Saturday, June 30, 2018



अनेबल टू स्लीप

कुछ लोग कहते है कि सपने ऐसे देखो कि उनको पूरा करने के लिए एक जद्दोजहेद हो और रातों की नींद हराम हो जाए l इस समय भारत के लोगों के साथ यही हो रहा है l छोटे और मंझले व्यापारियों की नींद इस समय उड़ गयी है l उनको अभी कोई सपने नहीं आ रहें है l डार्विन के सिद्धांत बरबस याद आ जाते है, ‘स्वस्थतम की उत्तरजीविता’ (सर्वाइवल ऑफ़ द फिटेस्ट) l इस समय देश में यही हो रहा है l दबे-कुचले हुए लोगों के लिए अब यहाँ कोई स्थान नहीं रह गया है l चारों और क्षेत्रीयतावाद की तीव्र आंधी चल रही है l व्यापार, वाणिज्य मानों कोई दोहम दर्जे का कार्य है l आम लोगों को रिझाने के लिए व्यापारी को हमेशा से सरे आम गालियाँ दी जाती रही है l पेट्रोल और डॉलर दोनों उपर जा रहें है l सब्जी, फल और रोजमर्रा की चीजों के भाव लगातार बढ़ रहें है l खुदरा दुकानदारों का हाल तो यह है कि वें दिन भर इस बात पर चिंता करतें है कि उनके रिटेल व्यवसाय का भविष्य क्या है l इस समय देश में खुदरा व्यवसाय करीब 600 बिलियन डॉलर का है, जो देश का सकल घरेलु उत्पाद का 10 प्रतिशत है l आर्थिक गुण में भारत ले लोग विश्व में उपर की श्रेणी में है, जो अभी भी अपनी जरुरत की चीजें बाजार की रिटेल दुकानों से खरीदतें है l रिटेल चैन और डिपार्टमेंट स्ट्रोर के आ जाने से भी भारतीय लोगों के स्वभाव में कोई फर्क नहीं पड़ा है l दुनिया के कुछ भागों में, खुदरा व्यापार में अभी भी परिवार-संचालित छोटी दुकानों का वर्चस्व है, लेकिन इस बाज़ार पर अब खुदरा श्रृंखलाओं का तेज़ी से कब्जा होता जा रहा है l पेट्रोल के भाव बढ़ने से खुदरा व्यवसाइयों में खलबली सी मच गयी है, उपर से डॉलर के रेट और रुपया अब तक का सबसे निचले स्तर पर पहुच जाने से कुछ भारतीय कंपनियों ने मौके का फायदा भी उठाना शुरू कर दिया है l उन्होंने अपने उत्पादों के भाव छद्म रूप से बढ़ाने भी शुरू कर दिए है l व्यापार और वाणिज्य को वैश्विक स्तर दिए जाने के पश्चात और भारत में सौ प्रतिशत तक विदेशी रिटेल निवेश के निर्णय के बाद, अब रिटेल दुकानदारों की परेशानियाँ पहले से ज्यादा बढ़ गयी है l उपर से जीएसटी के आने के पश्चात उसके तमाम धाराओं को सफलतापूर्वक अमल में लाना उनके लिए एक चुनौती बनी हुई है l छोटे और मंझले दुकानदारों के उपर मानो संकट सा छ गया है l आज छोटी दुकानों से ग्राहक नदारद है l हालाँकि, जीएसटी के जानकार कह रहें है कि यह संकट अस्थाई है, और समय के साथ एक बार फिर छोटी दुकानों में ग्राहक दिखाई देने लग जायेंगे l पर आर्थिक क्षेत्र के जानकार यह कह रहें है कि बड़े मॉल और शोपिंग कॉम्प्लेक्सों में दी जाने वाली आकर्षक छुट और केश बेक एक बड़ी वजह है ग्राहकों का छोटी दुकानों को छोड़ने की l बात इतनी भी नहीं बिगड़ती, पर जीएसटी के आने के पश्चात छोटे और मंझले दुकानदारों को जीएसटी में समाहित होने में कुछ समय लग गया, जिसका फायदा इन बड़े स्टोरों को मिल गया है l इस समय ग्राहक भी असंजस में है कि किस पर विश्वास करे, क्योंकि एक ही सामान दो अलग अलग जगह पर दो दामों पर मिल रहे है, जिनकी एमआरपी एक ही है l दरअसल में यह एक माल बेचने की कला है, जिसे मॉडर्न ट्रेडकहा जाता है l भारत ने जब बहुविदेशी कंपनियों को भारत में माल बेचने के लिए भारी सुविधा देनी शुरू जब से की है, उनका उत्पादन भारत के चारों कौनों में होने लगा है l इस समय देश में करीब 15 करोड़ खुदरा व्यवसाई है, जो देश में परम्परगत बाजार, हाट, चौक और कसबे पर अपनी दूकान चलातें है l इनमे वे भी शामिल है, जो रिटेल चैन की दुकाने चलातें है l दुकानदारी में मंदी आने के कारण ढूंढने से पता चलता है कि देश में व्यतिगत रूप से देशवासी परेशान सा दिख रहा है l वास्तविक स्थितियां देश में बिलकुल अलग है l भाषण में बोले गए वाक्य सुनने में मजेदार लग रहें है, पर उनको हकीकत की धरातल पर तोलते है, तब देह में अजीब सी सरसराहट होने लगती है, सांस फूलने लगती  है और रातों की नींद उड़ने लगती है l यह सच है कि देश में संवाद बढ़ा है, सरकार और लोगों में नजदीकियां भी आई है, पर अभी भी देश की एक बड़ी जनसंख्याँ उस लाभ से वंचित है, जिसका जिक्र हमारे देश के नेता गाये-बगाहे करतें रहतें है l इस सच्चाई से कोई नकार नहीं सकता कि देश की अर्थ-व्यवस्था के विकास में खुदरा व्यवसाइयों ने बहुत बड़ा योगसान दिया है l खुदरा व्यवसाइयों के हाथ मजबूत करने से यह तय है कि देश की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी l और अंत में,
इस समय देश एक नाजुक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ उसके समक्ष कई चुनौतियाँ है, जिनमे आर्थिक, सामाजिक और राजनेतिक, सभी है l जहाँ, जीएसटी को सफलतापूर्वक लागु करवाना अभी भी एक बड़ी चुनौती है, वहीँ, सामाजिक स्तर पर भी देश के गुणों को भी बचाए हुए रखना है l देश के कई नेता जो हाशिये पर चले गए थे, अपनी राजनेतिक भूमिका अभी भी तक तलाश रहें है, वे आम जनता को भड़काने में कोई कसर नहीं छोड़ रहें है l 

