Tuesday, October 2, 2018

टूटते सपनों के बीच विकास की परियोजनाएं


टूटते सपनों के बीच विकास की परियोजनाएं
रवि अजितसरिया
एक बार निवर्तमान मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने कहा था कि वे गुवाहाटी को संघाई बना देंगे l उन्होंने यह बात गुवाहाटी के ब्रह्मपुत्र के किनारे को सुन्दर बनाने के सन्दर्भ में कही थी l संघाई, चीन और समूचे एशिया का सबसे बड़ा शहर है, जिसकी आबादी 2 करोड़ 40 लाख है, जो करीब 7 हजार वर्ग किलोमीटर तक फैला हुवा है l चीनी भाषा में संघाई का मतलब होता है नदी या समुद्र के उपर’ l व्यापारिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण बंदरगाह है, जो पूरब को पश्चिम से जोड़ता है l यहाँ बंड नामक एक नदी का किनारा है, जिसके किनारे एतिहासिक इमारतों की एक कतार बनी हुई है l यह एक संघाई का बेहद सुंदर इलाका है l गुवाहाटी और उत्तर गुवाहाटी के बीच पुल बनाने की घोषणा पिछले 14 वर्षों में चार बार की गई, पर आज तक यह योजना तिल मात्र भी नहीं घिसकी, जिसका खामियाजा उत्तर गुवाहाटी के लोग अपनी जान दे कर चूका रहें है l पिछली पांच तारीख को उत्तर गुवाहाटी में एक नावं के पलटने से करीब 20 लोगों के डूबने की आशंका व्यक्त की जा रही है, जबकि 12 लोगों को बचा लिया गया था l असम इनलैंड वाटर ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट, जो गुवाहाटी और उत्तर गुवाहाटी के बीच चलने वाली नावं और जहाजों का संचालन करता है, उनके एक अधिकारी के मुताबिक, सिर्फ 22 टिकट बेचे गए थे जबकि लोग ज्यादा सवार थे। विभाग से लाइसेंस लेकर प्राइवेट कंपनियों द्वारा मशीनचालित नावें चलाई जाती है, जिसकी मदद से हजारों यात्री रोज नदी पार करते हैं। इस बड़ी दुर्घटना से लोगों में दुःख भी है तो भरपूर गुस्सा भी है l गुस्सा इसलिए है क्योंकि नावं और जहाज चालन का संचालन सही तरीके से नहीं हो रहा था l जिस पुल बनाने की घोषणा कई सरकारें पिछले 14 वर्षों से कर रही है, वह अभी भी कागजों में ही बन रही थी l गुस्सा इसलिए भी है, क्योंकि सरकार उत्तर गुवाहाटी और गुवाहाटी के बीच चलने वाली इन नावों को लाइसेंसे तो दे रही है, पर उनका रखरखाव कैसा है, इस बात पर ध्यान नहीं दे रही है l गुवाहाटी शहर का लम्बा नदी किनारा पर्यटकों के लिए एक आनंद का स्थान बन सकता हैं l इसके किनारे अभी दो चलता-फिरता रेस्टोरेंट और एक डिस्को चल रहा है l अगर नदी के किनारों को मुंबई के मेरिन ड्राइव की तर्ज पर आगे ले जाया जाय, और फिर तट को सुंदर बनाया जाय, तब यह एक पर्यटकों के आकर्षण का स्थान पबन सकता है l मरीन ड्राइव मुंबई में 1920 में निर्मित हुआ था, जो बारह वर्षों में बन कर तैयार हुवा था । यह अरब सागर के किनारे-किनारे, नरीमन प्वाइंट पर सोसाइटी लाइब्रेरी और मुंबई राज्य सेंट्रल लाइब्रेरी से लेकर चौपाटी से होते हुए मालाबार हिल तक के क्षेत्र में स्थित है। मरीन ड्राइव के शानदार घुमाव पर लगी स्ट्रीट-लाइटें रात्रि के समय इस प्रकार जगमाती हैं कि इसे क्वीन्स नैकलेस का नाम दिया गया है। उपर से अगर सिंगापूर की हेंडरसोन वेव नामक पुल की तर्ज पर उत्तर गुवाहाटी और गुवाहाटी के बीच एक पुल बनाया जाय, तब तो सोने पर सुहागा हो जाएगा l उल्लेखनीय है कि इस सिंगापूर की पुल पर पर्यटक देर रात तक घुमने जातें हैं