Friday, April 7, 2017

त्वमेव माता च पिता त्वमेव ...
रवि अजितसरिया
त्वेमेव माता च पिता त्मवेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव, त्वमेव बिद्या द्रविम त्वमेव,
त्वमेव सर्वं मम देव देव l

उपरोक्त श्लोक महाभारत काल का है, पांडव गीता में समाहित है, जिसमे देवी गांधारी श्री कृष्ण के  समक्ष समर्पण करते हुए कहती है कि तुम इस जगत के स्वामी हो, तुम ही हमारे पालनहार हो, और वे इतना कह कर मोक्ष की कामना करती है l कहने को तो यह एक श्लोक है, पर इस श्लोक के मायने अनेक है l यह एक सकारात्मक दृष्टिकोण दर्शाता है l महाभारत काल में जब अर्जुन अपना गांडीव रख देते है, श्री कृष्ण उन्हें अपना विराट रूप दिखाते है, जिसमे सभी देवता का वास होता है l विराट स्वरुप देख कर अर्जुन अपना गांडीव पुनः उठा केर युद्ध करने लगते है l इस श्लोक में यही तथ्य छुपा हुवा है कि श्री कृष्ण, तुम ही सर्व-व्याप्ति हो, तुम ही सेव-सर्वा हो, तुम जो आदेश दोगे, वह पूर्ण रूपेण पालित किया जायेगा l देश की संसद भी सर्वे-सर्वा है, वहां से देश संचालित होता है l देश के इस शासन केंद्र की बनावट इसी तथ्य को ध्यान में रख कर की गयी कि इस संसद में देश के सभी जाति. वर्ण और समुदाय के लोगों का प्रतिनिधित्व हो, जो देश की दशा और दिशा का निर्धारण कर सके l एक पालनहार की तरह यह संसद, लोगों को देखे, और सामाजिक सुरक्षा, रोटी कपडा और मकान जैसी सामान्य सुविधाएँ जनता तक मुहय्या करवाए l देश की संसद एक मजबूत केंद्र है और सर्वोपरि है, ताकतवर है, सभी कानून से उपर है l उसके आदेश की कोई अवेलहना नहीं कर सकता है l इस मायने में देश की संसद में चुने हुए सांसद भी उतने ही ताकतवर हुए, जितनी की संसद l अगर ऐसा नहीं होता तब, अभी हाल में उस्मानाबाद से जीते हुए शिव सेना के एक सांसद रविन्द्र गायकवाड ने एक विमानन अधिकारी को चप्पल से पीटने की हिमाकत नहीं करते l ठीक इसी तरह से तृणमूल कांग्रेस की सांसद डोला सेन ने भी एयर इंडिया के विमान को सीट के आवंटन को लेकर 40 मिनट का रोके रखा, और अपने सांसद होने का रुतबा दिखाया l एक तरह से देश के सांसद आम आदमी से बहुत ऊँचे है, विधाता है l किसी को भी पीट सकते है, कोई कुछ नहीं कर सकता l देश का कानून भी नहीं l भारतीय दंड संहिता की धारा 308 भी रविन्द्र गायकवाड पर लगी हुई है, फिर भी आराम से दिल्ली-मुंबई ट्रेन से, चार्टेड प्लेन से सफ़र कर रहे है l कानून मूक दर्शक की तरह कुछ कर नहीं पा रहा है l देश में आम आदमी के विरुद्ध रोजाना सैकड़ों मामले दर्ज होतें है, और दर्ज होने के कुछ ही घंटों में पुलिस उस आम आदमी को पकड़ने के लिए उसके ठिकाने पर पहुच जाती है l इधर सांसद महोदय के उपर केस लगे हुए आज 15 दिन होने के बावजूद, पुलिस उनके विरुद्ध कुछ नहीं कर सकी, क्योंकि उनको संसद का संरक्षण जो प्राप्त है, ठीक अर्जुन की तरह,  
जिसे श्री कृष्ण का संरक्षण प्राप्त था l भारतीय सांसद को यह छुट प्राप्त है कि उन्हें सत्र शुरू होने के 40 दिनों पहले और समाप्ति के 40 दिनों के बाद तक गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है, और वह भी स्पीकर की अनुमति से l हालाँकि, कुछ प्रतिरोधक कानूनों में सांसदों को जरुर गिरफ्तार किया जा सकता है, पर उसके लिए भी स्पीकर की अनुमति लेनी पड़ती है l सांसदों को यह छुट भले ही प्राप्त होती है, पर कानून से उपर कोई नहीं, और विमान में तो बिलकुल भी नहीं l यह स्पष्ट है कि विमान के अंदर कोई भी, चढ़ते ही उसके ज्यादातर अधिकार विमानन कानूनों के तहत सेवा को संचालित कंपनी के पास स्थानांतरित हो जातें है, जिसके तहत बैठना, उठाना और सामान्य नागरिक व्यवहार की अंचार संहिता लागु हो जाती है l कितनी बड़ी बात है कि एक सांसद, भारतीय सरकार के उपक्रम इंडियन एयरलाइन्स के अधिकारी को सरे आम पीट देता है, और माफ़ी मांगने के बजाय सीना फुलाये वहा से निकल जाता है, जैसे कोई जंग जीत कर सिपाही आता है l क्या कोई आम आदमी इस तरह से एयरपोर्ट से इस तरह से व्यवहार करके निकल सकता है ? बिलकुल नहीं l उसकी एयरपोर्ट के थाने में इतनी पिटाई होगी कि वह दुबारा, बदतमीजी करना भूल जायेगा l पर यहाँ मामला संसद का है, जो सर्वोपरि है, आम आदमी से बहुत ऊँची l उसके सदस्य किसी अवतार से कम नहीं है, जिसको चाहे पीट सकते है, जिसको चाहे अपमानित कर सकते है l कोई कुछ नहीं कर सकता है l ब्रहस्पतिवार को संसद में सांसद महोदय में अपनी सफाई दी और बड़ी शान से कहा कि उसने अपने बचाव में अधिकारी को धक्का दिया, जिसका समर्थन उनकी पार्टी के अन्य सांसदों और कुछ अन्य पार्टी के सांसदों ने भी किया l मनो चप्पल से पिटाई कोई मामला ही नहीं, कोई जुर्म ही नहीं l सांसद के आम जीवन की कोई समान्य एक घटना हो l हद तो तब हो गई, जब सांसद गायकवाड ने उन पर लगी बिमान से सफ़र की रोक को महात्मा गाँधी के उस वाकये से जोड़ा, जब 7 जून, 1893 को महात्मा गाँधी को दक्षिण अफ्रीका में फर्स्ट क्लास में सफ़र करने की वजह से  ट्रेन से धक्का दे कर उतार दिया गया था l भारतीय लोगों ने कठिन संघर्ष के बाद स्वतंत्रता हासिल की है, दक्षिण अफ्रीका के उस वाकये ने महात्मा गाँधी को रंगभेद के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए प्रेरित किया था l उस मानसिकता के खिलाफ लड़ने के लिए खुद को तैयार किया, जहाँ एक ही धरती पर जन्म लेने वालें लोगों के लिए अलग-अलग कानून थे, क्योंकि उनके रंग अलग थे l यहाँ सांसद को विशेषाधिकार जरुर प्राप्त है, पर किसी को अपमानित, किसी की मानहानि के लिए तो बिलकुल भी नहीं l इस तरह से सार्वजनिक रूप से किसी अधिकारी को चप्पल से पिटाई करके ना सिर्फ उन्होंने संसद की गरिमा को ठेस पहुचाई है बल्कि अपने आप को आम आदमी से उपर होने के घमंड और सामंती विचारधारा को भी प्रदशित करने की चेष्टा की है l सांसद गायकवाड़ पर विमान पर चढ़ने की रोक तो हटा ली गयी है, पर इस बात का मलाल सभी को है कि सांसद ने एयर इंडिया के पीटे हुए कर्मचारी से अभी तक माफ़ी नहीं मांगी है, फिर भी राजनेतिक कारण से यह निर्णय सरकार ने लिया है l    

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने आप को देश का प्रधान सेवक कहते है, तब इस दृष्टि से उनके साथ देश की संसद के दोनों सदनों के 795 सदस्य, जन सेवक ही हुए l फिर यह कैसा इतराना l पांच वर्षों बाद फिर उनको लोगों के पास जाना होगा, फिर याचना करनी पड़ेगी, फिर वादे करने होगे, तब आम आदमी अपनी ताकत दिखा देगा l हाल ही संपन्न उत्तर प्रदेश के चुनाव में कुछ इसी तरह के नतीजे देखने को मिले l घमंड में चूर समाजवादी पार्टी को लोगों ने धुल चटा दी l पर बड़ा सवाल यह उठता है कि सांसदों का यह अभद्र व्यवहार देश में कब रुकेगा, कब वे भी आम आदमी से इंसानियत से पेश आयेंगे, जिससे देश की संसद का नाम धूमिल ना हो, देश के नेताओं पर लोग गर्व कर सके l देश के सांसद और नेता, लोगों के मददगार बने, ना कि अपना अधिपत्य स्थापित करने की कौशिश करें l

