृतिक मंचों पर सुनते है, और भाव-विभोर हो जाते हैं l असमिया गीतों को पिछले वर्ष नागरिकता कानून के विरोध में हुए आंदोलन में भी गाये गए थे l भाषा साहित्य एक दुसरे को जोड़ देता है l अगर हम पुस्तकों के लेखन और अनुवाद के कार्य की और देखे, तब पाएंगे कि पिछले 50 वर्षों में जिन लेखकों ने हिंदी में मौलिक लेखन के साथ में असमिया पुस्तकों का हिंदी अनुवाद किया है, उनमे सर्वप्रथम नाम भगवती प्रसाद लडिया का आता है, जिन्होंने पुस्तकालय आंदोलन की शुरुवात की थी और लोगों में पढने के लिए जागरूकता लाने का प्रयास किया था l एक समृद्ध भाषा को विश्व पटल पर ले जाने के लिए, उस भाषा के साथ जुड़े हुए पत्रों और किंवदंतियों को लोगों के समाने रखना जरुरी हो जाता है l नाटकों के माध्यम से पुस्तकों को लोगों के सामने ले जाने की विधा असम में काफी पुरानी है, जो थियेटर के रूप में आज भी एक जीवंत विधा प्रचलित है l जयंती युग के महामना कमल नारायण देव का नाम आज भी बड़े सम्मान से लिया जाता है, जिन्होंने जयंती नामक पत्रिका का संपादन किया था l नवारुण वर्मा और कृष्ण प्रसाद मागध जैसे मनीषियों ने भाषा संस्कृति से जुड़े पत्रों के उपर पोथियाँ लिख, अनुवाद कर ना सिर्फ असमिया संस्कृति को समृद्ध किया है, बल्कि हिंदी साहित्य को भी उन्नत किया है l गुवाहाटी के छगनलाल जैन और डिब्रूगढ़ के देवी प्रसाद बगरोडिया को असमिया और हिंदी के बीच का एक सेतु के रूप में असमिया लोग जानते है, जिन्होंने विभिन्न भाषा-भाषी के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया है l असम में वैष्णव धर्म गुरु श्रीमंत शंकरदेव और संस्कृति पुरोधा ज्योति प्रसाद अगरवाला पर हिंदी में पुस्तक लिख कर सांवरमल सांगानेरिया ने दोनों महापुरुषों का परिचय पुरे भारतवर्ष से करवाने का एक महत कार्य किया है l कुबेर नाथ राय, मास्टर नागेन्द्र शर्मा, दामोदर जोधानी, डा. हीरालाल तिवाड़ी, चंद्रमुखी जैन, धरमचंद जैन, कपूर चंद जैन जैसे महानुभावों ने अपनी लेखनी द्वारा असम के महापुरुषों के जीवन दर्शन को पुरे भारत में प्रचारित किया है l असम के कौन कौने में ऐसे लोग मौजूद है, जिनकी मातृभाषा मारवाड़ी, हिंदी या भोजपुरी रही हो, पर उन्होंने असमिया भाषा संस्कृति को करीब से समझा और उस पर कार्य भी किया है l ऐसे और पचासों लोग और मिल जायेंगे जो असम के गावों, शहर और कस्बों में मिल जायेंगे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन दो संस्कृतियों के बीच नजदीकियां करने का प्रयास किया है l कभी भाषा संस्कृति के द्वारा, तो कभी संवाद के सूत्र को पिरोकर l ऐसे कई नाटकार, लेखक, संपादक और फिल्म निर्माता भी मौजूद है, जिन्होंने लाभ नुकसान की परवाह ना करते हुए असमिया में भरपूर कार्य कर रहे हैं l कुछ और नामों का उल्लेख आने वाले अंकों में देने का प्रयास करूँगा l