l गुवाहाटी को संघाई बनाने का गोगोई का सपना साकार होगा या नहीं, इस बारे में तो कहना मुश्किल है, पर नई सरकार के आने के करीब २७ महीने गुजरने के पश्चात भी हम गुवाहाटी के हालात में कोई जबरदस्त सुधार नहीं देख रहें है l हाल ही गुवाहाटी में भंग की गई नगर निगम काउंसिल के पार्षदों ने सफाई और कचरा निष्पादन का कार्य बड़ी बखूबी से किया, पर जहाँ तक सुन्दरता का सवाल है, अभी भी वही पुरानी गुवाहाटी पसरी पड़ी हुई है l नई सरकार से लोगों ने बड़ी अपेक्षा की हैं  कि सरकार उन योजनाओं पर कार्य करना शुरू करे, जो पिछली सरकार के समय पारित की गयी थी l इस समय  बिजली के तारों को जमीन में केबल के माध्यम से हस्तांतरित करने का कार्य शुरू हुवा है l ख़ुशी की बात यह है कि गुवाहाटी और उत्तर गुवाहाटी के बीच केबल-कार योजना, पुरानी जेल भूमि पर वनस्पति उद्यान बनाना, यातायात व्यवस्था को दुबारा निर्धारित करना, इत्यादि, योजनाओं पर इस समय गुवाहाटी विकास विभाग तेजी से कार्य कर रहा है l गुवाहाटी का फैंसी बाज़ार इलाका, पूर्वोत्तर की सबसे बड़ी व्यापारिक मंडी है, जहाँ हर वक्त व्यापारिक गतिविधियाँ चलती रहती है l गुवाहाटी और उत्तर गुवाहाटी के बीच हजारों लोग सफ़र करतें है, जो नौकरी और व्यवसाय के लिए गुवाहाटी आतें है l इस पुल के बनाने से गुवाहाटी की सुंदरता बढ़ेगी ही, साथ ही उत्तर गुवाहाटी भी गुवाहाटी का एक अभिन्न अंग बन जायेगा l  अगर गौर से देखा जाये, तब पाएंगे कि स्मार्ट सिटी परियोजना के मसौदे से अभी भी लोग अनजान है l उसका मोड्यूल कौन सा होगा, परियोजना के व्यय धन वाकई में लोगों के काम आ सकेगा l तमाम तरह की शंकाएं अभी भी जीवित है l दरअसल में आमतौर पर देखा जाता है कि इस तरह से आनन-फानन नई योजना पर काम तो शुरू हो जाता है, पर बड़ा प्रश्न यह रहता है कि वाकई में योजना से लोगों की जीवन शैली में कोई उत्थान देखा जा सकता है l विकास के नाम पर जिस तरह से नकारात्मक राजनीति और कारोबार चल रहा है, उससे ये तमाम योजनाओं के सफलतापूर्वक होने में संशय होना लाजमी है, और उपर से नावं दुर्घटना, मुहं का स्वाद एकाएक खट्टा हो जाता है, और हम एक नॉन-रिटर्निंग स्टेज में चलें जातें है, जहाँ से उसका लौटना मुश्किल ही नहीं नामुनकिन हो जाता है l उसे तमाम योजना के सफल होने का दंभ भरतें राजनेतिक नेताओं के ढकोसले एकाएक बेमानी से लगने लागतें है l इतिहास गवाह है कि राजनेतिक खम्भों पर टिकी हुई योजनाओं के मानव सापेक्ष नहीं होने के वजह से उसके सफल होने पर प्रश्न चिन्ह लग जातें है, क्योंकि योजना में निहित उद्देश्य व्यक्तिगत कल्याण के लिए बनें हुए है, जिससे आमजनों का भला होना संभव नहीं हो सकता l अभी सरकार के लिए गुवाहाटी शहर में हो रही कृत्रिम बाढ़ को रोकना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है l
इन्ही तमाम विरोधाभासों के बीच अभी भी यह तय नहीं हो रहा है कि मानवजाति के विकास का कौन सा रास्ता अपनाया जाये, एक, जिसको पाने के लिए भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है, दूसरी, जिसमे वर्तमान से चिपक कर अर्ध-विकसित तकनीकों के बोझ को ढोतें हुवे, संस्कृति का महाजाप करतें हुवे अप्रासंगिक हो जाये l मुद्दों को लेकर अगर सरकार संवेदनशील है, तब वह बहुत कुछ कर सकती है l               