Friday, March 24, 2017

यह है लक्ष्मी मिष्ठान भण्डार
रवि अजितसरिया

किसी भी शहर की कुछ खासियत, कुछ विशेषताएं होती है, जिनसे वह शहर जाना जाता है l खास करके  फल, मिठाइयाँ और स्मारकों को ले कर ही शहर के नाम याद आतें है l कोलकाता शहर जिस तरह से मिठाइयों के लिए प्रसिद्द है, उसी तरह से गुवाहाटी में एस आर सी बी रोड पर स्थित लक्ष्मी मिष्ठान भण्डार एक जाना पहचाना नाम है, जिसकी प्रसिद्धि समूचे पूर्वोत्तर में है l बात सन 1954-1955 की है, जब यहाँ रामकुमार महाराज के नाम से खाने का बासा(मारवाड़ी भोजनालय) चलता था l यह भोजनालय इसलिए भी प्रसिद्द था, क्योंकि यहाँ पर गावं से आने वालों, जिनको यहाँ पर नौकरी नहीं मिलती थी, उनके लिए निशुल्क भोजन की व्यवस्था थी l यही से लक्ष्मी मिष्ठान भण्डार की स्थापना हुई थी l सन 1995 तक यहाँ चाय और मिठाई ग्राहकों को बैठा कर परोसी जाती थी l स्व. रामकुमार महाराज के पर पोते दिनेश शर्मा बतातें है कि उन दिनों गुवाहाटी का फैंसी बाज़ार एकमात्र बजार ही था, जहाँ बड़ी सुबह से ही नाव और बसों से फैंसी बाज़ार लोग उतरतें थे, और वे सीधे लक्ष्मी मिष्ठान भण्डार की और रुख करतें थे और छक कर पूरी, सब्जी खातें थें l उस ज़माने से ही उनकी दूकान का बड़ा नाम है l अब एल एम बी नाम से प्रसिद्ध यह मिठाई की दूकान आज उच्च स्तर की मिठाइयाँ और नमकीन के लिए जानी जाती है l स्वादिष्ट राजभोग के लिए एल एम् बी का एक नाम है l दिनेश शर्मा बताते है कि कैसे उन दिनों गुवाहाटी शहर में उनके प्रतिष्ठान ने गुवाहाटी में सबसे पहले राजभोग को लोगों के सामने पेश किया था l राजभोग के लिए, आज भी शादियों के समय उनके पास भारी आर्डर रहतें है l उनका प्रतिष्ठान सिर्फ एक मिठाई दुकान ही नहीं थी, बल्कि उनके पिता स्व. मदनलाल मंगलिहरा के समय से ही एक सामाजिक उठ-बैठ, विचार-विमर्श का केंद्र भी था l स्व. मदनलाल मंगलिहरा के मित्रों में स्व.भगवती प्रसाद सराफ, स्व. मुरलीधर सुरेका, स्व.बेनीप्रसाद शर्मा, स्व.जी के जोशी, स्व.विश्वनाथ तिवाड़ी, प्रभुदयाल जालान आदि लोगो थे, जिन्होंने एक अच्छे मित्रों की न सिर्फ भूमिका निभाई, बल्कि लोक-व्यवहार के चरित्र को अपने वार्तालाप के जरिये लाकर, इस प्रतिष्ठान के चार-चाँद लगा दिए l होली के मौके पर ये सभी महानुभाव, जिनमे अधिकतर दिवंगत हो गएँ, उनके प्रतिष्ठान में चंग बजा कर आनंद और भाईचारे का प्रदर्शन किया करतें थें l आज भी दिनेश अपने पिता की मित्र मंडली को याद करके भावुक हो उठते है l सामजिक कार्यकर्ता और दिनेश के पारिवारिक मित्र प्रभुदयाल जालान बताते है कि स्व. मदनलाल मंगलिहरा उनके सहपाठी थे और उन्होंने एक लम्बा समय एक साथ गुजारा है l एल एम् बी की मिठाइयों का जिक्र करतें हुए वे कहते है कि चाहे कितनी भी नई मिठाई की दुकाने खुल जाये, पर एल एम् बी की मिठाइयों की गुणवत्ता के सामने सभी दुकानों की मिठाइयाँ फ़ैल है l  
इनके पांच भाई के परिवार में खुद मदनलाल मंगलिहरा, राधेश्याम, प्रभुदयाल, राजेंद्रप्रसाद और बजरंगलाल ने सभी के साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार किया और लक्ष्मी मिष्ठान भंडार को नयी ऊँचाइयों तक ले गएँ l खास करके त्यौहार के मौके पर एल एम् बी की मिठाइयों की भरी मांग रहती है l वार्ड नंबर 9 के पार्षद राज कुमार तिवाड़ी, जो उनके पड़ोसी रहे है, कहते है कि मलाई घेवर के लिए प्रसिद्ध एल एम् बी अब एक ब्रांड बन चूका है, और अपनी मिठाइयों की गुणवत्ता को संजों कर रखे हुए है l बर्फी, लड्डू, बालूशाही हो या फिर ग्राहक के पसंद की कोई मिठाई ही, खुद दिनेश त्यौहार के मौके पर, खड़े हो कर, सभी आर्डर पूरा करतें है l वे कहतें है कि हो सकता है कि उनकी दूकान का कोई आधुनिक परिवेश नहीं है, कोई सजावट नहीं है, पर गुणमान के मामले में एल एम् बी ने सभी मानदंड उच्चकोटि का बनाये है l उनके पैक किये हुए मिठाइयों के डब्बे, गुणवत्ता की दृष्टि से शुद्ध और ताजी ही बताई जाती है  l इनके यहाँ बीस से भी ज्यादा तरह की मिठाइयाँ हर समय उपलब्ध रहती है l दिनेश शर्मा बतातें है कि गुवाहाटी शहर के पुराने और प्रतिष्ठित गद्दियों और गोलों में हमेशा से ही उनके परिवार के अच्छे सम्बन्ध रहें है, और इसी वजह से शुरू से ही उनके उपर मिठाइयों की गुणवत्ता को लेकर हर समय एक दबाब बना हुवा रहता है, जिससे वे क्वालिटी के मामले में हर समय सगज रहतें है l पकवानों के निर्माण और सामाजिकता के मामले में खरा उतारते हुए दिनेश, रामकुमार महाराज की विरासत को भली-भाँती आगे ले जा रहे है l समय के साथ भले ही ज़माने ने नई करवट ले ली है, पर दिनेश का जरुरतमंदों की मदद करने का जज्बा आज भी जीवित है l पारिवारिक संस्कारों और सामाजिक सरोकारों ने दिनेश को जीवन के मूल्यबोध को समझने में एक बड़ी भूमिका निभाई है l एक भोजनालय से मिठाई दूकान का लम्बा सफ़र आसन नहीं था, कई चुनौतियाँ भी आई, जिनको पार करके, आज लक्ष्मी मिष्ठान भण्डार एल एम् बी के नाम से एक ब्रांड बन गयी है l

बाल साहित्य लेखक भगवती प्रसाद बाजपेयी की मिठाईवाला नामक कहानी की बरबस याद आ जाती है, जिसमे एक मिठाईवाला, बच्चों को लाल, पीली, और हरे रंगों की मीठी गोलियां इतने प्रेम से देता है कि खरीदने वाले की आँखों में आंसू आ जाएँ l प्रेम, सृजन और संवेदनाये, मिठाई के व्यवसाय में उतनी ही जरुरी है, जितनी जलेबी के लिए चाशनी l  