इस बात पर कोई दो राय नहीं है कि अब किसी को और परीक्षा देने कि जरुरत नहीं है कि अमुक हिंदी भाषी है और अमुक मारवाड़ी भाषी है l सदियों से यहाँ एक मिश्री संस्कृति विराज कर रही है l कोई ज्यादा कार्य कर रहा है तो कोई कम, पर माटी के प्रति लगाव बरक़रार है, चाहे वह कोई भी भाषा बोल रहा हो l बड़ी बात यह है कि स्थानीय संस्कृति के प्रति लगाव और उसके प्रचार प्रसार किये जाने कि जरुरत है l इस बात में भी कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि यहाँ के लोगों ने बड़ा ह्रदय दिखलाते हुवे, ऐसे लोगों को गले से भी लगाया है, जिससे आने वाली पीढ़ी को प्रेरणा भी मिली है l आज युवा कवि और लेखकों की एक जमात तैयार हो गयी है, जो असमिया भाषा संस्कृति को ऊँचा करने में कोई कसार नहीं छोड़ रहे हैं l चिर सनेहे मुर भाषा जोनोनी’, के साथ जय घोष करने वाले नवयुवकों ने असमिया कला संस्कृति के मर्म को समझ कर आत्मसात किया है l    ऐसे लोगों के प्रति सम्मान आज भी बरक़रार हैं l

Friday, December 4, 2020

असमिया बोली से परहेज क्यों ?

 

असमिया बोली से परहेज क्यों ?

असम में सन 1960 में एक बड़ा भाषा आंदोलन हुवा था, जिसके बाद असमिया भाषा को असम के तीन जिलों को छोड़ कर सभी जिलों में सरकारी भाषा के रूप में घोषित किया गया l इस आंदोलन से असमिया भाषा को ना सिर्फ सरकारी मान्यता मिली, बल्कि उसके बोलनेवालों को एक पहचान मिली l ब्रहमपुत्र घाटी में असमिया बोलने वालों की संख्या करीब 2 करोड़ है, जबकि असम में फैले हुए जनगोष्ठियों के लोगों की बोलिया थोड़ी भिन्न है, पर आम तोर पर वें असमिया भाषा ही लेखन कार्य में उपयोग करते हैं l अब बात करते है राज्य में रह रहे हिंदी भाषियों की या अन्य भाषा-भाषियों की जो राज्य में पिछले तीन सौ साल से असम में रह रहें हैं l इसमें राजस्थानी लोगों की संख्या भी बहुतायत में है, जिन्होंने यहाँ के उद्योग और वाणिज्य को बखूबी संभाल रखा है, जिनको असम में मारवाड़ी कह कर संबोधित किया जाता हैं l जब सन 1828 में नौरंगराय अगरवाला असम पहली बार राजस्थान से आये थे, तब उनको क्या पता था कि उनके वंशज, असम की कला संस्कृति का एक स्तम्भ और एक अभिन्न अंग बन जाएंगे l नौरंगराय अगरवाला की बाद की पीढ़ियों ने ना सिर्फ असमिया को अपनाया, बल्कि उसकी सेवा भी की l जिसका नतीजा यह निकला कि असमिया कला, भाषा-संस्कृति को एक मजबूती मिली और उसका विस्तार असम के चारों कौनों में होने लगा l उस परिवार ने गीत और नाटकों के माध्यम से नव-जागरण शुरू किया, जिससे असमिया लोगों को सम्पूर्ण भारतवर्ष में पहचान मिलने लगी l बाद में असम आंदोलन ने यहाँ के