सुचना तकनीक पर आधारित व्यापार को लेकर तमाम शंकाएं


सुचना तकनीक पर आधारित व्यापार को लेकर तमाम शंकाएं
शुक्रवार को भारत में सिंगल रिटेल में 100 प्रतिशत विदेशी निवेश के विरोध में फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया एवं विभिन्न राज्यों के उद्योग व्यापार प्रतिनिधिमंडल ने जीएसटी, एफडीआई, मंडी शुल्क, सैंपलिंग, आयकर, ऑनलाइन ट्रेडिंग के विरोध में भारत बंद का आह्वान किया था। असम में भी इसका प्रभाव देखने को मिला l गुवाहाटी में सायं पांच बजे तक दुकानें और अन्य प्रतिष्ठान बंद देखे गए l इसे एक व्यापक जन आन्दोलन की तरह देख जा रहा है l विश्व में अब तक जितने भी बड़े जन आन्दोलन सफल हुए हैं, उसके कारण को अगर ढूंढे, तब पायेंगे कि उन आंदोलनों में एक विशाल जन भागीदारी थी, जिसकी वजह से ये आन्दोलन सफल हुए और अपने उद्देश्य तक पहुचें l आन्दोलन के उद्देश्य कोई भी हो, अगर उसमे जन समूह का स्वतःस्फुर्थ भागीदारी है, तो यह तय हैंकि सरकार को झुकना ही होगा l फ़्रांसिसी क्रांति जो सन 1789 से 1799 तक दस वर्षों तक चली, आधुनिक युग में जिन महापरिवर्तनों ने पाश्चात्य सभ्यता को हिला दिया था, उसमें फ्रांस की राज्यक्रांति सर्वाधिक नाटकीय और जटिल साबित हुई। इस क्रांति ने केवल फ्रांस को ही नहीं अपितु समस्त यूरोप के जन-जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया था । फ्रांसीसी क्रांति को पूरे विश्व के इतिहास में मील का पत्थर कहा जाता है। इस क्रान्ति ने अन्य यूरोपीय देशों में भी स्वतन्त्रता की ललक कायम की और अन्य देश भी राजशाही से मुक्ति के लिए संघर्ष करने लगे। इसने यूरोपीय राष्ट्रों सहित एशियाई देशों में राजशाही और निरंकुशता के खिलाफ वातावरण तैयार किया। ऐसे बड़े आंदोलनों में भारत का स्वतंत्रता आन्दोलन भी था, जिसमे आपार जन भागीदारी थी, जिससे अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था l सन 1970 में जेपी आन्दोलन के नाम से मशहूर सम्पूर्ण क्रांति में सम्पूर्ण क्रान्ति जयप्रकाश नारायण का विचार व नारा था जिसका आह्वान उन्होने इंदिरा गांधी की सत्ता को उखाड़ फेकने के लिये किया था।लोकनायक नें कहा कि सम्पूर्ण क्रांति में सात क्रांतियाँ शामिल हैं- राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक व आध्यात्मिक क्रांति। इन सातों क्रांतियों को मिलाकर सम्पूर्ण क्रान्ति होती है।पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति का आहवान किया था। मैदान में उपस्थित लाखों लोगों ने जात-पात, तिलक, दहेज और भेद-भाव छोड़ने का संकल्प लिया था। सम्पूर्ण क्रांति की तपिश इतनी भयानक थी कि केन्द्र में कांग्रेस को सत्ता से हाथ धोना पड़ गया था। बिहार से उठी सम्पूर्ण क्रांति की चिंगारी देश के कोने-कोने में आग बनकर भड़क उठी थी। यह एक सामाजिक क्रांति और हसियाग्रस्त लोगों का शासन के प्रति जन आक्रोश था, जो एक क्रांति बन कर उभरी थी l हालाँकि जेपी आन्दोलन सफल होने के बावजूद भी भारत में आज भी जातिगत राजनीति की जाती हैंl
भारत में खुदरा बिक्री का प्रारूप को अगर हम देखे, तब पायेंगे कि ज्यादातर उत्पाद हॉकर/सड़क विक्रेता (ज्यादातर ताजा फल और सब्जियाँ ),सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत उचित मूल्य की दुकानें (पीडीएस),परंपरागत खुदरा विक्रेता, मुख्य  उपज, एफएफवी, और मासं के लिए अलग-अलग दुकानें,जनता बाजार, और सैन्य कैंटीन जैसी सहकारी संस्थाएं।लाभ मुक्त दुकानें, आधुनिक संगठित खाद्य खुदरा श्रृंखला,छोटी से मध्यम खाद्य खुदरा दुकानें जैसी मीडियम और छोटी इकाइयों के माध्यम से ही बिकते हैंl बड़े उत्पादनकर्ता इन दुकानों के माध्यम से अपने उत्पाद बेच्तें हैंl इस समय भारत में संगठित रिटेल व्यापर करीब 150 अरब अमिरीकी डॉलर का है l भारत में करीब 10 करोड़ छोटे और माध्यम दुकानदार है, जो भारत के तमाम बड़े और मध्यम-वर्गीय शहरों, कस्बों और गावों में स्थित है, जहाँ बाजार और हाटों में बनी हुई छोटी बड़ी दुकानों में घी-तेल, दूध-ब्रेड, दाल-आटा, बिस्कुट-नमकीन, शैम्पू-टूथपेस्ट जैसी तमाम चीज़ें मिलती हैंl किराने की एक छोटी दुकान- काउंटर के उस पार ज़रूरी नहीं कि सामान करीने से लगा हो लेकिन अक़्सर जो नहीं भी दिख रहा होगा, माँगने पर मिल जाएगा l खुदरा व्यापार में 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का प्रस्ताव सरकार ने ले लिया हैं, और जानकारों के मुताबिक़ अगर ऐसा हुआ तो उनके घाटे बढ़ जाएंगे, ग्राहक टूटेंगे और फिर वापस शायद ना आएं l गली के नुक्कड़ पर या फिर घर के पास वाली दुकानों के हो सकता हैंकि ग्राहक एक आध ब्रेड पानी खरीद ले, पर विदेशी चैन में ऑफर की जाने वाली योजनाओं और केशबेक का सामना ये दुकानें कभी नहीं कर पाएगी l उनका अच्छा व्यवहार, वर्षों का रिश्ता भी ग्राहकों को बड़े स्टोर में जाने से नहीं रोक पायेगा l भारत का नब्बे फ़ीसदी से ज़्यादा खुदरा उद्योग असंगठित है l कुछ उपभोक्ताओं के मुताबिक उनकी पसंद घर के नज़दीक की छोटी दुकानें हैं क्योंकि वैसी विविधता मॉल में नहीं मिलती l वें कहतें हैंकि गाड़ी लेकर जाओ, पार्किंग करो, सामान भी खुद बटोरो, फिर पैसे देने के लिए लंबी लाइन में लगो, घर तक सामान पहुंचाने का भी कोई तरीका नहीं, तो मॉल तक जाने मे ये सब दिक्कतें पेश आती हैंl वही युवाओं की पहली पसंद है, शौपिंग मॉल,  वे कहतें हैंकि दोनों बाज़ारों की अपनी अहमियत है, अगर कुछ ब्रान्डेड लेना हो, ख़ास लेना हो तो मॉल, लेकिन रोज़मर्रा के कपड़ों और बाक़ी चीज़ों के लिए पास का बाज़ार काफ़ी होता हैंl
तकनीक विस्तार और उसके लाभ लेने के लिए सामाजिक स्तर पर एक बदलाव देखने को मिल रहा है, पिज़्ज़ा से लेकर अन्य प्रोसेस्ड खाने की डिलीवरी के लिए इस समय देश में लाखों युवकों को रोजगार मिल रहा हैंl ठीक इसी तरह से छोटी और मध्यम इकाइयाँ भी असंगठित क्षेत्र में रोजगार उपलब्ध करवा कर एक बहुत बड़ा सामाजिक रोल अदा कर रही हैंl कोई कल्पना कर सकता हैंकि अगर इन दुकानों में ग्राहक नदारद हो जायेंगे, तब किस तरह की परिस्थिति देश में होगी l बदलाव अवश्यम्भावी है, पर उसकी कीमत अगर रोजगार और मुहं का निवाला हैं, तब ऐसा बदलाव किस काम का l  