Friday, June 22, 2018


यह एक इंस्टेंट कॉफ़ी का जमाना है
तेजी से बदलते दौर में, विचारों का बदलना भी एक स्वाभाविक सी प्रक्रिया है l संस्कारों और रीति रिवाजों में कल-चक्र का प्रभाव हमें साफ़ दिखाई दे रहा है l फिर भी रचनाधर्मिता हमारे जीवन से निकली नहीं है l कुछ नया करने के लिए हम आतुर है l जीवन के प्रति लम्हे को अब हम दर्ज करना चाहतें है, जैसे अभी की जिंदगी ही बस सबसे अधिक अच्छी और सुंदर है, जिसे जितना जी  लो, उतना ही अच्छा है l एक फेसबुक पेज की तरह l जिस पर पोस्ट डालो, और फिर लाईक,कोमेंट्स और रिप्लाई l स्टेट्स अपडेट करो और फिर ढेरों लाईकस l इस तरह से जीवन में नए उपक्रम घर कर गए है , जिनके साथ रहना हमें पसंद आने लगा है l अब रोटी-कपड़ा-मकान से जीवन नहीं चलता, बल्कि उन तमाम जरूरतों को जुटाते हुए जीवन को जीने की एक कला है, जिसको हर मनुष्य आज ढूँढ़ रहा है l कुछ लोग जो जीवन भर संघर्ष भरा जीवन जी रहें होतें है, उनके लिए मात्र समृद्धि ही सुखी होने की निशानी है l आसुओं से कुश्ती लड़ कर कुछ लोग, एक नई जिंदगी जीने के लिए जीवन से ही प्रेरणा प्राप्त कर लेतें है l खिड़की के झरोखे से दिखाई देने वाला एक छोटा सा दृश्य भी, उन्हें एक नए जीवन की और ले जाने में सक्षम है l परिवर्तन प्रकृति का नियम है। परिवर्तन सकारात्मक व नकारात्मक दोनों ही हो सकते हैं। किसी भी समाज, देश, व विश्व में कोर्इ भी सकारात्मक परिवर्तन जो प्रकृति और मानव दोनों को बेहतरी की ओर ले जाता है वही वास्तव में विकास है। अगर हम विश्व के इतिहास में नजर डालें तो पता चलता है कि विकास शब्द का बोलबाला विशेष रूप से द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सुनार्इ दिया जाने लगा। इसी समय से विकसित व विकासशील देशों के बीच के अन्तर भी उजागर हुए और शुरू हुर्इ विकास की अन्धाधुन्ध दौड़। सामाजिक वैज्ञानिकों, अर्थशास्त्रियों, नीति नियोजकों द्वारा विकास शब्द का प्रयोग किया जाने लगा।   कुछ लोग अपने अपने अंतर्मन से प्रेरित हो कर इस दुनिया में लोगों ने अपनी कठिन जिंदगी को हमेशा से ही सरल और मीनिंगफुल बनाने की कौशिश की हैं, चाहे वह ध्यान, अध्यात्म और भगवत पूजा के द्वारा हो या फिर दुनिया की तमाम उपलब्ध वस्तुओं को उपभोग करके हो l पर इंसान ने हमेशा से ही बदलाव के द्वारा एक खुबसूरत जिंदगी जीने की और रुख किया है l इस समय सबसे बड़ी और कठिन तपस्या इंसान की, स्वस्थ रहना है l स्वास्थ के लिए जब पूरी दुनिया में अरबों-खरबों रुपये खर्च हो रहें है, ऐसे में उसका लाभ धीरे-धीरे मानव जाति को मिलने की और अग्रसर है l तमाम द्वन्द्वों के बीच मुट्ठी भर सुख की प्राप्ति की चाह कर कोई कर रहा है l पर कहाँ रहता है, यह सुख, कैसा है इसका चहरा, कौन बताता है, सुख की दिशा l कई सारे प्रश्न हमारे दिमाग में कौध जातें है, जिनके जबाब हमें नहीं मिलतें l अत्यधिक धन होना, किसी बड़े सुख की अनुभूति नहीं भी दे सकता है, जबकि एक छोटा क्षण हमें इतना सुख दे सकता है कि जीवन की गति ही बदल जाये l शायद इसी क्षण के लिए लोग रुके रहतें हैं l जब धरती पर इतने संसाधन नहीं थे, तब आबादी भी इतनी नहीं थी, संघर्ष से भारी जिंदगी में इंसान की वास्तविक खूबियों की अपेक्षा होती रही, ऐसे में 21वी सदी मानव जाती के लिए वरदान बन कर आई है l तकनीक और सुचना प्रसारण अपने विकास के चरम पर है l मानव चाँद और अन्य ग्रहों पर घर बनाने की और अग्रसर है l न्याय संगत और विचार आधारित धरातल की सृजनशीलता ने मानवजाति के कद तो अब बहुत बड़ा बना दिया है l बोद्ध ग्रंथ मिलिंद प्रश्नएक ऐसा ग्रंथ है, जो उपदेशात्मक है, और सत्य से साथ साक्षात्कार करवाता है l इसमें मूल बात यही है कि जिस चीज का प्रवाह पहले से चला आता है, वही चीज पैदा होती है l मानवीय वृतियों का सूक्षमता से समझने से पहले यह समझना जरुरी है कि वे निहित श्रंखलायें क्या है जो एक जीव को मानव बनता है? उसके सोचने और समझने की शक्ति और जिजीविषा जिसके प्रदर्शन से वह एक मानव कहलाता है l यदि विकास के मूलतत्व को गहरार्इ से समझने का प्रयास किया जाये तो विकास का अर्थ सिर्फ आर्थिक सशक्तता नहीं हैं। यदि पूर्व के ग्रामीण जीवन का अध्ययन किया जाये तो आज के और पूर्व के जीवन की बारीकी को समझने का अवसर मिलेगा।  
दुनिया अब अभिव्यक्ति का एक सुंदर संसार बन गयी है l संवाद के माध्यम इतने प्रबल और मजबूत अवधारणा बना देतें है कि हर कोई उसी के पीछे दौड़ने लगता है l यह दौड़-भाग जीवन का एक हिस्सा बन गयी है l खुद को प्रशंसित करने की इच्छा, दूसरों द्वारा स्वीकृत होने और पीठ थपथपाए जाने की आकांशा अब जीवन का एक कोलाहल बन गयी है l एक आभासी संसार में रहने के लिए हो सकता है कि हम तमाम तरह की अवधारणों का सृजन कर ले, पर वास्तविकता की धरातल पर हमें एक दिन अपने आप को खड़ा रखना ही होगा l जीवनधारा फिल्म के इस सारगर्भित  गाने के बोल को यहाँ उद्धित करता हूँ ...’इसका नाम है जीवनधारा है, इसका कोई नहीं किनारा...हम पानी के कतरे, गहरा सागर ये जग सारा....इसका नाम है, जीवनधारा’ l      