लोगों को एक नई पहचान दी थी l किसी भी राज्य की संस्कृति को आत्मसात करने के पहले वहां की बोली और भाषा को सर्वप्रथम अपनाना होगा, तभी उसके मर्म को समझा जा सकता है l राजस्थानी मूल के लोगों को हिंदी भाषी के रूप में चिन्हित किया जाने लगा है, जिसकी मुख्य वजह है उनके के खुद की संस्कृति का तिल मात्र भी प्रचार ना होना l एक समृद्ध संस्कृति के वाहक मारवाड़ी समुदाय के लोग ना सिर्फ अपनी बोली, भाषा और संस्कृति को तो छोड़ ही रहे है उपर से हिदी को भी तोड़-मरोड़ कर बोल रहे हैं l इस गड़बड़झाले की वजह से इनकी पहचान किसी जनागोष्ठी या भाषाई अल्पसंख्यक के रूप में नहीं हो कर हिंदी भाषी के रूप में होने लगी है l जबकि इस तथ्य से किसी को कोई परहेज नहीं है कि असमिया भाषा की सेवा करने वाले 100(संख्या सांकेतिक है) ऐसे मारवाड़ी असम के चारों कौनों में मिल जायेंगे, जिन्होंने अपनी लेखनी द्वारा असमिया भाषा को उन्नत किया है l ऐसे कई मारवाड़ी परिवार मिल जायेंगे, जिहोने असमिया भाषा-संस्कृति को अपना लिया है l ऐसे उदहारण असम में सर्वत्र मिल जायेंगे, जिन्होंने असमिया भाषा के द्वारा असमिया आमजनों के बीच अपनी पहचान छोड़ी हैं l फिर भी इस समुदाय के लोगों को एक अलग मान्यता नहीं मिल पाई है l इसका कारण ढूंढे जाने जरुरत है l एक कारण जो मैंने जाना है, वह है, असमिया बोली के प्रति असंवेदनशीलता और अनदेखी l भाषा खिखने कि बात तो अभी छोड़ ही देतें हैं l बोलने के परहेज ने लोगों में एक नकारात्मक छवि बन दी हैं l दुकानों में जब ग्राहक आते हैं, तब वें पूछते है कि क्या आपको असमिया आती है l कई दफा, वर्षों से यहाँ रहने वला व्यक्ति शर्मशार हो कर बगले झाँकने लगता है और लजाते हुए जबाब देता है की थोड़ी थोड़ी l असम में भाषा संस्कृति एक संवेदनशील विषय है l एक सत्य यह भी है कि एक बोली-एक भाषा, एक सम्पूर्ण संस्कृति होती होती है l हर सौ वर्षों में ना जाने कितनी बोलियाँ इतिहास में विलीन हो जाती हैं l मारवाड़ी इलाके की कई बोलियों के साथ भी यही होने वाला है l जब एक परिवार में तीसरी पीढ़ी या चौथी पीढ़ी अपनी मातृभाषा को छोड़ कर हिंदी या अन्य भाषा बोलने लगता है, तब यह तय है कि वह बोली लुप्त होने वाली है l असमिया भाषा ने अपने उदय काल में(सन 1900 के पश्चात) गीतों और कविताओं के माध्यम से एक वजूद बनाया है l अपनी भाषा को समृद्ध कर इसका व्यापक विस्तार किया है l नहीं तो विभिन्न समय में असम में प्रवर्जन कर रहे लोगों ने कभी का यहाँ की भाषा को तोड़ मरोड़ कर रख दिया होता l पर संवेदनशील असमिया ने अपनी भाषा को बचा कर एक संस्कृति को समूचे भारत वर्ष में प्रचारित किया है l