Friday, September 14, 2018

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत


मन के हारे हार है, मन के जीते जीत
मन के हारे हार है,
मन के जीते जीत है।
कहे कबीर गुरु पाइये,
मन ही के प्रतीत।।
संत कबीर के इस दोहे से शुरुआत करते है l जब से मनुष्य में जीने के लिए जद्दोजहेद शुरू की है, उसने मन को सबसे पहले संतुलित किया है l मन यानी दृढ निश्चय l एक बार उसने निश्चय कर लिया, बस फिर विजय उसके कदम चूमती है l सरकारी आदेशों और राजनैतिक घोषणाओं ने भारत में हमेशा से ही अपना प्रभाव तेजी से दिखाया है l असम में इस समय हवा तेजी से बदल रही है l मानो एन आर सी के अलावा लोगों को कुछ सूझ ही नहीं रहा है l जिनके नाम नही आयें है, वे हाथ पर हाथ धर कर बैठें हुए हैं l रोजाना एक नई घोषणा लोगों की दिल की धड़कन तेज कर रही है l अब लोगों को 19 तारीख का इंतेजार है, जब दुबारा से क्लेम फॉर्म एनआरसी केंद्र में लिए जायेंगे l 15 दस्त्रवेजों पर उच्चतम न्यायलय का निर्णय आने वाला है l इधर राजनीतिक पार्टियाँ यह कह रही है कि किसी भी भारतीय का नाम बाद नहीं जायेगा l पर यह कैसे होगा, यह कोई नहीं कह रहा है l एन आर सी केन्द्रों में क्लेम फॉर्म रिसीव नहीं कर रहें है l कह रहें है कि उचित दस्तावेज नहीं है l कितना विरोधभास है l राजनैतिक घोषणाओं की तरह, जिसको धरातल के तराजू में अगर टोला जाए, तब घोषणा की हवा अक्सर निकल जाती है l आम आदमी की छटपटाहट इसी बात से दिखाई दे रही है कि लोग अपने पुरखों के नाम अपने मूल स्थानों में खोजने में लगें हुए है l किसी तरह से कोई दस्तावेज हाथ लग जाए l 1971 के पहले के दस्तावेज निकलना भी एक टेढ़ी खीर है, वह भी 47 वर्षों बाद l असम में जिस एन आर सी की मूल साईट से लिगेसी डाटा निकलते थे, वह इस समय किसी कारण से बंद कर दी गयी है, जिसकी वजह से लोग अपने नाम दुबारा से ढूंढ नहीं पा रहें है और वे सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगा रहें है l इसी तरह से इस समय प्रत्येक राजनेता एक ही भाषण दे रहा हैं कि किसी भी भारतीय का नाम नहीं छुटेगा l पर आगे आ कर वही नेता किसी भी भारतीय को यह समझा नहीं पा रहा कि कैसे उसका नाम अंतर्भुक्त हो पायेगा l कुछ लोग मानसिक रूप से टूटने की कगार पर है l कारण साफ़ है, लाख कौशिश करने पर भी वे दस्तावेज जुगाड़ नहीं कर पाए l उन्हें भय है कि उनको कई भारत के बाहर नहीं खदेड़ा जाय, या विदेशी अधिनियम के तहत कही मामला नहीं दर्ज किये जाय l चार्टर्ड अकाउंटेंट ओमप्रकाश अगरवाला कहते है कि भारतीय नागरिकता कानून, 1955 लोगों की सहायक बन सकती है l उनका कहना है कि 26 जनवरी 1950 के बाद परन्तु 1 जुलाई 1947 से पहले भारत में जन्मा कोई भी व्यक्ति जन्म के द्वारा भारत का नागरिक है।1 जुलाई 1987 इसमें संशोधन हुवा और इसमें यह जोड़ा गया कि 1 जुलाई 1987 के बाद भारत में जन्मा कोई भी व्यक्ति भारत का नागरिक है यदि उसके जन्म के समय उसका कोई एक अभिभावक भारत का नागरिक था। 7 जनवरी 2004 के बाद भारत में पैदा हुआ वह कोई भी व्यक्ति भारत का नागरिक माना जाता है, यदि उसके दोनों अभिभावक भारत के नागरिक हों अथवा यदि एक अभिभावक भारतीय हो और दूसरा अभिभावक उसके जन्म के समय पर गैर कानूनी अप्रवासी न हो, तो वह नागरिक भारतीय या विदेशी हो सकता  हैं l यहाँ वे कहने का प्रयास कर रहें है कि 1 जुलाई 1987 तक भारत में जन्मे किसी भी व्यक्ति विदेशी करार नहीं दिया जा सकता है, अगर वह भारत में पैदा होने का प्रमाण दे सके l सन 2004 में एक अन्य संशोधन में घोषित किया गया कि जन्म के अधिकार से कोई भी नागरिक भारतीय हो सकता है, अगर उसके दोनों अभिभावक भारतीय हो l सन 1985 में एक नई धरा 6ए भी अंतर्भूत की गयी है, जो बांग्लादेशियों से डील करने के लिए बनाई गई है l अगर मोटे तौर पर देखे तो पाएंगे कि जिन भारतियों के पास एन आर सी बनवाने के पास दस्तावेज नहीं भी है, और उनके पास भारत में जन्म होने का प्रमाण पत्र मौजूद है, तब कम से कम उनको भारत से कोई भी निकाल नहीं पायेगा, यह तय है l इसलिए जितनी भी अफवाहे जो निकल कर आ रही है, वे निर्मूल और बेबुनियाद है l इस समय एन आर सी को लेकर भयंकर राजनीति हो रही है l हर कोई हिंदीभाषियों, बांग्लाभाषियों का रहनुमा बन रहा है l भारतीय नागरिकता अधिनियम 1955 इसमें लोगों की सहायक बन सकती है l हालंकि ओमप्रकाश अगरवाल भी कहते है कि इस संशोधन के उपर उच्चतम न्यायालय के बहुत सारे निर्णय भी है, जो इस अधिनियम को अपने मूल स्वरुप में लागु होने से रोकता है l उपर से असम में असम समझोता के साए में किये गए संसोधन 6ए भी अपने आप में एक कानून है l  
तेजी से बदलते दौर में, विचारों का बदलना भी एक स्वाभाविक सी प्रक्रिया है l अब रोटी-कपड़ा-मकान से जीवन नहीं चलता, बल्कि उन तमाम जरूरतों को जुटाते हुए जीवन को जीने की एक कला है, जिसको हर मनुष्य आज ढूँढ़ रहा है l कुछ लोग जो जीवन भर संघर्ष भरा जीवन जी रहें होतें है, उनके लिए मात्र समृद्धि ही सुखी होने की निशानी है l आसुओं से कुश्ती लड़ कर कुछ लोग, एक नई जिंदगी जीने के लिए जीवन से ही प्रेरणा प्राप्त कर लेतें है l खिड़की के झरोखे से दिखाई देने वाला एक छोटा सा दृश्य भी, उन्हें एक नए जीवन की और ले जाने में सक्षम है l परिवर्तन प्रकृति का नियम है। परिवर्तन सकारात्मक व नकारात्मक दोनों ही हो सकते हैं। तकनीक और सुचना प्रसारण अपने विकास के चरम पर है l मानव चाँद और अन्य ग्रहों पर घर बनाने की और अग्रसर है l न्याय संगत और विचार आधारित धरातल की सृजनशीलता ने मानवजाति के कद तो अब बहुत बड़ा बना दिया है l सन 1985 में बनी हिंदी फिल्म मेरी जंग का यह गीत इस समय याद आया रहा है.. ‘जीत जायेंगे हम-जीत जायेंगे$$ हम, तुम अगर संग हो.., जिंदगी हर समय एक नई जंग है...l
        

Sunday, September 2, 2018

भई, हिंदी भाषियों को ग़ुस्सा क्यों नहीं आयेगा ?