Friday, March 17, 2017

राजनैतिक नारों के बीच दबा एक आम भारतीय
रवि अजितसरिया

इस समय देश के सामने एक नया नारा है, ‘नया भारत’ l अभी कुछ ही दिनों पहले, पांच राज्यों में चुनाव संपन्न हों के पश्चात, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में यह नारा देश को दिया है l देश में रोजाना कुछ नया घट रहा है l चाहे वह राजनीति हो या आम लोगों के सरोकार से जुडी चीजें हो, लगातार हर क्षेत्र में बदलाव देखने को मिल रहें है l मसलन, बेंकिंग सेक्टर में तो भरी तबाही मची हुई है l कुछ भी निश्चित नहीं है l अभी व्हात्सप्प पर एक मेसेज चल रहा है कि 1 अप्रैल से स्टेट बैंक तीन या चार नगद फेरे के बाद लेनदेन के लिए, लेनदेन चार्ज लगाने जा रही है l इससे लोगों में भारी आक्रोश है l एक अन्य मेसेज वायरल हो रहा है कि फलाने दिन बैंक से कोई लेनदेन ना करें, जिससे बैंकों को भारी नुकसान भोगना पड़ेगा, और वह लेनदेन चार्ज नहीं लगाएगा l कहने का र्तात्पर्य एक ही है कि लोग अपने ही पैसे निकालने के लिए फ़ीस क्यों दे l जब 8 नवम्बर को नोटबंदी का फैसला आया, तब पुरे देश में हड़कंप मच गया था, जिससे आम आदमी को कुछ दिनों तक भारी तकलीफ हुई l छोटे गावों और कसबे में लोगों ने भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ा था l पर धीरे-धीरे स्थिति सामान्य हो गयी है l लोगों को प्लास्टिक मनी के प्रयोग के लिए प्रोत्साहन दिया जाने लगा l उनके लिए पुरस्कारों की घोषणा भी की जाने लगी l पर कडवी सच्चाई है कि देश की अभी भी आधी जनसँख्या नगद में लेनदेन करती है l करोड़ों लोगों के पास अभी भी बैंक अकाउंट भी नहीं है l ऐसे में पल्स्टिक मनी का उपयोग, भीम या अन्य पेमेंट गेटवे के सहारे लेनदेन करना आम आदमी के लिए असुविधा का कारण भी बना है l फिर भी आज के दिन नोटबंदी का कोई असर भारत में तो दिखाई नहीं दे रहा है l नए भारत के नारे के साथ भारतीयता या देशप्रेम की भावना प्रबल रूप से उभर कर आई है l प्रधानमंत्री के इस नारे में कुछ नयी बातें निकल कर आयी है, जैसे गरीबों के लिए नए संसाधन बनाने के अलावा, उन्हें भी सभी क्षेत्रों में अवसर प्रदान किये जाए, जिससे वे आने वाले कुछ वर्षों में देश के विकास में भागिदार हो जाये l किसी भी राज्य, समाज या सिर्फ समूह के गतिशील बने रहने के लिए कुछ घोषित या अघोषित नियम बने रहेतें है, या फिर एक अंतिम निर्देशिका पुस्तक रहती है, जिससे राज्य संचालित होता है l भारत में संविधान, वह निर्देशिका है, जिसमे हर तरह के अंतिम निर्देश दिए हुए है l परम्पराओं और रीतियों को भी समाज और कानूनन मान्यता प्राप्त है, जिसका शासन में एक अहम् रोले है l ऐसे दस्तावेज में हर तबके के लिए पर्याप्त जगह बनाई गयी है, जिससे समाज में एक सामंजस्य बना रहे l नए भारत के लिए सपने हर कोई देखता है l पर सवाल यह है कि इस नए भारत में गरीबों के लिए कितना स्थान होगा l क्या सिर्फ सुदर सड़क, बड़े-बड़े मकान और यातातात के नियंत्रण के लिए स्वचालित बत्तियां ही एक नए भारत का द्धवोतक होगा ?  
अभी कुछ दिनों पहले पटरी पर दूकान लगाने वाले दुकानदार को एक पुलिसवाला इसलिए पीट रहा था, क्योंकि उसने पुलिसवाले को हफ्ता नहीं दिया था l क्या नए भारत में इस तरह से रोजगार कर रहें करोड़ों लोगों के लिए कुछ नया होगा, या नया भारत मात्र के चुनावी नारा बन कर रह जायेया ? गौर से देखें, तब पायेंगे कि उत्तर प्रदेश में शासन की निरंकुशता उस समय देखने को मिली, जब चुनाव जीतते ही एक विधायक ने एक पुलिस अधिकारी को धमकी दे डाली, जिसका ओडियों वायरल हो गया था l अभी भी हमारे देश में हजारों वर्ष पहले वाली निरंकुश शासन वाली परंपरा चल रही है, जहाँ ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ वाली कहावत की तर्ज पर साम्राज्य चलता था l जिसमे तानाशाही के लिए पर्याप्त जगह थी l हिटलर, मुसलोनी, फ्रैन्कों जैसे तानाशाह अट्ठारहवीं शताब्दी में ही जन्म लिया था l सामंतवाद की जड़े अभी भी भारत जैसे देश में दिखाई देती है l आज के भारत में भले ही कृषि दासों का अस्त्तिव हमें दिखाई नहीं देता, पर भूमिहीनों के रूप में शोषित जनता हमें हर जगह दिखाई दे जायेगी l नागरिक अधिकारों की अगर बातें करें, तब पाएंगे कि दो जून की रोटी के लिए जुंझ रहें लोगों के लिए ऐसे अधिकार बेमानी है, जो आम जनों के जीने का कोई साधन मुहय्या नहीं करवा सकें l ऐसी दबी हुई, कुचली हुई जनता के लिए नया भारत क्या लेकर आएगा, यह एक लाख टेक का प्रश्न है l जनता के प्रति उत्तरदायी होने वाली सरकार, जब अपनी ही जनता को दो जून की रोटी मुहय्या नहीं करवा सकती, तब संविधान, सरकार, अधिकार और शक्ति जैसे शब्द किसी हिंदी फिल्म के डायलोग जैसे लगते है l लोगों के सेवक बनते फिरते नौकरशाह, लोगों की पहुच से बहुत दूर हो गएँ है l एक प्रजातांत्रिक देश भारत में शासन के सभी अधिकार जनता में निहित है, फिर भी जनता सामंतवाद की शक्तियों के नीचे दबी हुई है l हो सकता है कि एक आजाद देश की सीमाएं सुरक्षित हो, हो सकता है कि यहाँ कानून का राज चलता हो और यह भी हो सकता है कि संविधान ने सभी नागरिकों के लिए सामान अधिकार प्रदत कियें हों, पर बड़ी बात यह है कि धरातल पर वह स्थितियां बिलकुल उलटी दिखाई देती है l यह एक कटु सत्य है कि आप का नौकरशाह आम आदमी को कोई महत्व नहीं देता, उसकी समस्या, उसके रोजगार और उसके सुख-दुःख के लिए कभी चिंतित नहीं रहता l ऐसे में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका, जो एक प्रजातंत्र के तीन मजबूत स्तम्भ है, एक मजबूत देश को तो चल रही है, पर उसके नागरिकों के लिए उचित अवसर उपलब्ध करवाने में कही पिछड़ रही है l ऐसे में नए भारत का स्वप्न कैसे पूरा होगा l ख़ुशी की बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जीतने वाले विधायकों और पार्टी के लोगों को जीत की खुमार से निकल कर जनता के लिए काम करने का निर्देश दिया है l यह तो तय है कि अभी जनत अको एक नई आशा की किरण दिखाई दे रही है l  
 
विकास में लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने की लिए प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने अपनी साईट और मोबइल एप्प डेवेलोप किये है, ट्विटर और फेसबुक के जरिये लोगों से संवाद स्थापित किये है, जहाँ आम लोगो भी अपनी आवाज प्रखर कर सकते है l

देश के युवाओं के लिए रोजगार के नए साधन, स्किल डेवलपमेंट और सामाजिक सुरक्षा आधारित नीतियाँ ही आगामी दिनों की लोगों की नई मांग है l ग्रामीण भारत को मजबूती प्रदान किये जाने से, गावों से शहरों की तरफ पलायन अगर कम होता है, तब सही मायने में भारत के लोगों की उन्नति हो सकेगी l फिर चाहे वह नया भारत का नारा हो या फिर सबका साथ सबका विकास का नारा हो l कोई फर्क नहीं पड़ता l            

Friday, March 10, 2017

रंगों में प्यार होता है, बड़ी ताकत होती है
रवि अजितसरिया


पूरा देश इस वक्त, होली के रंगों से सराबोर है l सन 2017 की होली, इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गई है, क्योंकि देश भर में पांच राज्यों में चुनाव हाल ही में, जो संपन्न हुए है l होली के अवसर पर क्या- बच्चे, क्या बूढ़े, सभी एक दुसरे पर रंग लगा कर खुशियों का इजहार करतें है l बसंत पंचमी के आगमन से ही शुरू होने वाले इस त्यौहार को मानाने के पीछे धार्मिक मान्यता तो है ही. साथ ही मनोरंजन, हर्ष, उल्लास के साथ एक सामाजिक सरोकार भी छिपा रहता है l यही एक त्यौहार है, जो अकेले नहीं मनाया जा सकता है l इसके लिए एक दल की जरुरत होती है l ऐसा माना जाता है कि रंगों में बड़ी ताकत होती है, वह आपस की कटुता, बेमन्स्यता को समाप्त कर देते है l रंगों में होती है, प्यार को बोली l गुवाहाटी में होली अपनी तरह की एक अलग होली होती है l सामाजिक सरोकार का रंग यहाँ जम कर दिखाई देता है l गुवाहाटी में हमेशा से ही परम्परागत होली ही वर्षों से मनाई जाती रही थी, जब तक की आधुनिकता ने उस परंपरा में सेंध नहीं लगा दी l अब गुवाहाटी में आधुनिक होली के रंग देखें जा सकते है, जहाँ एक और परंपरा है तो दूसरी और नवयुवकों के लिए रैन डांस जैसे नयें उपक्रम भी है l इस मिलेजुलें रंग को गुवाहाटी वासी आनंद के साथ ले कर रहें है l
माघ माह के सरकते ही, मौसम में अजीब सी सरसराहट सी आने लगती है l इस सरसराहट की  पदचाप उस वक्त तेज हो जाती है, जब फागुन माह में तेज हवा मौसम को असहनीय बना देती है l हवा में अजीब सी मादकता भर जाती है l चारों और का माहोल धुल भरा होने के चलतें, यह स्पष्ट संकेत लोगों को मिलता है, कि होली का त्यौहार करीब ही है l महिलाएं होली के पन्द्रह दिनों पहले से ही गोबर के कंडे बनाना शुरू कर देती है, जिसे होलिका दहन में होलिका माता की पूजा अर्चना करके जलाया जाता हैl  प्रतीक रूप से यह भी माना जता है कि प्रह्लाद का अर्थ आनन्द होता है। वैर और उत्पीड़न की प्रतीक होलिका, जलती है और प्रेम तथा उल्लास का प्रतीक प्रह्लाद (आनंद) अक्षुण्ण रहता है। महिलाएं ठंडाई, मिठाई अन्य पकवान बना कर, होली महोत्सव को खाज और नाच का एक मनमोहक त्यौहार बना देती है. परिवार के बड़े-बुजुर्गों से आशीर्वाद लेती है l होली के त्यौहार के पालन के लिए, प्रवासियों के एक बड़ी तादाद अपने मूल प्रदेश को लौट जाते है, और परिवार के बीच होली मानते है l गीत और संगीत का यह पर्व प्रकृति के उत्कर्ष को अंगीकार करते हुवे लोगों को भाईचारे का सन्देश देती है l इसी मादकता के बीच, होली के मनमोहक गीतों की बहार लेकर कुछ मनचले निकल पड़ते है l गुवाहाटी में होली के गीतों को लोगों तक पहुँचाने का श्रेय उन कलाकारों एवं सीडी वितरकों को जाता है, जिन्होंने बड़े जतन करकें स्थानीय कलाकारों के साथ घंटों नींद खराब की और नए नए गीत लोगो तक पहुचाएं है l जारी..2
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रंगों का त्यौहार होली न सिर्फ एक पर्व है, बल्कि मनुष्यों के लिए एक आनंददायक,प्रेरणादायक और उत्साह का पर्व है, जहाँ मनुष्य अपने गम और पीड़ा को भूल कर एकता और मिलन के स्पष्ट सन्देश देता है ll इसका जीता जाता उदहारण हमें गुवाहाटी में दिखाई देता है l यहाँ भारतीय संस्कृति की अमिट छाप बनती है, होली के अवसर पर, जब भिन्न-भिन्न जाति और इकाइयों के लोग एक साथ होली खेलते है l यहाँ होलिका दहन का सफलतापूर्वक आयोजन श्री पंचायती ठाकुरबाड़ी जैसी प्राचीन संस्था करती है l   
गुवाहाटी में गोठ और सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन हर वर्ष होतें है l लगभग हर संस्था और समाज का लोग अपने स्तर पर कार्यक्रम आयोजन करतें है, जिसमे समाज के लोगों की तो भागीदारी होती ही है, इत्तर समाज के लोग भी उसमे सिरकत करते है, जो आपसी प्रेम और एकता का सन्देश देती है l यूँ तो चंग और फाग के कार्यक्रम कई जगह होतें है, पर अग्रवाल सम्मलेन और मारवाड़ी सम्मलेन के बड़े सार्वजनिक कार्यक्रमों हर वर्ष आयोजित होतें है, जिसमे हजारों की संख्या में लोग भाग लेतें है l फैसी बाज़ार में तीन जगह पर बड़े कार्यक्रम आयोजित किये जातें है l शनि मंदिर के सामने फ्रेंड्स क्लब  द्वारा, यूनियन बेंक के नीचे होली टोली द्वारा और चाय-गली में एसआरसीबी रोड के वासिंदों द्वारा l होली टोली और फ्रेंड्स क्लब के कार्यक्रमों में बड़ी संख्यां में महिलाओं और बच्चो की मौजूदगी इस बात का प्रमाण है कि कार्यक्रम पारंपरिक दृष्टिकोण से ही आयोजित किये जातें रहें है l इधर होली टोली, जो करीब होली के दस दिनों पहले से ही चायगली में होली के गीतों से माहोल को होलीमय कर देती है l इनके सदस्य मंच पर पारंपरिक वेश-भूषा पहने, ढोल और चंग बजा कर एक पारंपरिक कार्यक्रम पेश करतें है l वही एक गोल घेरे में आम जन नृत्य कर कार्यक्रम का भरपूर आनंद लेतें है l इस पुरे आयोजन में एक बात महत्वपूर्ण है कि लोग अपने परिवाद के साथ बैठ कर होली के मनभावन गीतों का आनंद लेतें है l होली टोली और फ्रेंड्स क्लब के कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए पुरे गुवाहाटी से लोग हर वर्ष आते है l फैंसी बाज़ार की होली, पुरे भारत में प्रसिद्द है, इसकी चर्चा जरुर होती है, जिसके पीछे यह कारण है कि इस उत्सव का आयोजन एक सामाजिक और पारिवारिक आयोजन जैसा होना, जिसमे समाज के हर परिवार का भाग लेना l होली महज एक रंगों का त्यौहार नहीं है, बल्कि आपसी भाईचारे और सोहाद्र का प्रतिक है, जिसमे हर तबके के लोग शामिल होतें है l   
 