असमिया बोली को बोलने की जरुरत इसलिए भी है क्योंकि जो लोग यहाँ के हो गए है, परिवार, जमीन यही है, वर्षों से यही रह रहें है, रिश्तें-नाते यही है, उनको स्थानीय स्थानीय से एक संवाद का माहोल बनाने की जरुरत होगी, जिससे यह नहीं लगे कि इस समुदाय के लोग अलग है l असमिया बोली एक सेतु का कार्य कर सकती है l अब देवकी और योशोधा दोनों यही है, दोनों ही प्यार निछावर कर रही है l             

Friday, November 27, 2020

आखिर कौन है, यें हिंदी भाषी ?

 

आखिर कौन है, यें हिंदी भाषी ?


पिछले अंक में हिंदी भाषियों पर लिखने के पश्चात,एक तर्क यह निकल कर आया कि आखिर कौन यें हिंदी भाषी l राजस्थानी मूल के लोग तो मारवाड़ी बोलते है, बिहारी मूल के भोजपुरी या मैथली में बात करते हैं, फिर असम में हिंदी भाषी कौन हुए ? क्या ज्योंति प्रसाद अगरवाला को भी हिंदी भाषी की संज्ञा दी जा सकती है ? इस तरह के विचार कुछ बुद्धिजीवियों ने उठाये हैं l दरअसल में, हिंदी भाषियों के समूह में कौन से भाषा-भाषी के लोग समाहित है, इसमें हमेशा से ही विवाद रहा हैं l जिस तरह से भारत में जातिवाद की जड़े इतनी गहरी और हरी है कि कोई कितनी भी कौशिश कर ले, हर बार जाति का प्रश्न उभर कर आ ही जाता हैं l सन 1985 के बाद जब, असम में एक क्षेत्रीय राजनीति का दौर शुरू हुवा, तब भी कई मर्तबा सभी जातियों को एक छत के नीचे लाने के प्रयास हुए थे, पर कोई भी प्रयास फलीभूत नहीं हुए और सभी जातियों को हिंदी भाषी के रूप में संज्ञा दी जाए लगी l हिंदी भाषी बोलने पर यह समझा जाता है कि उत्तर भारत की यह बोली है, असम में यह एक आगंतुक है l एनआरसी के समय भी जब सर्व प्रथम नियम बनाये थे, तब ओर्गिनाल्स इन्हेबितेंत (स्थानीय)और नॉन ओर्गिनल रेजिडेंट(प्रवासी) के रूप में लोगों को चिन्हित करने का प्रयास किया गया था, पर विवाद होने पर इसे हटा दिया था l लेकिन ऐसे हजारों लोगों ने अपना नाम दर्ज ही नहीं करवाया, जिनकी उपाधि ही असम के स्थानीय कह कर दर्शाती हैं l उनका यह तर्क था कि हम यहाँ के निवासी है, हमें प्रमाण देने की जरुरत क्यों हैं l पर नियम तो नियम थे, सभी को प्रमाण देने पड़े l यह अलग बात थी कि जांच पड़ताल कम ज्यादा की गयी थी l हिंदी भाषियों को लेकर हमेशा एक संजीदगी रही है कि यह एक जाति कमाने आई है और कमा कर वापस चली जायेगी l स्थानीय संसधानों पर कोई इनका अधिकार नहीं हैं l पर ऐसा नहीं हुवा l तर्क करने वाले का मंतव्य यह था कि स्थानीय भाषा और संस्कृति को अपना कर उसकी सेवा करना, उसमे मिल जाना ही एक मानव का स्वभाव होता है, पर उसके जींस में उत्पत्ति के स्थान के अनुवांशिक अंश मौजूद रहते है, जो कभी भी समाप्त नहीं होते, और इसी गुण कि वजह से वें स्थानीय से अलग दिखते हैं l असम में रहने वाले नेपाली और सिख समुदाय के लोगों ने असमिया रहन सहन और बोली को ना सिर्फ अपनाया बल्कि उसकी भरपूर सेवा भी कर रहें हैं l इसी तरह से असम के कई स्थानों पर मारवाड़ी और अन्य समुदायों के लोग असमिया संस्कृति में रच बस गए है l माजुली और ढाकुवाखाना इसके उदहारण बने हुए है l ज्योति प्रसाद अगरवाला जैसा व्यक्तित्व अब और पैदा नहीं हो सकता, जिसको कोई भी हिंदीभाषी के रूप में चिन्हित भी नहीं कर सकता, ना कोई भाषा-भाषी इनको अलग से अपना सकता है l वे भाषा संस्कृति के हिसाब से पूर्ण रूप से असमिया थे, जिनको लोग पूजते हैं l ऐसे महापुरुष को किसी भी भाषा में बांधना, उनका अपमान होगा l एक विश्व मानव के रूप में प्रतिष्ठित हुए थे, ज्योति प्रसाद अगरवाला, जिनको असमिया होने पर गर्व था l