Friday, May 25, 2018


शादियों में इवेंट का एक नया तड़का  

एक माध्यम वर्गीय शादी के आयोजन में कितनी राशि खर्च करनी चाहिये, इस बात पर हमेशा से विवाद रहा है l वैवाहिक रस्मों पर आधुनिकता का तड़का लगने से वें प्रासंगिक तो हो गयी है, पर वें दिखावे और फिजूलखर्ची की भेट चढ़ गयी l मसलन वरमाला की रस्म सबसे सजीव, महत्वपूर्ण और पवित्र मानी जाती है l कहते है कि भगवान राम ने माता सीता को प्रथम जयमाल पहनाया था l इस वरमाला की रस्म को इवेंट का तड़का लगने से वह एक पूरा का पूरा समारोह बन गया है l श्याम वरमाला, राम वरमाला, गन्धर्व वरमाला, इत्यादि.. l इसी तरह से एक नई रस्म आजकाल विवाह की रस्मों की सूची में अचानक जुड़ गई है l प्री वेडिंग फोटो शूट(विवाह-पूर्व चित्रण) अभी सबसे ताजा रस्म है, जो शादी से पहले लड़के-लड़की की सबसे पसंदीदा रस्म बन गयी है, जिसमे हिंदी फिल्मों की तर्ज पर आउटडोर लोकेशन पर शूटिंग की जाती है l मजे की बात यह है कि इन अन्तरंग दृश्यों को बड़े परदे पर शादी के दौरान सभी के सामने दिखाया जाता है l इस नई रस्म को लेकर हिन्दू समाज में इस वक्त भारी चर्चा है l संभवतः इवेंट वालों की झोली से यह रस्म निकल कर आई है, जिसको हिन्दू समाज ने लपक लिया है l इस रस्म को निभाने कितना खर्च करना है, इसका कोई मापदंड नहीं है l व्हात्स्सप्प और फेसबुक जैसे सोसिएल मीडिया पर प्री वेडिंग फोटो शूट पट लोगों ने ढेरों कमेन्ट दिए है l इतना ही नहीं, प्री वेडिंग फोटो शूट के लिए स्टूडियो और गूगल प्ले स्टोर पर एप्प बन गए है l देश के नामी-गिरामी फोटोग्राफर लाखों रुपये लेकर इस प्री वेडिंग फोटो शूट को संपन्न करवातें है l प्री वेडिंग फोटो शूट के अलावा ये स्टूडियो, प्री वेडिंग ट्रिप का भी आयोजन करतें है l    विदेश के महंगे लोकेशन पर इस तरह की प्री वेडिंग फोटोशूट की जा रही है l ऐसा माना जा रहा है कि मुंबई फिल्म इंडस्ट्री के कलाकारों को देख कर आम लोगों ने भी अपनी शादी को यादगार बनाने के लिए प्री वेडिंग फोटोशूट का आयोजन करतें है l प्री वेडिंग फोटोशूट को लेकर इस वक्त भारतीय समाज में खासी चर्चा है l अगर गौर से देखा जाये, तब इसमें कोई बुराई नजर नहीं आती है l यह किसी का भी एक निजी मामला हो सकता है, शादी के पहले के पलों को यादगार बनाने के लिए कोई भी अपने निजी पलों को कैमरे में कैद कर सकता है l इसका विरोध इसलिए हो रहा है, क्योंकि पहला, अन्तरंग दृश्यों को बड़े परदे पर दिखाने से यह एक बम्बईया फिल्म का एक शॉट की तरह लगता है, जिसको देख कर लोग सिटी बजातें है, अभद्र टिप्पणियां करतें है l दूसरा भारतीय समाज अभी भी इस तरह से विवाह पूर्व मिलन को पूरी तरह से समर्थन नहीं करता है l तीसरा, विवाह