Friday, February 24, 2017

सीख और साख भी दो जरुरी चीजें है
रवि अजितसरिया

किसी भी क्षेत्र में गुणीजनों की सीख, व्यक्ति को अपने डगर से डिगने नहीं देती l यह एक शाश्वत नियम है l जब महाभारत में अर्जुन अपना गांडीव रख देते है, और युद्ध करने से इनकार कर देते है, तब भगवान कृष्ण ने उनको भगवत गीता की सीख देते है, और फिर आगे क्या हुवा, यह हम सभी को पता है l जीवन के गूढ़ रहस्यों के बारे में जानना ही सीख है l बड़े बुजुर्गों द्वारा दी गयी सीख, जीवन में बहुत काम आती है l भारत में अब तक जितने भी गुणीजन, महान लोग पैदा हुए, उन्होंने जीवन के गूढ़ रहस्यों को कठिन साधना के द्वारा जाना और फिर लोगों तक पहुचायां l उनकी सीख से भारत को संस्कार और संस्कृति मिली, जिससे उसने एक आतंरिक शक्ति अर्जित की, जिससे कठिन से कठिन समय में भी देश टिका रहा, उसके लोग, उसकी सोच, दोनों टिके रहें l उसके धर्म, संस्कृति, और इतिहास के तत्वों को आधुनिकता का तड़का दे कर, अब यहाँ के लोग भारत को विश्व पटल पर एक नया भारत बनाने को आतुर है l यही इसकी सीख है, यही इसकी साख है l व्यापार में भी सीख बड़े काम की चीज है l बड़े अपने बच्चों को सीख देतें है, और बच्चें बड़े हो कर अपने बच्चों को वही सीख देतें है l यह सिलसिला चलता रहता है, और व्यापार भी l एक राजस्थानी कथा है, जिसमे एक सेठ मरते वक्त अपने बच्चों को व्यापार की अंतिम सीख देता है कि ‘छावं-छावं जाना और छावं-छावं आना’ l बच्चों ने सेठ की सीख का आदर करतें हुए, अपने घर से दूकान तक के रास्तों पर छावं की व्यवस्था कर दी l नोकर-चाकर हाथों में छातें लेकर चलने लगें l इसका नतीजा यह निकला कि सेठ के बच्चें हंसी के पात्र बन गएँ l उनको यह समझ नहीं आ रहा था कि उन्होंने ने तो अपने पिता की सीख की अक्षरश माना है, फिर भी वे हंसी के पात्र क्यों बन रहें है l जब इसका निदान खोजने, वे किसी ज्ञानी के पास पहुंचे, तब उनको पता चला कि उनके पिता के सीख का आशय यह था कि बड़ी सुबह जब सूरज नहीं निकले, तब दूकान जाना और शाम को जब सूरज डूब जाए, तब वापिस आना l व्यापार की इस महत्वपूर्ण सीख को देश के करोड़ों व्यापारियों ने अपने जहन में उतार ली है, और सफलतापूर्वक व्यापार कर रहें है l व्यापार एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमे सफलता के लिए पूरी एकाग्रता, इमानदारी, सतता और समय की अनुशासनता उतनी ही जरुरी है, जितनी कड़क चाय के लिए चाय को ज्यादा समय तक पर्याप्त मात्रा में पत्ती डाल कर पकाना जरुरी है l असम के कौने-कौने क्षेत्रों में व्यापार कर रहें लोग बड़ी सुबह से ही व्यापार वाणिज्य का कार्यों में उतर जातें है, और दिन भर कर्म करतें है, एकाग्रता का प्रदर्शन करतें है l असम के विभिन्न शहरों में स्वतंत्रता के पश्चात खुले ‘गोले’, इस बात के गवाह है कि व्यापार में छावं-छावं जाना और छावं-छावं वापस आना के नियम को कितनी दृढ़ता से अपनाया है l गोलों का एक शहर गोलाघाट का नाम ही व्यापारिक गोलों पर पड़ गया l  
एक अन्य कहावत है कि अच्छी सीख को अमल में लाने से साख बनती है l साख को क़ानूनी रूप में मान्यता प्राप्त है और अंग्रेजी में उसे ‘गुडविल’ कहते है l क़ानूनी तौर पर साख की एक अलग कीमत है l साख शब्द का इस्तेमाल, उस समय किया जाता है, जब किसी व्यक्ति की शुद्ध परिसंपत्तियों के परे कुछ बुद्धिमत्तापूर्ण मान का आंकलन किया जाता है l यही यह उस फर्म की साख, जिसके बल पर एक व्यापारी व्यापारिक खरीदारी करता है, जिसके बल पर उसे माल उधारी मिल जाती है l किसी भी व्यापारिक घराने की साख यूँ ही नहीं बन जाती, वर्षों तक कड़ी मेहनत और इमानदारी से व्यापार के वह साख बनाई जाती है l व्यापारिक साख और निजी साख के बल पर अभी भी भारत में कई ऐसे कार्य अल्पसमय में निपटाएं जातें है, जिनको उपलब्द्ध चेनलों द्वरा अगर किये जाये, तब महीनों लग सकतें है l सामाजिक कार्यों में साख की बड़ी कीमत होती है, जिसे व्यक्ति एक बड़ी मुश्किलों से हासिल करता है l असम में व्यापारियों को कोई कितनी ही गालियाँ दे, लेकिन जब मुसीबत आती है, तब व्यापरियों की साख ही काम आती है l उनके एक फोन से देश के अन्य भागों में पैसे का लेनदेन और अन्य कार्य निपटाएं जातें है l  अच्छी सीख अपना लेने से साख बनाने में कोई समय नहीं लगता l बस शर्त एक ही है कि व्यक्ति उस सीख का पालन ईमानदारी से पालन करे l ब्रिटिश के समय से ही बने हुए गोलों की साख आज भी कायम है, जिसकी वजह से असम में व्यापार, वाणिज्य का विस्तार जल्दी हो सका है l
किसी भी जाति, सम्प्रदाय और जन गोष्ठी के लिए यह एक अहम् मुद्दा रहता है कि वह अपने अस्तितिव की रक्षा कैसे करें, अपनी जीविका को कैसे चलाये l इस पूरी कवायद में यह बात निकल कर आती है कि अमुक जाति का स्वाभाव, चरित्र और वृत्ति क्या है l उसी वृत्ति के आधार पर ही वह अपने रास्तें चुनती है l सीख लेने और साख कमाने के लिए हर जाति और सम्प्रदाय के पास सामान अवसर रहतें है l बस जरुरी है कि उस जाति के लोग सही समय में उस अवसर को पकड़ सकें, और अपनी एक पहचान बन सकें l इस सत्यता से भी कोई नकार नहीं सकता कि हर जाति और समुदाय के पास अपने गुण और साख रहती है, जिसे वह वर्षों तक प्रदर्शित करती रहती है l यह साख वह कड़ी मेहनत, एक चित और लगन से वर्षों तक एक ही कार्य करके हासिल करती है l हम उन्हें सफल मानते है l पूरी दुनिया उनकी बुद्धि, ताकत, सम्पति और प्रभाव का लोहा मानती है l मगर यह सफलता उसे कितनी चुनौतियों को पार करने से हुई है, इस बात को भी समझने की जरुरत होती है l एक स्तर आने के पश्चात व्यक्ति इस बात की चिंता में लग जाता है कि उसकी साख पर बट्टा नहीं लगा जाये, अपनी समस्त उर्जा, उसको बचाने में लगाने लगता है l इस नियम से सभी वाकिफ है कि साख एक बार बिगड़ जाये, तब लाख खर्च करने पर भी दुबारा बनाने में समय लगता है l  

साख सफलता का ही एक रूप है, कोई आमिर नहीं, कोई गरीब नहीं, कोई ऊँचा नहीं, कोई नीचा नहीं..साख तो बस साख है, जबान की कीमत..भाव-भंगिमा की उत्कृष्टता..और महाबाहु ब्रह्मपुत्र की तरह बहाना l        