भई, हिंदी भाषियों को ग़ुस्सा क्यों नहीं आयेगा ?
स्वतंत्रता के पश्चात, असम में रहने वाले हिंदी भाषियों के, एक खास सामाजिक रहन-सहन के वजह से, वे हमेशा से पहचाने जातें रहें है l यूँ तो असम में जाति को लेकर यहाँ कभी भी विशेष समस्या नहीं थी, पर हिंदी भाषियों पर हमेशा से ही इसलिए नजर थी, क्योंकि यह कौम अपनी भाषा, रीति रिवाजों और स्टेटस की वजह से चिन्हित होती रही है l वर्ग संघर्ष होने की एक मुख्य वजह यह भी रही कि असम में चारो दिशा से सदियों से लोग बसते चले गए, जिससे एक जाति का यहाँ कभी कोई वर्चश्व नहीं रहा, जिससे जातियों में संघर्ष वैचारिक रूप से विद्यमान बना रहा, कभी सतह पर तो कभी अंतर्मन में l विभाजन की स्थिति तब बनी जब, बोडोलैंड के आन्दोलन का सूत्रपात हुवा l उस समय असम के बुद्धिजीवियों ने ह्रदय पर पत्थर रख कर यह समझोता होने दिया, क्योंकि इससे इलाके में शांति हो रही थी l असम में रहने वाली विभिन्न जनजातियों को संविधानिक दर्जा देने के लिए लगातार आन्दोलन होते रहें है, जिससे हिंदी भाषियों के लिए संघर्ष की स्थितियां और कठिन होती गयी है l यह इस लिए कहा जा रहा है कि यह समुदाय हमेशा से ही सॉफ्ट टारगेट बना रहा है l एनआरसी की सूची जारी होने के बाद जिन लोगों के के नाम एन आर सी में नहीं आयें है, उनको इस बात का खतरा लग रहा है कि कड़े कानून,उनको कई सुविधाओं से वंचित नहीं कर दे l दबी जुबान में यह भी कहा जा रहा है कि जो लोग दशकों से असम में रह रहे थे, वे न तो पहले की तरह वोट दे सकेंगे, न इन्हें किसी कल्याणकारी योजना का लाभ मिलेगा। बड़ी संख्या में बंगला भाषियों के नाम एन आर सी सूची से काटे गएँ है, जिससे पूर्वी बगाल से अवैध रूप से आये लोगों पर स्टेटलेस होने का खतरा मंडराने लगा है l वहीं चुनाव आयोग ने भी स्पष्ट किया है कि एनआरसी से नाम हटने का मतलब यह नहीं है कि मतदाता सूची से भी ये नाम हट जायेंगे l उन्होंने कहा कि  जनप्रतिनिधित्व कानून 1950 के तहत मतदाता के पंजीकरण के लिए तीन जरूरी अनिवार्यताओं में आवेदक का भारत का नागरिक होना, न्यूनतम आयु 18 साल होना और संबद्ध विधानसभा क्षेत्र का निवासी होना शामिल है l यह बात हिंदी भाषियों पर भी लागू नहीं होती, जो देश के दुसरे भाग से असम में व्यापार और रोजगार के सिलसिले में आये है अब बड़ी संख्या में हिंदी भाषियों के नाम राष्ट्रीय नागरिक पंजी से काटे गए है, जिनके दस्तावेज या तो सत्यापित हो कर नहीं आयें है, या फिर जिनके दस्तावेज साधारण नियमानुसार नहीं है l l पर हिंदी भाषियों को लेकर एक बड़ी राजनीति यहाँ पर शुरू हो गयी है l यह सिलसिला आज से नहीं बल्कि आजादी के बाद से बदस्तूर जारी है l 1947 में जब भारत-पाकिस्तान का बँटवारा हुआ तो कुछ लोग असम से पूर्वी पाकिस्तान चले गए, लेकिन उनकी ज़मीन असम में थी और लोगों का दोनों ओर से आना-जाना बँटवारे के बाद भी जारी रहा। जिसके चलते वर्ष 1951 में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर तैयार किया गया था। वर्ष 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद भी असम में भारी संख्या में शरणार्थियों का आना जारी रहा जिसके चलते राज्य की आबादी का स्वरूप बदलने लगा। 80 के दशक में अखिल असम छात्र संघ (आसू) ने अवैध तरीके से असम में रहने वाले लोगों की पहचान करने तथा उन्हें वापस भेजने के लिये एक आंदोलन शुरू किया। आसू के छह साल के संघर्ष के बाद वर्ष 1985 में असम समझौते पर हस्ताक्षर किये गए थे। गया। साथ ही यह फैसला भी किया गया कि असमिया भाषी लोगों के सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषायी पहचान की सुरक्षा के लिये विशेष कानून और प्रशासनिक उपाय किये जाएंगे। असम समझौते के आधार पर मतदाता सूची में संशोधन किया गया। यह पूरी प्रक्रिया असम समझोते के तहत शुरू की गयी है, जिससे असम में रहने वाले मूल निवासियों के अधिकारों की रक्षा की जा सके l
दशकों से रहने वाले हिंदी भाषियों के लिए यह अचानक आने वाली समस्या नहीं है, पहले भी उन्होंने यहाँ रहने की एक बड़ी कीमत चुकाई है l पर इस बात का खतरा उन्हें कभी भी नहीं था कि उनको असम से निष्कासित कर दिया जायेगा l आज भी उनको असम में रह कर रहवास और व्यापार करने की पूरी आजादी है, जैसा कि यहाँ के मूल निवासियों को है l वैचारिक स्वतंत्रता के अलावा, धार्मिक आस्था प्रकट करने के उचित माहोल है, यहाँ l व्यापार वाणिज्य में फैलाव इन्ही हिंदी भाषियों ने कठिन परिस्थितियों में किया ही है l इन सबके बावजूद भी, उन लोगों के लिए अब यह एक चुनौती है, जिनके नाम एन आर सी के अंतिम मसौदे से नाम छुट गए है, कि कैसे अंतिम एन आर सी में डाले जाए l इस बात में सभी एकमत है कि बड़ी संख्या में छुटे हुए लोगों को इस स्थिति से डट कर मुकाबला करना चाहिये l उन्हें एन आर सी सेवा केंद्र से सबसे पहले फॉर्म संग्रह करना चाहिये, और ‘नाम किसलिए नहीं आये’ के आधार पर दुबारा से क्लेम फॉर्म दाखिल करना चाहिये l फिलहाल, यह आरोप भी है कि अभी तक लाखों लोगों को अभी तक यह नहीं बताया गया है कि उनके नाम एन आर सी में क्यों नहीं आया है l उनके लिए स्थिति बड़ी विकट है l   

       