पूर्व की आजादी के कई खतरे है, जिसके डर से समाज के कई घटकों ने इस तरह की प्री वेडिंग फोटोशूट का विरोध किया है l चौथा, प्री वेडिंग फोटोशूट थोड़ा कित्रिम सा लगता है, इसमें धन और समय की बर्बादी है l जानेमाने वकील, समाजसेवी और सामाजिक आचार संहिता के पक्षधर रहे, संजय सुरेका कहते है कि प्री वेडिंग फोटोशूट के पश्चात, अगर किसी कारण से सगाई टूट जाती है, तब कोई एक पक्ष इसका अनावश्यक फायदा उठा सकता है, इतना ही नहीं वे आगे कहते है कि इवेंट वालों में शामिल कई लोग इसका दुरूपयोग कर सकते है l उनके पास कई ऐसे मामले आये, जिनमे शादी तक मामला जमा ही नहीं और सगाई टूट गयी, प्री वेडिंग फोटोशूट तक हो गई थी l सगाई टूटने के पश्चात, कुछ लोगों ने लड़कीवालों को तंग करना शुरू कर दिया था l वे कहते है कि यह एक विकृति है, जिसको रोका जाना अत्यंत जरुरी है l गुवाहाटी के जानेमाने चार्टर्ड अकाउंटेंट ओमप्रकाश अगरवाल कहते है कि समाज के प्रभावी नियंत्रण के अभाव में और बुद्धिजीवियों की निष्क्रियता से एक पारिवारिक समारोह, सार्वजनिक समारोह बन गया है। जब कुछ बड़े लोग शादी के समारोह को शान दिखाने का पर्याय बना लेते है, अपनी हैसियत समाज को दिखाने का साधन बना लेतें है, तो नई परम्परा बनने लगती है। अगर समाज के लोग सजग हो जाते, तो कह देते, कि हम तुम्हारी हैसियत बढ़ोतरी के कार्यक्रम से दूर रहेंगे। परन्तु हमारा मरा-मरा सा समाज और निष्क्रिय बुद्धिजीवी चल देते हैं, पंडाल में खड़े होकर पत्तल थाम लेते हैं। बस! एक सामाजिक रीति, कुरीति का रूप लेने लगती है। प्री वेडिंग फोटोशूट के नए आये संस्करणों को वे सामाजिक उपद्व की संज्ञा देते है l
 एकल परिवार के गठन के साथ ही सामाजिक वर्जनाएं टूटनी शुरू हो गयी है, हजारों लोगों के समाज के पास अब आचार संहिता के नाम पर है, बस कुछ छोटे-मोटे नियम, जिनकों भी लोग नहीं मानते l नए आये युवकों के कहना है कि सामाजिक वर्जनाये ट्राफिक पर लगे सिग्नल जैसी होती है, जो तेज गाड़ियों को एकाएक रोक देता है l विवाह जैसे पवित्र अनुष्ठान का गठन इसलिए किया गया, ताकि समाज में अनुसाशन बन रहे, और विवाह जैसे पवित्र बंधन हमारे समाज के अनुसाशन और सत्ता के पर्याय बन गए l इनके संचालन के लिए सामाजिक और देश के कानून बने, पर अपनी सहूलियत के हमने एक सामाजिक दृष्टिकोण अपनाया और व्यवस्थाएं अपने अनुरूप गढ़ी l रीति-रिवाजों और परम्पराओं के निर्भाव के लिए आचार संहिता भी बनाई l पर समय के साथ सामाजिक तंत्र के चरमराने से समाज में प्रतिबद्धता की कमी देखने को मिली, जिसे समस्यायें उत्पन्न होती चली गयी l इस समय प्री वेडिंग फोटोशूट एक समस्या बनाने की कागर पर, जिस पर विवेचना होनी चाहिये l  