पुरे भारतवर्ष में प्रवजन का इतिहास बहुत पुराना है l असम में भी कौन सी जाति पहले आई, इस पर बहुत विवाद हैं l यूँ तो असम में राजस्थान से राजपुताना इलाके से लोगों के आने का दौर शुरू हो चूका था, पर यांदाबू संधि के पश्चात बड़ी संख्या में भाषा-भाषी के लोग असम आने लगे थे l इसमें अंग्रेजो द्वारा बसाये हुए लोग भी शामिल है, जिन्होंने अंग्रेजों के बेन्केर्स के रूप में भी काम किया l चाय बागानों में मुजदुरों को बसाया गया, चाय बागानों में दुकानों की बसावट की गयी, जिनको राजस्थानी मूल के लोग चलाते थें l इसी तरह से नौकरी और पोस्टिंग की वजह से भी लोग यहाँ बसते चले गए l कहते है कि भूमि पर एक खिंचाव है, जो एक बार यहाँ आ जाता है, वह यही बस जाता है l सहज सरल असमिया लोगों ने आगुन्तकों की आगवानी भी दोनों हाथों से की हैं l जो लोग यहाँ बस गए, वें यही के हो गए, मूल प्रदेशों में उनके लिए कोई स्थान अब नहीं है l कुछ परिवारों के सभी रिश्तेदार तक यही रहते हैं l यह तो क्षेत्रीयतावाद की आंधी ने सामाजिक तानेबाने को ध्वंश कर दिया है, नहीं तो जाति और भाषा कभी भी किसी के आड़े नहीं आई थी l

असम में सदियों से एक मिश्रित संस्कृति वास करती आई है l समुदायों के बीच समरसता हमेशा ही बनी रही l बस चुनाव के समय ही थोड़ी बहुत कड़वाहट आ जाती है l पर बड़ी बात यह है कि सभी समुदाय शांति से वास कर रहे हैं l अच्छी बात यह भी है कि सभी के लिए अलग अलग स्थान और जगह बनी हुई हैं l राजनीति कभी भी समुदायों के बीच बने हुए मधुर और आत्मीय संबधों को विच्छेद नहीं कर सकती l         

Friday, November 6, 2020

रोमांस, क्रांति, परिवर्तन, इत्यादि ..

 

रोमांस, क्रांति, परिवर्तन, इत्यादि ..


जब सन 1932 में ज्योति प्रासाद अगरवाला ने असम की पहली फिल्म जयमती का निर्माण शुरू किया था, तब उनको इस फिल्म में काम करने वाले कलाकार मिलने में बेहद तकलीफ हुई थी l फिल्म की नायिका आइदेव हेन्द्क को सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा था l पर ज्योति प्रसाद का रोमांस शीर्ष पर था, और उन्होंने फिल्म का निर्माण कर डाला l कवि ह्रदय ज्योति प्रसाद ने अपने जीवनकाल में करीब 300 गीतों की रचना की थी l एक रोमांटिक कवि कब एक क्रन्तिकारी बन गया किसी को पता ही नहीं चला l जब उन्होंने लिखा ‘तुम्ही करिबो लागिबो अग्नि स्नान’, तब एकाएक एक जलजला सा उठा और असमिया पुनर्जागरण का दौर शुरू हो गया l असमिया संस्कृति, कला और साहित्य को दिशा प्रदान करने के लिए उनका नाम अग्रणी है l बाद में जब भाषा आंदोलन और असम आन्दोलन शुरू हुवा था, तब छात्र उनके इन्ही गीतों को गा कर क्रांति का आगाज किया करते थे l इतना ही नहीं नागरिकता संसोधन कानून 2016 के विरोध के समय भी असम के रंगकर्मियों ने रोमांस की चाशनी में डूबे हुए क्रांति गीत गाये और कानून का विरोध किया l जब सन 1996 में भारत में पहली बार भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई थी, तब देश प्रेम का जज्बा इस तरह से उभरा कि आम लोगों ने इस पार्टी को भरपूर समर्थन दिया, हालाँकि यह सरकार सन 1996 में तो सिर्फ 13 दिनों तक ही चल पाई, पर सन 1998 में पूर्ण बहुमत से अपना 5 वर्षों का कार्यकाल समाप्त किया l एक नई राष्ट्रीयता की शुरुवात हुई, जो आज तक कायम है l इसी तरह से असमिया पुर्नार्जगरण के छोटे छोटे दौर स्वतंत्रता के बाद पूरी तरह से शुरू हुए थे, सभी असमिया अस्मिता और संस्कृति की रक्षार्थ थे l असम आंदोलन इसमें से प्रमुख और निर्णायक दौर था l