Thursday, August 23, 2018

असम में एन आर सी को लेकर बवाल


एन आर सी पर सामाजिक संस्थाए क्या कर रही है
लोकतंत्र में दबाब की राजनीति का बड़ा महत्व है, चाहे वह सामने आ कर हो या फिर नेप्पथ्य में हो कर की जाए l ऐसे दबाब समूह होते है, जो सत्ता को निर्णय बदलने में बाध्य कर देतें है l जब भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई तब, कुछ ऐसा नहीं हुवा कि अंग्रेज रातो-रात दिल्ली छोड़ कर चले गए l सामने से दबाब के लिए स्वतंत्रता आन्दोलन और पीछे से राजनैतिक तरीके से दबाब डाला गया, जिसके फलस्वरूप अंग्रेजों ने भारत छोड़ने का निर्णय लिया l जब असम आन्दोलन हुवा, तब वह छह वर्ष चला, खूब प्रदर्शन और हड़तालें हुई, पर दबाब की राजनीति भी खूब चली l तब जा कर एक समझोता हुवा, जिसे हम असम समझोता के नाम से जानते है l दबाव समूह ऐसे हित समूह होतें है, जो सार्वजनिक नीतियों को प्रभावित करके कुछ विशेष हितों को सुरक्षित करने के लिये काम करते हैं। वे किसी भी राजनीतिक दल के साथ गठबंधन नहीं करते तथा अप्रत्यक्ष रूप से काम करते हैं, परंतु ये बड़े शक्तिशाली समूह होते हैं, जो निर्णय को प्रभावित करने की क्षमता रखतें है । लोकतंत्र को मज़बूत करने के लिये और सामाजिक परिवर्तन के उद्देश्य को प्राप्त करने में दबाव समूह महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दबाव समूहों के माध्यम से नीति-निर्माताओं को यह पता चलता है कि कैसे कुछ विशेष मुद्दों पर जनता क्या अनुभव करती है। तमाम आलोचनाओं के बावजूद भी दबाव समूहों का अस्तित्व लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिये अनिवार्य है। दबाव समूह राष्ट्रीय और विशेष हितों को बढ़ावा देते हैं तथा नागरिकों एवं सरकार के बीच संवाद का एक ज़रिया बनते हैं। इस समय राज्य में हिंदी भाषियों की संस्थाओं को एक मजबूत दबाब समूह बनना होगा, जो बाहर से और अंदर से, दोनों, और से केंद्र पर दबाब बनाये, जिससे बड़ी संख्या में एन आर सी में छुटे हुए नामों को वापस डाला जा सके l वर्षों से हिंदी भाषियों ने कभी भी इस तरह से कोई मांग नहीं रखी है l ना तो कभी अपने लिए आरक्षण की मांग की है ना ही आंदोलन, प्रदर्शन, तालाबंदी आदि के द्वारा अपनी मांग मनवाने का प्रयत्न किया है l अब समय आ गया है कि हिंदी भाषियों के संगठन एन आर सी को लेकर सगज हो जाए, जिससे उनकी आने वाली पीढ़ी गर्व से सिर ऊँचा करके असम में रह सके l हिंदी भाषी लोगों की सामाजिक संस्थाएं किस तरह से अपने लोगों के नाम अंतिम एन आर सी में डलवाने के लिए क्या क्या प्रयास कर रही है, इसकी सुचना लोगों तक जरुर पहुचनी चाहिये l यह बात एक इनफार्मेशन और सहायता सेंटर खोल कर भी कही जा सकती है l इस बात में कोई दो राय नहीं है कि इन वर्षों में बहुत सी नई संस्थाए अपने लोगों के हितों की रक्षार्थ कार्य कर रही है है, पर वे कार्य सिर्फ आयोजनों तक ही सीमित रहते है l गावं, शहर और कसबे के नाम से बनी हुई संस्थाओं को क्या एन आर सी से कोई मतलब नहीं है ? क्या उनको आगे आ कर बड़ी अम्ब्रेला आर्गेनाईजेशन के हाथ मजबूत नहीं करने चाहिये ? धर्म-कर्म करने वाली कई बड़ी संस्थाओं को क्या इस महत कार्य में हाथ नहीं बंटाना चाहिये ? इस बड़े अभियान में हर तरह की निति को अपनाना होगा, नहीं तो वांछित परिणाम की आशा नहीं की जा सकती l यह भी समझी जानी चाहिये कि आंदोलनों में धन की बहुत आवश्यकता होती है, कई बार धन के अभाव में उचित प्रबंधन नहीं होता, जिससे आंदोलनों की आगे की रणनीति बाधित होती है l इस समय हिंदी भाषियों के लिए असम आन्दोलन के पश्चात अस्तित्व का प्रश्न दुबारा आया है, जिसको पार लगाना आवश्यक है l कई दबाब समूहों ने आबादी के शोषण के खिलाफ आंदोलन की अगुवाई की है और सरकार को निर्णय बदलने पर विवश किया है l इन दबाव समूहों को हितैषी समूह भी कहा जाता है l इनकी इच्छा सरकार में प्रभाव बनाकर अपने सदस्यों की रक्षा व हितों को बढ़ाना होता है l दबाव समूह विधिक और तर्कसंगत तरीकों द्वारा सरकार की नीति निर्माण व निर्धारण को प्रभावित करते हैं l जैसे कि सभाएं करना, पत्राचार,जन-प्रचार,जन वाद-विवाद आदि l हालांकि ये कभी-कभी लोकहितों और प्रशासनिक एकता को नष्ट करने वाले अतर्कसंगत और गैर-विधिक तरीकों का आश्रय लेते हैं, जैसे कि हड़ताल और हिंसक गतिविधियां,भ्रष्टाचार आदि l लेकिन फिर भी इन्हें किसी व्यवस्था का एक अभिन्न अंग माना जाता है! लोकतंत्र में भीड़ का भी बहुत महत्त्व है l नहीं तो एक बड़े नेता के एक शहर में भाषण के आयोजन पर पर गावं-गावं से लोगों को बसों में भर कर, खाना और पानी के प्रलोभन पर, शहर नहीं लाया जाता, यह जानते हुए भी उन लोगों को नेता के भाषण से कोई मतलब नहीं l फिर भी भीड़ इकट्ठी करनी बहुत जरुरी है l भीड़ यह बता देती है कि आयोजक कितना सक्रिय है l असम आन्दोलन के समय तब डिप्टी कमिश्नर के कार्यलय के सामने छात्रों के प्रदर्शन होतें थे, और कानून उलंघन कर छात्र गिरफ्तारी देतें थे, तब छात्र यह जानते थे, कि इस प्रदर्शन से कोई मसला तुरंत हासिल नहीं होने वाला, पर एक बड़ी भीड़ एसी कमरे में बैठे उस बड़े बाबु के माथे पर पसीने जरुर ले आती थी l कोई भी कल्पना कर सकता है कि एक ही समय जब सभी जिला और मंडल कार्यालयों के सामने प्रदर्शन हो रहें होते थें, तब सरकार पर कितना दबाब बनता था l ठीक इसी तरह से एन आर सी के मुद्दे पर सरकार पर दबाब बनाना उतना ही जरुरी है, जितना एक शांत नदी में एक मछुवारे द्वारा मछली पकड़ने के लिए जाल बिछाना, और फिर चुप-चाप नाव में इन्तेजार करना l इस समय असम के लिए और खास करके हिंदी भाषियों के लिए भी एक परीक्षा का समय है, जिसको मिड-टर्म या छमाही तो बिलकुल भी नहीं समझा जाना चाहिये l
असम में एन आर सी को लेकर इस समय हिंदी भाषियों के पास समय बहुत कम है, क्योंकि आगामी 28 तारीख से क्लेम, इत्यादि, के फॉर्म लिए जायेंगे l जिनके पास दस्तावेज नहीं है, उनके फॉर्म नहीं लिए जायेंगे l अब लोग दस्तावेज कैसे संग्रह करेंगे, यह एक लाख टेक का प्रश्न है l फिलहाल, 1971 के पहले की वोटर लिस्ट के लिए लोगो मारे-मारे फिर रहें है l क्या ऐसी कोई व्यवस्था हो सकेगी कि लोगों को 1971 की मतदाता सूची में नाम देखने की सहूलियत मिल जाए, जिसको टंकित करके लोगो क्लेम फॉर्म जमा दे सके l    