Saturday, February 18, 2017

माँ माटी और मानुष
रवि अजितसरिया

सन 2000 में पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने स्वास्थ कारण से मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था, तब ममता बनर्जी माँ, माटी और मानुष के नारे के साथ एक नायिका बन कर उदय हुई थी, और यह नारा तेजी से उस समय उभरा जब पश्चिम बंगाल सरकार ने सिंगुर में टाटा के लिए जबदस्ती जमीन अधिग्रहण करनी शुरू कर दी थी l ममता बनर्जी ने उग्र आन्दोलन करके, समूचे बंगाल में माँ, माटी, मानुष का नारा लोगों को दे दिया, जिससे सन 2011 के विधान सभा चुनाव में 34 वर्षों पुरानी वाम दलों की सरकार के शासन का अंत हो गया और ममता बनर्जी, तृणमूल कोंग्रेस पार्टी से राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री बनी l माँ, माटी और मानुष के नारे ने मानता बनर्जी को भारी कामयाबी दिलवाई l जब उच्चतम न्यायलय ने उनकी पिछले दस वर्षों की सिंगुर जमीन अधिग्रहण की लडाई में उनके पक्ष में फैसला सुना दिया, और किसानों को लगभग 1000 एकड़ जमीन वापस देने का फैसला दिया, तब वे पश्चिम बंगाल और पुरे देश में उनका कद एकाएक बड़ा हो गया l उनके इस नारे की अहमियत लोगों को समझ में आ गयी l आज भी कोलकाता की गलियों में होने वाली राजनैतिक रेलियों में इस नारे की गूंज सुनाई देती है l राजनैतिक नारों की पहले भी अहमियत थी और आज भी है l किसी भी आन्दोलन में नारों का प्रभाव इतना अधिक है कि सोयें हुए लोग भी एकाएक जाग कर नारे लगाने लागतें है l मातृभूमि और माँ के साथ किये गए जयघोष के नारें, अभी तक प्रभाव डाल रहें है l कालिदास, गाँधी, हिटलर, मुसोलोनी, स्टेलिन और नीत्से जैसे लोगों के पास भी लोगों को देने के लिए बहुत कुछ था l दृढ शक्ति और दृढ कल्पना, जिसके बलबूते पर वे समूचे विश्व पर राज करने की असीम क्षमता बटोरतें थे l ममता बनर्जी और प्रफुल्ल महंत में यही एक समानता है, जिन्होंने सडक पर संघर्ष करके राज्य की सत्ता हासिल की है l मार्टिन लूथर किंग(जू) का एतिहासिक भाषण ‘मेरा भी एक सपना है’ अमेरिका के इतिहास में मानव अधिकार के पक्ष में अनुकरणीय भाषण है, जिसे हमेशा याद किया जाता है l जब सन 2008 में अमेरिका के पहले अफ्रीकन-अमेरिकन राष्ट्रपति बराक ओबामा चुन कर आये, तब उन्होंने अपने पहले भाषण में एक स्लोगन दिया ’यस वी केन’(हम कर सकते है) l अमेरिका में रंगभेदी लड़ाई का यह पटाक्षेप था, जब एक अफ्रीकी मूल के व्यक्ति को विश्व के सबसे ताकतवर राष्ट्र का राष्ट्रपति बनाया गया l यह बेहद अप्रत्याशित था l वर्षों से काले और गोरे लोगों में चल रहे संघर्ष ने अमेरिका सहित कई अन्य देशों में मानव अधिकार के उपर जब चर्चा तेज हो गयी, तब ऐसे समय में अमेरिका को एक कला व्यक्ति राष्ट्रपति के रूप में मिला, जिसका असर पुरे विश्व पर पड़ा l ‘जय जवान जय किसान’ के लाल बहादुर शास्त्री के नारे से सन 1967 में कांग्रेस की दुबारा सत्ता में वापसी हुई l  
खाद्य संकट को देखते हुए, किसानों को, देश के लिए अधिक खाद्य उपजाने के लिए लाल बहादुर शस्त्री का यह आह्वान था, जब तक वे प्रधानमंत्री पद पर थे l जय प्रकाश नारायण और लोहिया के दिनों में आपातकाल के समय में, लोकनायक ने रामधारी सिंह दिनकर की प्रसिद्ध कविता ‘सिंहासन खली करो कि जनता आती है’’ का पाठ दिल्ली के रामलीला मैदान की एक जन सभा में किया था, जिसका इतना असर हुवा कि आज तक भारत की जनता इस कविता और उसके एतिहासिक पाठ को याद कर रही है l स्वंत्रता के पहले भी भारतीय नेताओं और स्वतंत्रता संग्रामियों ने बड़े-बड़े नारे लोगों को दिए थे l सुभाष चन्द्र बोसे के ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा, बाल गंगाधर तिलक का नारा ‘स्वराज मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है’, आज बच्चा बच्चा जनता है l छह वर्षों तक चले असम आन्दोलन के दौरान मातृभूमि से सम्बद्ध नारों की भरमार रही l ज्योति प्रसाद अगरवाला के विप्लवी गीतों के साथ आन्दोलनकारी अपना आन्दोलन शुरू करतें थे l बांग्लादेश की आज़ादी के पश्चात तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने एक बार कहा था कि ‘इंडिया इज इंदिरा’ और इंदिरा इस इंडिया l इसी तरह से इंदिरा गाँधी ने भी ‘गरीबी हटाओं’ का नारा देश को दिया, और वे बहुत लोकप्रिय हुई थी l जब सन 1996 में भारतीय जनता पार्टी की तेरह दिनों की सरकार थी, तब यह नारा चुनाव के समय उभरा था कि ‘बारी बारी सबकी बारी, अबकी बारी अटल बिहारी’ l हालांकि सन 2014 में नरेंद्र मोदी के लिए भी कुछ इसी तरह का नारा लगा था, ‘इस बार मोदी सरकार ‘ l इस समय असम के मुख्यमंत्री ने ‘जाति, माटी और भेटी’ का नारा, असम के लोगों को दिया है l जाति(देश)माटी(जमीन)भेटी(मकान एवं संसाधन) का नारा असम आन्दोलन से जुड़ा हुवा है l जब सन 1979 में विदेश बहिष्कार के नारे के साथ असम में एक बड़ा छात्र आन्दोलन शुरू हुवा था, तब उस आन्दोलन का मकसद यही था कि असम के लोगों को विदेशी अनुप्रवेश्कारियों से बचाया जाये, जो असम के सामाजिक जीवन में प्रवेश करके, असम की सांख्यकी को बदल कर रख दे रही थी l असम के लोगों को संविधानिक अधिकार दिलाने के उद्देश्य से शुरू किये आन्दोलन के कई रूप असम के लोगों ने देखें, जिसका नतीजा यह हुवा कि सन 1985 में छात्र नेताओं द्वरा गठित की हुई राजनैतिक पार्टी अगप सत्ता में आ गई l इसी तरह से माटी की सुरक्षा के लिए जब जब भी आन्दोलन हुए, वे सफल रहें है l मिजोराम और असम इसके जीते जागते उदहारण है l पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी एक जन आन्दोलनकारी नेता थी, जिसने आम लोगों को अपने साथ हमेशा रखा, जिसकी बदोलत वह एक चहेती नेता के रूप में स्वीकारी गयी l इस समय कोलकाता के हवाई अड्डे से हावड़ा रेल स्टेशन के रस्ते को इस तरह से सजाया गया है कि ऐसा लगता है कि कोई विकसित देश में चल रहें है l रंग-बिरंगी लाइटों से रास्तों और फ्ल्योवेरों को योजना बढ तरीके से सजाया गया है l असम की भाजपा सरकार से भी लोगों की बहुत अपेक्षाएं है, जिसने जाति,माटी, भेटी का नारा लोगों को दिया है l लोकतंत्र में, सत्ता सरकार तक रहने वाली चीज नहीं है, लोगों की उसमे भागीदारी, प्रभाव और अभिब्यक्ति उतनी ही जरुरी है जितनी दूध में शक्कर जरुरी है l इस समय लोगों के नजरे सत्ता संतुलन पर है, जिससे यह पता लग सके कि सत्ता का व्यवहार कैसा रहेगा l लोकतंत्र का असली मतलब तभी निकल कर आयेगा l तब तक लोगों को प्रभावित करने वालें नारों को उपज हर युग में यूँ ही होती रहेगी l            

Thursday, February 2, 2017

साईं इतना दीजिये, जामे कुटुंब समाय,मैं भी भूखा न रहूँ, साधू भी भूखा न जाये
रवि अजितसरिया