2021 में असम विधान सभा का चुनाव होना है l चुनाव कि तयारियां शुरू हो गयी है l नेताओं के चहरे अब पहले से ज्यादा दिखाई देने लगे हैं l कुछ नई पार्टियाँ भी गठित हो गयी हैं l आइये, चुनाव को मद्देनजर रखते हुए थोड़ा पीछे चलते है l असम आन्दोलन के दौरान जब मतदाता सूची में संसोधन हुवा था, तब भी यह मुद्दा आया था कि जिन लोगों का नाम मतदाता सूची में नहीं होगा, उनको असम छोड़ कर जाना होगा l इतना ही नहीं, असम आन्दोलन के समय आसू को प्रथम मांग थी कि सन 1951 के बाद असम में दाखिल लोगों को असम से बाहर किया जाये l बाद में समझोते के समय यह तिथि 25 मार्च 1971 कर दी गयी l 1950 और 60 के बीच आये लोगों को मतदान का अधिकार दिया गया l असम में कौन पहले आया और कौन बाद में, इस बात पर हमेशा से ही बहस होती रही है l किस समुदाय ने असम के विकास में क्या योगदान दिया है, क्या इसका मुक्यांकन कभी हो पायेगा ? असम में ना जाने कितने वर्षों से हिंदी भाषी रह रहे है, इसके कोई पुख्ता सबुत तो नहीं है, पर दस्तावेज बताते है कि पंद्रहवी शताब्दी से ही राज्य में हिंदी भाषियों का जमावड़ा शुरू हो गया था l इस बात के भी प्रमाण है की अंग्रेजो से पहले कोच राजाओं ने उत्तर भारत के कई राजाओं के साथ संधि भी की थी l पर जब से हिंदी भाषियों ने असम में रहना शुरू किया है, उन्होंने असम को ही अपनी भूमि माना है और कभी भी पृथकवादी राजनीति नहीं की l अभी भी हजारों ऐसे लोग है, जिन्होंने कभी भी असम में रह कर कोई स्थानीय दस्तावेज नहीं बनवाया या जाली दस्तावेज बनवाने की चेष्टा की l बस वर्षों से रह रहें है l असम आन्दोलन के दौरान जब विदेशी हटाओं के नारा गुंजायमान था, तब असम के हिंदी भाषियों ने तन-मन और धन से इस आन्दोलन को समर्थन दिया था l उन दिनों भी यह बात उठी थी,जब 1983 में असम में विधान सभा के चुनाव हुवे थे, जिसमे कुल 33 प्रतिशत लोगों ने ही मतदान किया था l उस समय राज्य में विवादस्पद कानून आईएम् (डीटी) लागु था, जिसके विरोध में असम के ज्यादातर लोगो थे, पर इस कानून को पास कर दिया गया l नतीजा यह हुवा कि सन 1983 के चुनाव फिस्सडी साबित हुए l सन 1985 में जब नए सिरे से असम चुनाव हुए और क्षेत्रीय पार्टी असम गण परिषद् ने सत्ता संभाली थी l सत्ता मिलने के बावजूद एक भी विदेशी नागरिक को बहिष्कृत नहीं किया जा सका, जिसका मुख्य कारण था, विवादस्पद कानून आईएम् (डीटी) l उस समय सन 1983 और सन 1985 में जब चुनाव हुए थे l यह स्थिति कमोबेश यूँ ही चलती रही, जब तक मामला उच्चतम न्यायलय में नहीं पंहुचा, जब विवादस्पद कानून आईएमडीटी को उच्चम न्यायलय ने अवेध घोषित कर दिया था l उल्लेखनीय है कि सर्वानन्द सोनोवाल के प्रयास से यह कार्य संभव हो पाया था l तभी से असम में उनको जातिय नायक कहा जाता है l इसलिए अब दुबारा से अगले साल चुनाव होने है, मतदाता सूचि में संसोधन होना ही है l इस सूचि में सभी अपना नाम दर्ज करवाए, तभी जा कर बात में वजन आएगा l     