Wednesday, August 22, 2018

दिल्ली हो या गुवाहाटी, एक देश एक माटी


दिल्ली हो या गुवाहाटी, एक देश एक माटी

राष्ट्रीयता से ओतप्रोत, उपरोक्त नारा, एक राष्ट्र की अवधारना को तो महामंडित करता ही है, साथ ही देश में रहने वालें विभिन्न भाषाभाषी के अंदर सद्भाव और भाईचारे के भाव भी प्रदशित करता है l कहने का मतलब यह है कि दिल्ली में रहने वालें भी भारतीय है और असम में रहने वाले भी उसी देश के नागरिक है l उनको भी वही समान अधिकार है, जो दिल्ली के नागरिक को है l असम पूर्वोत्तर में एक बड़ा प्रदेश है, जहाँ सर्व-धर्म/भाषा-भाषी के लोगो वास करतें है, जो नौकरी और व्यवसाय के कारणों से असम आये थे l इनमे यहाँ की कई मूल असमिया जातियां भी शामिल है, जो सदियों पहले अलग-अलग जगहों से असम आई थें l महाभारत काल से लेकर सातवीं सदी के मध्य में भास्करवर्मन के शासनकाल तक यहाँ पर एक ही राजवंश का शासन रहा था। इस राजवंश के शिलालेखों में दावा किया गया है कि राजा भागदत्त और उसके उत्तराधिकारियों ने कामरूप में लगभग ३००० वर्षों तक शासन किया । नालंदा की मुद्रा में पुष्यवर्मन को प्रग्ज्योतिष का स्वामी कहा गया है। इन्ही स्रोतों से हमें पुष्यवर्मन के १२ परवर्ती शासकों का भी विवरण मिलता है। आठवे राजा भाष्कर्वर्मन के अधीन कामरूप एक शक्तिशाली राज्य बन गया। भास्कर वर्मन राजा हर्षवर्धन का साथी था। हर्ष की बाणभट्ट द्वारा रचित जीवनी हर्षचरित में उसका उल्लेख मिलता है। मध्यकाल में सन् १२२८ में बर्मा के एक चीनी विजेता चाउलुंग सुकाफा ने इसपर अधिकार कर लिया। वह अहोम वंश का था जिसने अहोम वंश की सत्ता यहां कायम की। अहोम वंश का शासन १८२९ तक बना रहा, जब तक अंग्रेजों ने उन्हे हरा नहीं दिया। कहा जाता है कि अहोम राजाओं के कारण ही इस प्रदेश का नाम असम पड़ा। असम में वे लोग भी आये जिन्होंने वैष्णव धर्म के प्रचार के लिए आये थे l अंग्रेजों द्वारा भारतीय श्रमिकों को भी असम लाया गया, जिन्हें हम टी ट्राइब के नाम के जानते है l साथ ही हुंडियों के निबटारे के लिए उसी समय सेठ-साहूकारों को भी यहाँ बसाया गया l उर्वर माटी ने सुदूर राजस्थान, हरयाणा, मालवा, उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्यत्र स्थानों से लोगों को असम की और आने के लिए आकर्षित किया l यहाँ की आबोहवा लोगों को इतनी रास आई कि यहाँ जो भी आया वह यही बस गया l अथिति देवो भव की परंपरा को यहाँ बड़ी तन्मयता से निभाया जाता है l स्वतंत्रता के बाद से तो बस लोगों का आने का और हमेशा के लिए बसने का यहाँ तांता लग गया l यही से यहाँ समस्याएँ शुरू हो गयी l जनसांख्यिकी में भारी बदलाव देखने को मिल रहें थे l सबसे पहले भाषा आन्दोलन और फिर असम आन्दोलन, दोनों की बस एक मुहीम थी, कि असम से विदेशियों को खदेड़ा जाए l इसके लिए यह जरुरी था कि असम में राष्ट्रिय नागरिक पंजी का नवीनीकरण हो l असम समझोते में भी यह मांग थी, जिसका पालन करने को केंद्र वचनबद्ध था l
राष्ट्रीय नागरिक पंजी के नवीनीकरण से अब लोग परेशान है l भारतीय नागरिक भी और तारों के नीचे से आए लोग भी l भारतीय नागरिक इसलिए परेशान है क्योंकि एक बड़ी तादाद में हिंदी भाषियों और बंगला भाषियों के नाम अंतिम मौसेदे में शामिल नहीं हुए है l अभी तक यह किसी को नहीं पता कि उनके नाम कैसे आयेंगे l कौन सा तरीका अपनाया जायेगे कि उनके नाम फ़ाइनल एन आर सी में अंतर्भुक्त हो जाए l अभी हिंदी भाषी लोगों के संगठनों ने ज्ञापन और गुहार के जरिये अपनी बात केंद्र तक पहुचाई है, जिसके अलावा हिंदी भाषियों के पास और कोई चारा नहीं है l पर एक बात तय है कि इस पंजी में सिर्फ भारतीय नागरिकों के नाम ही शामिल होंगे l जिनके नाम नहीं आयें है, सरकार को उनके नाम शामिल करने की बाध्यता है, क्योंकि वे शत-प्रतिशत भारतीय है l जब पंजी ही भारतीय लोगों की है, तब फिर इसमें भारतीय लोगों के नाम क्यों नहीं आएंगे l यह सवाल यहाँ लोग एक दुसरे से पूछ रहें है l जिन लोगों ने पहले 2015 में पंजीयन फॉर्म नहीं भरें है, उनके लिए भी प्रावधान होने चाहेये l वर्षों से यहाँ रहने वाले भारतीय नागरिकों का मानना है कि उनको भी एक दुबारा चांस दिया जाना चाहेये, जिससे वे भी गर्व से बिना कोई भय के असम में रह सके l कईयों की समस्या यह है कि उनके पास पर्याप्त दस्तावेज नहीं है और अगर है भी तो वे पीछे रह गए, उन लोगों के पास है, जो इस भय में है कि कही दस्तावेज उनके हाथ से निकल नहीं जाए l ऐसे में उनकी हालत घर से बाहर निकाले हुए जैसी हो गयी है l अपनी ही भूमि में अगर कोई व्यक्ति विदेशी कहलाये और उन सभी सुविधाओं का लाभ नहीं ले सके, जो आमतोर पर देशवासियों के लिए उपलब्ध रहती है, तब उसके होने का क्या मतलब ?  
अब इस बात को सभी को समझना होगा कि जिन लोगों के नाम नहीं आये है, और वे 24 मार्च 1971 के बाद असम में चले आए थे, उनके वंशज समेत सभी भारतीय नागरिक। (उन्हें 24 मार्च 1971 को दूसरे किसी हिस्से में रहने का सबूत पेश करना होगा।) अगर इस सूची में किसी का नाम शामिल नहीं है, तो उसे प्रशासनिक, कानूनी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है l अभी उन लोगों को अपने मूल स्थानों से अपने पूर्वजों के नाम पर होने वाले जमीन के कागज, इत्यादि, संग्रह करना होगा, तभी जा कर उनका नाम अंतिम सूची में आ पायेगा l यह कोई बहुत मुश्किल भरा कार्य नहीं है, थोड़ी सी जागरूकता, थोड़ी सी जानकारी, इस कार्य को सहज बना देगी l



Friday, August 3, 2018


राष्ट्रीय नागरिक पंजी के सन्दर्भ में..