बुधवार को देश का बजट पेश करते हुए, वित्त मंत्री ने कहा जब देश के अधिकतर लोग आयकर नहीं देतें, तब आयकर नहीं देने वालें लोगों का भार, सच्चे और ईमानदारी से कर देने वालों पर पड़ता है l उनका इशारा देश के 2.71 करोड़ लोगों की और था, जो इमानदारी से आयकर दे रहें है l सरकार द्वारा यह एक बड़ी स्वीकारोक्ति है l यह बात गौर करने लायक है कि देश की कुल जनसँख्या का 2.24 प्रतिशत लोग ही आयकर देतें है l विमुद्रीकरण के पश्चात, इस बात पर गहरा बवाल मचा और चर्चा भी हुई कि इतने बड़े देश में सिर्फ सवा दो प्रतिशत लोग ही आयकर देते है, जिन पर इस समय नोटिसों और चैकिंग की तलवार लटकी हुई है l वित्त मंत्री के भाषण के पश्चात अब यह स्पष्ट हो गया है कि सरकार की निगाह अब इस और गयी है l कर दाताओं का मानना है कि सरकार की तरफ से उनको पुरस्कृत किया जाना चाहिये, और उनको अलग से सुविधाएँ दी जानी चाहिये, जिससे अन्य लोग भी कर देने की और आकर्षित हो l पर ऐसा आज तक भारत के इतिहास में नहीं हुवा है l चाहे वह राज्य का कर हो या फिर केंद्रीय कर हो, कर दाताओं को हमेशा से संदेह भरी नजरों से देखा जाता है l उन पर तरह तरह की तोहमत लगाईं जाती है, प्रताड़ित किया जाता है l कर दाताओं का मानना है कि विमुद्रीकरण के समय देश के करदाताओं ने खुले हाथों से योजना का समर्थन किया था, जिसका नतीजा यह निकला कि उन पर जमा और निकासी के नाम पर नोटिसों की बोछार लगा दी गयी l अब, जब देश के कई राज्यों में चनाव है, और भारतीय जनता पार्टी को यह लगने लगा है कि छोटे और माध्यम श्रेणी के व्यापारी, जो भजपा का वोट बैंक है, बिखर रहें है, वित्त मंत्री उनके लिए महरम लेकर आयें है, उनको पुचकार रहें है l वे यह भी कह रहे है कि सरकार अब लोगों के पैसे का संरक्षक बनेगी, जिससे देश का पैसा चलत में रहेगा, जिससे बेहद कम कीमत पर उधारी दी जा सकेगी l अब सवाल यह उठ रहा है कि जो लोग सरकार पर विश्वास करके कर देने कोई संकोच नहीं करते, उनको वापसी में क्या मिल रहा है l किस तरह से उनको लाभान्वित किया जा रहा है l सरकारी महकमा तो ऐसी कोई कृतज्ञता जाहिर नहीं कर रहा, बल्कि बाबुओ का रवय्या कर दाताओं के प्रति हमेशा से ही नकारात्मक और आक्रामक ही रहा है, चाहे किसी भी विभाग का हो l जो इमानदारी से विक्री कर और आय कर देतें है, उनके लिए जिंदगी की सच्चाई यह है कि वें तमाम तरह की कर प्रावधानों के चक्कर में फंस कर अपनी जिंदगी को नरक बना लेतें है l इधर देश की 97 प्रतिशत जनसँख्या, जो कर नहीं देती, बड़े आराम से अपना जीवन व्यतित कर रही है l हाथों में झंडा लिए, राजनैतिक पार्टियों के लिए रैलियाँ निकलना, धरना और प्रदर्शन देना, जिससे ऐसा लगे की देश के लोग उस पार्टी के साथ है, जो उनका भला कर रही है l तीन रुपये चावल, चद्दर, कम्बल और सूत का मुफ्त वितरण, क्या यही चरित्र रह गया है,


राजनैतिक पार्टियों का l कब तक देश ‘कल्याण’ की तर्ज पर इमानदार देश वासियों की मेहनत का पैसा यु ही लुटता रहेगा l  बाकी तीन प्रतिशत जनता उनका बोझ जो उठा रही है l देश में इतना ज्ञान, इतना धर्म, इतने उपदेश, फिर भी कर दाताओं की संख्या बढ़ नहीं रही l कही कर नहीं देने वालों में ज्यादतर राजनैतिक पार्टी का वोट बैंक तो नहीं जुड़ा हुवा है, जिसको छेड़ने की हिम्मत किसी भी पार्टी में दिखाई नहीं दे रहा है l किस तरह के रूपांतरण की बात हम कर रहें है, जहाँ इतनी असमानताएं व्याप्त है, आय और विकास के मामलें में l किस तरह का आकलन सरकार कर रही है, जिसमे गावों के विकास का नक्शा, हर वर्ष तैयार होता है, पर गावं का विकास नहीं होता l वे वैसे एके वैसे ही बने रहतें है l कही करोड़ो रूपये, जो सरकार को कर के रूप में मिल रहें है, वे कर्मचारियों के वेतन मद में खर्च तो नहीं हो रहें l सवाल कई है, जिनका जबाब आम आदमी खोज रहा है l जो जनप्रतिनिधि चुन कर जातें है, उनका वेतन और सुविधाए मिलती है, वह आखिर लोगों द्वारा दिए कर के बनिस्पत ही तो है l फिर देश के कर दाताओं को अपने द्वरा दिए गएँ कर का हिसाब मांगने का पुरे हक़ है l कर उगाही के लिए एक बड़ा सिस्टम इस समय देश में कार्य कर रहा है l क्या अमीर देशवासी, जो आयकर प्रणाली से बाहर है, उनको देश के विकास कार्य में योगदान स्वरुप सम्मिलित नहीं किया जा सकता l पर बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे l गौरतलब है कि देश में इस वक्त करीब 30 करोड़ के करीब पेन कार्ड होल्डर है l इनमे से करीब 3 करोड़ लोग ही आयकर देतें है l इस समय देश एक विचित्र स्थिति से गुजर रहा है, विमुद्रीकरण के असर अभी भी साफ़ दिखाई दे रहा है l लोगों के जीवन की गुणवत्ता में कोई खास असर दिखाई नहीं दे रहा l इंस्पेक्टर राज अभी भी जारी है l ऐसे में आधी-अधूरी विकसित अर्थव्यस्था में संस्कार, नैतिकता और धर्म की बातें करना बेमानी है l जो लोग इंस्पेक्टर राज के दंस को भोग रहें है, उनसे कोई पूछे कि क्या विमुद्रीकरण के पश्चात देश में कुछ नया हुवा है l सभी समीकरण इतनी मजबूती से बने हुए है कि इनको तोड़ना बहुत मुश्किल हो गया है l फिर भी आम धरना यही है कि देश तकनिकी रूप से प्रगति करें, जिसमे मानवता के विशाल कणों के भण्डार रहे, मानव हस्तक्षेप कम हो, जिससे व्यापार, पूंजी, उत्पादन और वितरण जैसे महत्वपूर्ण कार्य में सभी सम्मिलित हो सकें l परिवार, परंपरा, संस्कार और संकृति से कोई वंचित ना हो, जिससे देश की विशिष्टा बनी रहे, देश प्रेम बना रहे l देश में कोई भूखा न रहें l         

Friday, January 13, 2017

रूपकुंवर ज्योति प्रसाद अगरवाला की आलोक यात्रा
रवि अजितसरिया


असमिया भाषा संस्कृति की नीवं रखने वाले रूपकुंवर ज्योति प्रसाद अगरवाला, एक युग पुरुष के रूप में परिणित हो कर आज असमिया जनमानस में एक पूजनीय व्यक्ति है l असम के उन श्रेष्ठ असमिया में उनका शुमार होता है, जिन्होंने असमिया भाषा, संगीत और संस्कृति के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान दिया है l आगामी 17 जनवरी को उनकी पुन्य तिथि है, जिसको असमवासी शिल्पी दिवस के रूप में मानतें है l  प्रसिद्ध साहित्यकार और यात्रा वृतांत लेखक सांवरमल सांगनेरिया ने उन पर गहरा शोध करके हिंदी भाषा में एक पुस्तक ‘ज्योति की अलोक यात्रा’ लिखी है, जहाँ उन्होंने लिखा कि दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं के मूर्धन्य कवियों की रचनाओं का हिंदी अनुवाद हो कर पूरा राष्ट्र उनके बारे में जान चूका है, पर असम के इस महापुरुष के बारे में भारतवर्ष में कही भी चर्चा नहीं है l उनका इशारा बंगला कवि रविन्द्र नाथ ठाकुर की और था, जिन्होंने बंगला साहित्य में अभूतपूर्व योगदान दिया और साहित्य में नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया l गीतांजलि नमक काव्य प्रस्तुति के साथ, कई बंगला साहित्यकारों की कृतियों का हिंदी और कई भाषाओँ में अनुदित हुवा है, जिसका यह नतीजा हुवा है कि बंगला साहित्य और उसके जीवनप्राण का बखान आज चहुँ और है l यह बात असम पर लागू नहीं होती l पंद्रहवीं सदी के वैष्णव धर्म के संत शंकरदेव के बारे में भी भारतवर्ष में ज्यादातर लोगों को नहीं पता है l इसी बात का मलाल अनुवादक और साहित्यकार देवी प्रसाद बागड़ोदिया को भी है, जिन्होंने ज्योति प्रसाद अगरवाला के गीत, कविता, निबंध और नाटकों को हिंदी में अनुवाद कर हिंदी भाषी लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया है l एक अन्य अनुवादक और हिंदी सेंटिनल के संपादक दिनकर कुमार ने भी ज्योति प्रसाद अगर्वला की जीवनी पर पर एक हिंदी पुस्तक रूपकुंवर नामक प्रकाशित की है l अभी कुछ वर्षों पहले सांवरमल सांगनेरिया ने श्रीमंत शंकरदेव पर एक 453 पृष्ठों की एक पुस्तक निकाल कर यह सिद्ध कर दिया कि अनुवाद के द्वारा किसी भी भाषा और साहित्य को देश से एक भाग से दुसरे भाग में ले जाया जा सकता है l ज्योति प्रासाद के साथ भी यही हुवा l कहने को तो उनके वंशज राजस्थान से आये थे,पर उनका परिवार असमिया संस्कृति में एकाकार हो गया l इतना ही नहीं, व्यापार करते हुए भी असमिया साहित्य, संस्कृति, गीत, संगीत और विधा पर कार्य आरंभ किया, जिसका नतीजा यह निकला कि असम में साहित्य, गीत और विधा का एक नया लोकार्पण हुवा l इसका सम्पूर्ण श्रेय ज्योति प्रसाद अगरवाला को जाता है l उनके समकालीन भारतीय भाषा के कवि जयशंकर प्रसाद, गणेश शंकर विद्यार्थी, सूर्य कान्त तिरपाठी निराला, आदि कवियों ने हिंदी भाषा में श्रेष्ठ रचना लिख कर हिंदी भाषा को तो विश्व स्तर पर तो गौरवान्वित किया ही है, साथ ही भारतवर्ष में साहित्य के क्षेत्र में एक नई पहचान भी बनाई l  
असमिया सहित्य का दूसरी भाषा में अनुवाद पर आज हम यह चर्चा नहीं कर रहे, बल्कि यह कहने का प्रयास किया जा रहा है कि एक समृद्ध संस्कृति का प्रचार प्रसार देश के अन्य भागों में क्यों नहीं हो रहा, जिससे उत्तर भारत में रहेनें वालें भारतवासियों के मन में पूर्वोत्तर के प्रति जो भ्रांतियां घर कर गयी, वह समाप्त हो सके l सांवरमल सांगनेरिया, देवी प्रसाद बागड़ोदिया, किशोर जैन, दिनकर कुमार जैसे अनगिनत हिंदी भाषी साहित्यकारों ने पिछले 30 वर्षों से यह कार्य अपने हाथों में ले कर माँ असमी की सेवा कर रहें है l ज्योति प्रसाद अगरवाला के लिखे हुए नाटकों और गीतों को राष्ट्रिय पटल पर ले जाने की कौशिश थोड़ी बहुत हुई भी है, पर यह चेष्टा उस तरह से भालिभुत नहीं हुई, जिस तरह से होनी चाहिये थी l इस कार्य में यहाँ जी एल अग्रवाल ने भी ज्योति प्रसाद के उपर शोध एवं प्रकाशन किया है l पूरी दुनिया को बताना जरुरी है कि कैसे एक परिवार सुदूर राजस्थान से आ कर कला- साहित्य में अपना जीवन लगा देता है l ज्योति प्रसाद के दादा हरविलास और दोने ताऊ चन्द्रकुमार और आनंदकुमार अगरवाला असमिया साहित्य संस्कृति के विकास के कार्य में लग गए थे, और उनके पिता परमानन्द संगीत साधना में जुटे हुए थे l उन महापुरुषों द्वारा रचित साहित्य, गीत, संगीत और लेखन आज भी जीवित है, असम की जनता के रक्त में प्रह्मान है l असम साहित्य सभा के शताब्दी समारोह एक मनाये जाने के पहले जब साहित्य सभा की शाखाओं ने सौ झंडे फहराए, तब विभिन्न जाति, जन्गोश्ठी के लोग, भाषा, वर्ण से उपर उठ कर एक आकाश के नीच जमा हुए थे और रूपकुंवर ज्योति प्रसाद अगरवाला के गीत ‘तुरे-मुरे अलोकोर जात्रा...’(जीवन-संग्रामी गीत)पुरे वातावरण में गूंज गया था l यह वही गीत है, जिसको असम साहित्य सभा के सन 1935 के अधिवेशन में गाया गया था l इसी तरह से उनके एक अन्य गीत ‘गोसे-गोसे पाती दिले..फुलोरे सराई...ओ रामों-राम..(किसने सजाई पेड़ पर फूलों की लताएँ..राम-राम) अन्जिनत बार असम के कौने-कौने में जुन्जय्मान हो चूका है l असम में रहेने वालें अनेक हिंदी भाषियों ने पिछली शताब्दी में और अब तक माँ असमी की सेवा करते हुए असमिया में अपना साहित्य लिखा और आज भी लिख रहें है l सदिया से लेकर धुबड़ी तक यह सिलसिला बदस्तूर जारी है l गोलाघाट के स्व. भगवती प्रसाद लडिया, डिब्रूगढ़ के निर्मल सहेवाला, बडुलीपाड़ा के विमल अगरवाला, नलबाड़ी के चिरंजीव जैन और कमल जैन जैसे अनेकों हिंदी भाषी साहित्यकारों ने असमिया भाषा को अपनी लेखनी में प्रथम भाषा के रूप में अपनाया और प्रासारित भी किया(क्षमा के साथ-ऐसे व्यक्तियों की लिस्ट लम्बी है, उन सभी के नाम यहाँ लिखना सम्भव नहीं) l ज्योति प्रसाद के गीतों और नाटकों के उपर जितना भी काम हुवा है, उनको अगर हिंदी में प्रकशित करवा कर भारत के कौन-कौने में फैलाया जाये, तब ना सिर्फ असमिया भाषा समृद्ध होगी, बल्कि असम को मैत्री, भाईचारे और प्रेम की भूमि के रूप में प्रतिष्ठित करवाने में सफलता मिल सकेगी l हिंदी पट्टी के लोगों के बीच ज्योति प्रसाद अगरवाला के व्यक्तित्व, उनके संगीत, उनके नाटक से परिचय हो, ऐसा गुरु कार्य  
अगर राज्य सरकार हाथ में ले, तब यह संभव है कि समस्त देशवासी असम और असम के लोगों के भावों को भली भांति समझ सकें l  