असम में संवेदनाएं कुरेदने से काम बन जाता हैं l परिवर्तन नाम से सरकार बदल सकती है l यह इसलिए है, क्योंकि असम को बड़ी मुश्किल से अपने अधिकार मिले हैं l जब कच्चे तेल की रोयल्टी पर आंदोलन चल था, तब सभी को पता चला कि किस तरह प्राकर्तिक सम्पदा का दोहन हो सकता है, और उनकी कीमत क्या है l असम आंदोलन में घोषित 855 लोगों की जानें गयी थी l देश के प्रति प्रेम कब क्रांति में बदल जाती है, यह पता ही नहीं चलता और फिर क्रांति परिवर्तन की मांग करने लगती है l इस समय राजनीति में भरी उथल पुथल देखने को मिल रही है l नई पार्टियाँ और नए गठबंधन के संकेत भी मिल रहे है l पर बड़ी बात यह रहेगी कि असमिया अस्मिता और पहचान बनाये रखने के लिए एक मुक्कमल जहां जो भी बनाएगा, वही सिरमौर कहलायेगा l उसी की जीत होगी l       

Friday, September 4, 2020

अबाबील, तुम अपना घोंसला क्यों छोड़ जाती हो ?

 

अबाबील, तुम अपना घोंसला क्यों छोड़ जाती हो ?



भारत में स्थानीय और बाहरी की समस्या कई राज्यों में है l भूमिपुत्र के नाम से कहलाये जाने वाले लोगों को हमेशा से ही अपने राज्य के संसाधनों में अग्राधिकार रहता आया है l यह बात हम सब को पता है यद्यपि कही जाने वाली बात नहीं है, पर सत्ता के गलियारों में स्थानीय और बाहरी लोग, जैसे विषय हमेशा ही चर्चा में बने रहते है l जब असम आंदोलन शुरू हुवा था, तब भी यह एक प्रमुख विषय था, आज 41 वर्षों बाद भी यही विषय धारा 6 के रूप में, एनआरसी के रूप में हमारे सामने है l इसके विश्लेषण की और कोई नहीं जाता, कि क्यों बार बार स्थानीय लोगों के संरक्षण की बात बार बार जोरो से उठती है l क्यों जाति, रंग और भाषा के नाम पर भूमि पर रक्त बहने लगता है l शायद भारतीय लोगों में जातिवाद के बीज इतने गहरे है कि हम कितने भी आधुनिक हो जाय, एमए पीएचडी की डिग्री ले ले, पर एकदम अंदर हम वही 18वी शताब्दी के लोगों की तरह से ही रहते है l जो बड़ी बड़ी बातें हम स्टूडियो में बैठ कर करते है, वें कोरी कल्पना मात्र ही रहती है, जो हम बोलना चाहते है, वह बात जबान पर आते आते रुक जाती है, और जो हम बोलते है, वह सफ़ेद झूठ और पाखंड के अलावा कुछ नहीं है l समाज का रंग-रूप और बाहरी आवरण और बोल चाल भले ही आधुनिक शैली का दिखता है, पर बार बार जाति और भाषा पर आंदोलन होना, यह बात का सबूत है कि एक भय और शंका लोगों के अंदर कही घुसी हुई है, जो बार बार उफान मरती है l जातिवाद के बीज बार बार हरे होने के कई कारण होते है l एक, राजनीतिक सत्ता हासिल करना, दूसरा, सरकारी नौकरी में ज्यादा से ज्यादा एक ही जाति के लोगों को लाना, तीसरा, राज्य के संसाधनों पर स्थानीय लोगों का अधिकार होना और चौथा सत्ता फिसलने का भय रहना l

असम में स्थाई रूप से रह रहे हिंदी भाषियों की इतनी भी संख्या नहीं है कि वह राज्य की राजनीति में भूचाल ला दे l ना ही वह अपने दम पर किसी एक विधान सभा की कोई सीट जीत सकती है l असम में जितने भी विधानसभा सदस्य हुए है, उनकी स्थानीय लोगों में ख्याति इतनी अधिक थी, कि सभी लोगों ने उनको माथे पर चढ़ाया l पर जब जातिवाद के नाम पर तीव्र हमले शुरू हुए, उसका गर्भ में यही बीज छिपा था कि कैसे बाहरी लोगों को मुख्यधारा से अलग किया जाय l नतीजा यह हुवा कि राजनीति मात्र एक विमर्श का विषय बन गया, उसके परिणाम और फायदा-नुकसान से किसी को कोई मतलब नहीं रह गया l चूँकि संख्या मात्र 6-7 प्रतिशत ही है, और वह भी राज्य के कौन कौन में फैली हुई, किसी भी एक सीट को प्रभावित नहीं कर सकती l हां, जीत के अंतर को बढ़ने के लिए यह संख्या काम में आ सकती है l अन्यथा, कई बार इनको एक दुधारू गाय की तरह इस्तेमाल भी किया हैं l