इस समय राज्य में एन आर सी को लेकर लोग परशान है l जिनके नाम नहीं है, वे आंतकित है, जिनके परिवार के कुछ सदस्यों के ही नाम है, वे अलग परेशान है, जिनके नाम है, पर अशुद्ध है, उनकों भी कुछ समझ नहीं आ रहा है l जिनके परिवार के सभी सदस्यों के नाम है, उनके लिए ख़ुशी का कारण इसलिए भी नहीं है क्योंकि यह एक अंतिम मसौदा ही है, सम्पूर्ण एन आर सी नहीं है l अंतिम एन आर सी में किस तरह के बदलाव देखने को मिलेंगे, यह कोई कह नहीं सकता l इस एन आर सी के मसौदे के प्रकाशित होने से इस बात इस ख़ुशी सभी को है कि वर्षों से की गयी यह मांग अब पूरी होती दिखाई दे रही है l असम में जाति, भाषा और उपाधि को लेकर पहले से ही कई तरह के दृष्टिकोण है l कई दफा आन्दोलन हो चुकें है l खास करके भाषा को लेकर यहाँ के लोग काफी संवेदनशील है l असम साहित्य सभा जैसी संस्था असमिया को यहाँ के सभी सरकारी कार्यालय में उपयोग करने की मांग वर्षों से कर रही है l इसको असमिया अस्मिता के रूप में देखा जाता रहा है l लगातार प्रवजन होने से यहाँ की जनसांख्यिकी में भारी बदलाव देखने को मिल रहे थे, ऐसे में इस एन आर सी के बहुत बड़े मायने है l अब यह असम की एक हृदयस्थली बन गयी है l चारो और ख़ुशी का वातावरण फ़ैल गया है l जो आशंका जताई जा रही थी, कि कानून व्यवस्था की स्थिति बन सकती है, वह गलत साबित हुई l लोगों ने एक बड़े ह्रदय से एन आर सी के मसौदे का स्वागत किया है l भले ही इसमें लाखों भारतीय लोगों के नाम शामिल नहीं हो पायें है, पर सरकार के आश्वासन पर उनको भरोसा है l लोगों को यह विश्वास है कि उनके नाम अंतिम एन आर सी में जरुर शामिल होंगे l यहाँ एक बात उल्लेख करना अत्यंत जरुरी है कि यह एक भारतीय नागरिकों की पंजी है, जिसमे किसी भी राज्य के लोग हो, अगर वे असम में रहते है, तब उनके नाम इसमें जरुर शामिल किये जायेंगे l यह एक क़ानूनी बाध्यता है, जिसको कोई भी अधिकारी नकार नहीं सकता l नाम शामिल नहीं होने की दिशा में इसको क़ानूनी रूप से चेलेंज भी किया जा सकता है l राष्ट्रीय नागरिक पंजी का इसलिए नवीनीकरण किया गया क्योंकि, बड़ी संख्या में अवेध नागरिक असम में इन वर्षों में प्रवेश कर गए थे l इसमें भारतीय नागरिकों को नहीं शामिल किये जाने की बात की कही भी नहीं है l
चालीस लाख एक बहुत बड़ी संख्या है, जिनको एन आर सी से बाहर रखा गया है l हालाँकि शिकायत और आपति के मौका उन लोगों को मिलेगा, पर यह प्रक्रिया कैसी होगी, इसका आभास अभी किसी को नहीं है l जिन लोगों के नाम तकनिकी कारण से नहीं शामिल हुए है, उनके नाम अवश्य ही शामिल किये जायेंगे, यह तो तय है l यह बात इसलिए कही जा रही है क्योंकि, इतनी बड़ी प्रक्रिया में कई तरह की भूलें रह गयी है, जिनको सुधारना आवाश्यक है l ऐसे लाखों लोग हो सकते है, जो सौ प्रतिशत भारतीय है, जिनके नाम इस मसौदे में शामिल नहीं है और उन्होंने सत्यापन प्रक्रिया को भी पूरी तन्मयता से पूरा किया था, फिर भी उनके नाम एन आर सी के अंतिम मसौदे में शामिल नहीं है l उनके नाम किस तरह से शामिल हो सकेगे यह एक लाक टेक का प्रश्न है l सरकार की तरफ से यह कहा जा रहा है कि छुटे हुए लोगों के नाम एक मानक संचालन प्रक्रिया के तहत सत्यापन करके एन आर सी में डाले जायेंगे l इधर मारवाड़ी सम्मलेन और अन्य सामाजिक संस्थाओं ने भी अपनी तमाम शाखाओं के पदाधिकारियों से कहा है कि वे अपने अपने स्थान के लोगों के नाम डलवाने की प्रक्रिया में लोगों का सहयोग करें l गुवाहाटी पूर्व विधान सभा क्षेत्र के विधायक और गुवाहाटी विकास विभाग एवं शिक्षा मंत्री सिद्धार्थ भट्टाचार्य को पूछे गए एक सवाल पर कहा कि उनके विधायक क्षेत्र में छूट गए भारतीय नागरिकों के नाम डलवाने की प्रक्रिया में उनके मंडल के कार्यकर्ताओं को आम लोगों के सहयोग के लिए लगाया जायेगा, जिससे, किसी भी भारतीय नागरिक को एन आर सी ने नाम डलवाने में कोई असुविधा ना हो l उन्होंने आगे यह भी कहा कि लोगों को अपने नाम शामिल करवाने का पूरा मौका मिलेगा, और किसी को भी आंतकित होने की आवश्यकता नहीं है l
जिनके नाम इस मौसेदे में शामिल नहीं है, वे आगामी 7 तारीख से मिलने वाले क्लेम/आपत्ति और सुधार फॉर्म जरुर भरे, और अपने अधिकार का उपयोग करे l फॉर्म को समझने के लिए http://nrcassam.nic.in/coc.html देखें, और 7 अगस्त के पश्चात मिलने वाले उन फॉर्म को डाउनलोड करके एन आर सी केंद्र में जमा दे सकते है l यह प्रक्रिया 30 अगस्त से 28 सितम्बर तक चलेगी l अभी तक सरकारी सुचना अनुसार ऑनलाइन क्लेम/आपत्ति/सुधार फॉर्म जमा नहीं किया जा सकते l एन आर सी के सन्दर्भ में सामाजिक संगठनों को एक बार फिर आम लोगों की मदद के लिए आगे आना होगा, जिससे उनका विश्वास डगमगाए नहीं, और वे पूरी तन्मयता से इस प्रक्रिया में भाग ले सके l यह भी अभी तय नहीं हुवा है कि जिनके दस्तावेजों को बाहर के राज्यों में भेजा गया था, और सत्यापन हो कर अभी तक वापस नहीं आए है, उनका भविष्य क्या होगा l पर तमाम तरह की अटकलों और विरोधाभासों के बीच यह तो तय है कि इस एन आर सी में भारतीय नागरिकों के सभी नाम जरुर शामिल होंगे और विदेशियों के नाम शत-प्रतिशत काटेंगे l (शेष अगले अंक में)