Friday, December 2, 2016

मछली जल की रानी है, जीवन उसका पानी है
रवि अजितसरिया
हम सब बचपन में एक गीत गुनगुनातें थे, ‘मछली जल की रानी है, जीवन उसका पानी है., हाथ लगाओ डर जाएगी, बाहर निकालो मर जाएगी, पानी में डालो तो बह जाएगी’ l गीत एक संकेत मात्र था, हमारे लिए कि जिसका जो संसार है, वह वही रहेगा, उसे छेड़ने की चेष्टा नहीं करों, नहीं तो उसका अस्तित्व समाप्त हो जायेगा और पृथ्वी का संतुलन बिगड़ जायेगा l जीवन बहने का नाम है l गीत एक छात्र के अनुसाशन भी सिखाता था l कितना प्रिय हुवा करता था गीत  l पता नहीं क्यों, अब इस तरह के गीत अब छात्रों को क्यों नहीं सिखाये जाते, या यूँ कहें कि छात्र सीखना ही नहीं चाहतें, उनके पास समय ही नहीं है l समय बदल गया है , शायद बदलाव अपरिहार्य नियम है l जो ना बदले, वे काल के गाल में समा जातें है, या फिर पीछे छुट जातें है l कुछ शाश्वत नियम है, जिनको कोई बदल नहीं सकता l जैसे मछली को कोई जल से जिन्दा बहुत देर तक बाहर नहीं रख सकता l वह मर जाएगी l दुनिया भर में बदलाव हो रहें है l मुनष्य के सोचने के तरीके, विचार और व्यवहार, सभी बदलाव की और है l नए विचार अब अच्छे लगने लगें है l ठीक इस गीत की तरह l मुन्नी और शीला के गीतों ने बच्चों की जुबान पर आने लगें है l बच्चे पहले से अधिक समझदार हो गएँ है l एक नई पौध ने जन्म ले लिया है l जो रुढिवादिता के समर्थक थे, ऊन्होने भी अब नए आने वालें विचारों को आत्मसात कर लिया l विकास के लिए तड़प अब बढ़ गयी है l हर कोई विकसित होना चाहता है l कोई जल्दी, तो कोई बहुत जल्दी l कोई मेहनत से तो कोई बिना मेहनत के l ठोस जमीन बनाने के लिए सबसे पहले एक खड्डे को खोदना होता है, फिर जा कर उस खड्डे को ठोस बनाया जा सकता है l उस जमीं पर खड़ा रहा जा सकता है l इस तरह के शाश्वत नियम वैज्ञानिक है, तो प्राकृतिक भी है l मछली के बारे में जैसे हमें पता है कि उसे बाहर निकलने से वह मर जाएगी, उसी तरह से हमें पता है कि विकास के लिए एक ठोस जमीं तैयार की जानी चाहिये, जिसको कोई हिला नहीं सके l बदलाव के प्रति आग्रही होना विकास की निशानी है, पर बदलाव को आत्मसात करने के लिए थोडा सीखन और थोडा अनुभव भी प्राप्त करना पड़ता है l तभी वह विकास ठहरता है l इस समय असम,  व्यवसाय करने की आसानी वाले ग्राफ में २४वें स्थान पर लुढ़क गया, त्रिपुरा से भी नीचे l पहले से 2 स्थान नीचे l असम के साथ पूर्वोत्तर के सभी राज्यों ने वर्ष 2016 में ख़राब प्रदर्शन किया l जैसे मछली जल की रानी है, उसी तरह उद्द्योग, वाणिज्य किसी भी राज्य का मेरुदंड है l उसको विकसित करने से राज्य की माली हालत अपने आप सुधर जायेगी l आन्ध्र प्रदेश क्यों इस लिस्ट में सबसे उपर है l क्या विकास के लिए छटपटाहट सिर्फ आन्ध्र में ही है ? दुसरे राज्य के लोगों में क्या इस तरह का हुनर नहीं है कि वे भी विकसित हो कर अपना जीवन बड़े आराम से जी सकें l यह एक कटु सत्य है कि पूर्वोत्तर के राज्यों में स्थानीय लोगों में व्यापार करने के वे जन्मजात गुण नहीं है जो दुसरे राज्यों के लोगों में रहतें है l पर इससे वह छटपटाहट तो ख़त्म नहीं होनी चाहिये, जो अन्य राज्यों के लोगों में देखी जा सकती है l भारत सरकार के उद्द्योग नीति एवं संवर्धन विभाग ने 340 ऐसे विन्दु तय किये है, जिस पर हर राज्य को खरा उतरना है l इसमें राज्यों को अपने प्रदर्शन करना है l अब सवाल उठता है कि असम और पूर्वोत्तर में व्यापार करने में तमाम तरह की परेशानियाँ क्यों है l क्यों यहाँ आयें दिनों दंगे और मारपीट होतें है l क्यों यहाँ व्यापारियों को प्रताड़ित किया जाता है ? क्या विकास के लिए यह जरुरी नहीं कि दुसरे लोगों के साथ एक प्रतिस्पर्धा में उतर कर आगे आ कर दिखाएँ l क्या किसी अनजाने भय की वजह से यहाँ व्यापार में सहूलियत प्रदान नहीं की जाती ? क्या व्यापार करना इतना बुरा कार्य है कि उसको असम दोहम दर्जे का कार्य माना जाता है ? तमाम तरह के प्रश्न लोगों को कचोटते होंगे, जिससे हताशा और आक्रोश पनप रहा है l व्यापार उस मछली के सामान है, जिसको जल से निकला नहीं जा सकता, उसको छुवा जा सकता है, पर पकड़ा नहीं जा सकता l मछली जल में जितना विचरण करेगी, उसकी लम्बाई बढ़ेगी, जिससे वह प्राक्रतिक संतुलन बनाने में एक अहम् रोल निभाती रहेगी l मगर जब जल से मछली को निकल लिया जायेगा, तब उसकी मृत्यु तय है l असम में व्यापार को उन्नत करने के लिए स्थानीय लोगों को भी उसमे कूदना होगा और अपने भविष्य को उज्जवल बनाना होगा l हो सकता कि उस समय वे भी व्यापार करने में आने वाली परेशानियों के बार्रें में भिज्ञ हो जाएँ और व्यापार के रहस्यों के बारें में जान सकें l तब हो सकता है कि तब यहाँ व्यापरियों को किसी तरह से कोई खतरा नहीं हो l स्थानीय लोगों को भी किसी अनजाने भय से आक्रांत नहीं होना पड़ेगा कि कही कोई प्रवजन करके आये लोग स्थानीय लोगों पर भारी नहीं पड़ जाएँ l तब किसी छात्र संगठन को आय दिन आन्दोलन नहीं करना पड़ेगा और चंदा नहीं उठाना पड़ेगा l सभी एक साथ सहयोग करेंगे l क्या स्थानीय और क्या बाहरी l
यह एक बेहद जटिल मुद्दा है, जिस पर चिंतन और विवेचन आवश्यक है l असम के बच्चे पुरे देश में ही नहीं पूरी दुनिया में कमाल कर रहें है, इस राज्य में वह माद्दा है कि वह भी व्यापार करने की आसानी वाले ग्राफ में उपर आ सके, पर इसके लिए एक सामाजिक और राजनैतिक इच्छा शक्ति की जरुरत होगी, जो आयेगी एक सुशासन से l यह समय बेहद अनुकूल है कि राज्य में व्यापार और वाणिज्य में एकदम से उछाल आ सकता है, जिसके लिए यहाँ के सामाजिक और जातीय संगठन, वरिष्ट नागरिक और गैर सरकारी संगठनों को एक साथ मिल कर सोचना होगा कि विकास के लिए व्यापार और उद्द्योग कितना जरुरी है l व्यापार को जीवन से साथ जोड़ना होगा, मछली बनाना होगा, बहना होगा.. l              
एक परिचित देश में अपरिचित सा मानव
रवि अजितसरिया