अबाबील नामक एक प्रवासी पक्षी वर्ष  में दो बार करीब 6000 किलोमीटर का सफ़र यूरोप और दक्षिण अफ्रीका के बीच करती है और वापस अपने उसी घोसले में लौट आती है l इस रहस्य को कोई समझ नहीं सका है कि कैसे कोई पक्षी वापस अपने बनाये हुए घोसले में छह महीने बाद भी लौट आती है l एक स्पेनिश कहावत है, “अबाबील तुम अपना घोसला क्यों छोड़ जाती हो” l क्यों चली जाती हो, ठंड के कारण या फिर खाना ढूंढने l शायद खाना ढूंढने, पर इतनी दूर क्यों ? भूमंडल के एक कौने से दुसरे कौने की ओर l शीत से बचने के लिए और पर्याप्त खाने कि तलाश में अबाबील घंटों और दिनों तक उड़ सकती है, प्रशांत महासागर और रेगिस्तानों को पार कर जाती है, बिना रुके l मानव प्रवजन भी कुछ इसी तरह से है, खाने कि तलाश में अपने घरोंदे बना डालता है, और वापस लौट कर उसी में आ जाता है l प्रवजन करने की ललक उसकी जन्मजात जो है l धीरे धीरे वह वही पर घुलमिल जाता l कोलोम्बस ने भी इसी तरह से नई मानव सभ्यता की खोज की थी, जो सागर पार कभी भोजन की तलाश में गई थी, और उर्वर माटी को देख कर वही रुक गयी थी l असम की उर्वर माटी और अतिथि परायण लोगों ने दोनों हाथों से प्रवासियों को हमेशा से ही गले लगाया हैं l समस्या हिंदी भाषियों से कभी भी नहीं हुई, बल्कि, जब बड़ी संख्या में पूर्वी पाकिस्तान से प्रवजन करके लोग आने शुरू हुए, और जनसांख्यिकी में बदलाव देखने को मिलने लगे, तब जा कर राजनीति सक्रिय हुई और ढोल नगाड़े बजने शुरू हो गए l जब वैज्ञानिकों ने कुछ प्रवासी पक्षियों पर प्रयोग करने शुरू किये, तब उन्होंने कुछ कबूतरों के आखों पर चश्मे लगा दिए, चुम्बकीय थेले लगाये गए, ताकि वें स्थानों को नहीं पहचान सके, पर उन्होंने सभी बाधाओं को पार करके दुबारा से अपने घोसलों की और रुख किया था l इसी तरह से वर्षों से प्रवासी हिंदी भाषियों का बार बार वापस आना, और यही रुक जाना यही एक संकेत है कि यही उसका घोसला है, जिसमे वह वापस चला आता है l जो लोग रुक गए है, उन्होंने स्थानीय भाषा संस्कृति को ना सिर्फ अपनाया है बल्कि उसका प्रसारण भी किया है l वरिष्ठ लेखक सांवरमल संगानेरिया ने वैष्णव गुरु श्रीमंत शंकरदेव पर हिंदी में एक शोध ग्रन्थ रच कर, इस संत को असम से बाहर ले जाने का एक गुरु कार्य किया है l इससे हिंदी पट्टी के लोगों को असम और असमिया भाषा संस्कृति को जानने का मौका मिला और असमिया भाषा संस्कृति को बढ़ावा मिला l जिस तरह नाविक को अबाबील पक्षी दिखने पर यह पता चल जाता है कि किनारा नजदीक है, उसी तरह से बड़ी संख्या में हिंदी भाषियों का स्थानीय भाषा संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना, इस बात को दर्शंता है कि वें हमेशा से ही असमिया संस्कृति के साथ जुड़े रहे हैं l