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डा. भरत झुनझुनवाला कहते है कि सरकार ने 500 और 1000 की मुद्रा का विमुद्रीकरण कर के एक साहसिक कदम तो उठाया है, पर यह पूरी कवायद तभी सफल हो सकेगी, जब इसका फायदा आम लोगों को होगा l यह फायदा आम लोगों तो तभी होगा, जब सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन पूरी इमानदारी से होगा l कितनी सच्चाई है, उनके इस कथन  में l सरकारी धन की बर्बादी को रोकने से देश में इमानदारी और अनुशासन होगा और फिर भारत को विकसित देश बनने से कोई नहीं रोक सकता l प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने सरकारी धन की गुणवत्ता को सुधारने की असली चुनौती है l यह बात हम इसलिए कह रहे है क्योंकि अक्सर यह देखा गया है कि लोगों के लिए देश का धन अपना जैसा नहीं लगता बल्कि लोगों के पास होने वाला धन अपना जैसा लगता है l यह स्थितियां इसलिए आई क्योंकि सरकरी बाबुओं ने जम कर सरकारी धन का अपव्यय किया, जिससे देश में कला धन कुछ लोगों के पास जमा होता गया, जिससे सरकारी धन की साख पूरी तरह से गिर गई l इतिहास गवाह है कि कई राज्यों में मार्च में जबरदस्त खरीदारी की जाती थी, जिसका कोई हिसाब नहीं होता था l आनन फानन बिल बनाये जाते थे, और ठेकेदार को पेमेंट कर दी जाती थी l यह सिलसिला स्वतंत्रता के बाद से ही चल रहा था, जो कई विभागों में आज भी बदस्तूर चल रहा है l सिक्सटी-फोर्टी करने की कला सरकारी बाबुओं में ठीक उसी तरह से है, जैसे एक फिरकी गेंदबाज में अनुवान्सिक रूप से रहती है l इन छेदों को पूरी तरह से बंद करने की जरुरत है l हमारे सरकारी खर्चों में कोई कंट्रोल नहीं है l जो जितना खर्च कर दिया उतना ही पास हो गया, क्योंकि पास करने वालें भी उतना ही खर्च कर रहें है l एक दुसरे के बिलों को क्यों रोंके l अब देखिये, गावों में सड़क, पानी और बिजली के लिए लोग अक्सर आवाज उठाते है, पर फंड की कमी की दुहाई दे कर लोगों का मुहं बंद कर दिया जाता है l अब सरकार के पास चार-पांच लाख करोड़ रुपये कर और अन्य स्त्रोतों से आ जाने की उम्मीद है, जिसका वह सदुपयोग कर सकती है l लोक सभा और राज्य सभा के सांसदों के पास पहले से ही उनका 5 करोड़ प्रति वर्ष का अपना फंड(संसदीय क्षेत्र विकास फंड) रहता है, जिसका उपयोग वे इलाके की भलाई के लिए खर्च कर सकतें है l उनके पांच वर्ष के कार्यकाल में यह फंड कुल 25 करोड़ हो जाता है l पर होता है एकदम उल्टा, कई सांसदों का फंड खर्च नहीं करने की सूरत में वापस लौट जाता है l इसमें कही ना कही विजन की कमी रहती है l उन्हें वह नहीं दिख रहा होता है, जो आम लोगों के सामने रहता है l इसी तरह से राज्यों के विधान सभा के सदस्यों के पास भी 2 से 5 करोड़ का फंड उनके क्षेत्र के लिए रहता है , पर किसी को यह पता नहीं चलता कि कैसे विधान सभा के सदस्य यह राशि खर्च करतें है l ये सब तो उदहारण मात्र ही है, असली खर्च तो बड़ी विकास योजना में होता है,  
जिसमे जम कर भ्रष्टाचार होता है, और काले धन का निर्माण होता है l इन खर्चों पर अगर लगाम लगाने में सरकार सफल हो जाती है, तब जा कर यह कहा जायेगा कि नोटबंदी एक कारगर कदम था l
शोप्पेर्स पॉइंट में कपडें की दूकान चलाने वाले युवा व्यवसाई संदीप अगरवाल इस कदम को सही बतातें है और कहतें है कि देश में इन्कम टेक्स देने वालों की संख्या काफी कम है, जिसकी बढ़ोतरी होनी चाहिये l उनका कहना है कि देश में जनसँख्या का करीब एक प्रतिशत ही लोग असल में कर देतें है l 5430 लोग 1 करोड़ से भी ज्यादा आयकर देतें है l वही करीब 50,000 लोग करीब 1 करोड़ की सलाना आय करतें है और 13.3 लाख करदाता सलाना 10 लाख के करीब आय करतें है l जो लोग 21000 से ज्यादा मासिक आय करतें है उनको आय कर देना होता है, वही देश की करीब 95 प्रतिशत जनता आय कर नहीं देती, जिसका बोझ उन आय करदाताओं पर पड़ता है, जो सही मायने में कर देतें है l इस समय देश में करीब 17 करोड़ पेन कार्ड होल्डर है, जिनमे करीब 3.5 करोड़ लोग ही इनकम टेक्स रिटर्न फाइल करतें है, और करीब 1.25 करोड़ लोग ही कर देतें है l अब सवाल यह उठता है कि इतने बड़े देश में डायरेक्ट टेक्स, जो देश का कुल कर का आधा कर बनता है, देने का भार कुछ ही लोगों पर क्यों है ? क्या नोटेबंदी का बोझ भी उन पर ज्यादा पड़ेगा ? यह बात इसलिए भी जायज है क्योंकि ख़बरें व्हात्सुप पर वायरल हो गयी है कि बड़े पैमाने पर इनकम टेक्स विभाग द्वारा कर दाताओं को नोटिस जारी किये जा चुकें है l कुछ अन्य मेसेज सोसिएल मीडिया पर आ रहें है, जिनमे प्रमुख है प्रसाद नमक व्यवसायी का प्रधानमंत्री के नाम एक पत्र है, जिसमे उसने देश में लोग कर क्यों नहीं देतें है, इस पर एक खुला पत्र लिखा है l पत्र में उसने जो कारण गिनाएं है, वे सभी जायज और तर्क सम्मत है l एक अन्य सन्देश में यह कहा गया है कि देश की 23 प्रतिशत आबादी बीपीएल श्रेणी की है, जो 100 रुपये से नीचे प्रति दिन कमाती है l उसके पास 4000 प्रति सप्ताह खर्च करने के लिए नहीं है l बाकी 77 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से उपर है l इसमें से सिर्फ 2.87 करोड़ लोग ही आयकर देतें है l बाकी बचे 89 करोड़ लोग गरीबी रेखा से उपर है पर आयकर नहीं देतें l यह समझ में नहीं आता कि 89 करोड़ लोग, जिनकी सालाना आय 2.5 लाख से नीचे है(4800 प्रति सप्ताह), अचानक 4000 रुपये क्यों खर्च करना चाहतें है l इस तरह के तमाम मेसेज सोसिएल मीडिया पर इस वक्त छायें हुए है l संदीप अगरवाल ने अनायास ही कुछ बड़े प्रश्न खादें कर दिए है l क्यों हर वक्त करदाताओं पर हमेशा नंगी तलवार लटका दी जाती है, जबकि देश में करोड़ों लोग हर वर्ष कर देने में सक्षम है, पर जानबूझ कर कर नहीं देतें l अभी भी बड़ा सवाल यह जहन में आ रहा है कि जब देश की आधी जनसँख्या गावं में रहती है, फिर गावों के विकास के लिए पूरी ताकत क्यों नहीं लगाई जाती l क्यों लोगों को कमाई के लिए शहर जाना पड़ता है l गावों से पलायन रोकने ले लिए, क्यों रोजगार के साधन गावों में ही मुहय्या नहीं करवाएं जाते ?  

इस तरह के तमाम प्रश्न इस वक्त सभी के दिमाग में उठ रहें है l नोटबंदी के सभी ने स्वागत किया है, पर जिस तरह से देश अब तक चला है, संदेह के बादलों का घिरना स्वाभाविक है l यह प्रश्न भी जायज है कि क्यों भारत में अचानक लोगों को देश के विकास में भागीदार होने के सबूत देने पड़ रहें है l क्या भ्रष्टाचार उपर से नीचे की और नहीं बहता ?आप उपर नकेल कसों, नीचे सब कुछ अपने आप ठीक हो जायेगा l देश का हर नागरिक कर देने के लिए तैयार है, शर्त यह है कि वह धन देश के काम में आये, ना कि भ्रष्टाचारियों के l