Friday, May 11, 2018


असमंजस में आम आदमी
इस वक्त देश एक कठिन दौर से गुजर रहा है, देशवासी असमंजस में है l कभी उन्हें लगता है कि सब कुछ अच्छा हो रहा है, तो कभी स्थितियां बेहद गंभीर दिखाई देती है l सरकारी दावों की तरफ देखें, तो पायेंगे कि देश में निति आयोग जैसी सर्वाधिकार वाली संस्था है जो हर वर्ष राज्यों को विभिन्न मदों में पहले से ज्यादा धन आवंटन करती है, आम आदमी की सुरक्षा के लिए बनाये हुए कल्याण कोष में में हर वर्ष ना जाने कितने करोड़ रूपये आबंटित किये जातें है, हर गावं में बिजली पहुचने का दावा प्रधानमंत्री कर रहें है l उन्नत चिकित्सा के लिए नए हॉस्पिटल, मुफ्त पैथोलोजी और रेडियोलोजी जांच, इत्यादि की घोषणा l लगभग हर क्षेत्र में सरकारी घोषणा लगातार रहती है l इसमें कोई दो राय नहीं है कि देश के आर्थिक हालात पहले से ज्यादा सुधरें है l भविष्य निधि(पीएफ) में पहले से ज्यादा लोगों ने अपना पंजीकरण करवाया है l विदेशी मुद्रा कोष लगातार बढ़ रहा है l दूरसंचार के क्षेत्र में बेहताशा बृद्धि हुई है l सरकार और आम जनता में एक नजदीकी सी देखने को मिल रही है l सरकारी अधिकारीयों और आम जनता के बीच एक संवाद का वातावरण पिछले पांच वर्षो में बना है, जिससे सरकार की मंशा का पता चल रहा है l उज्वला योजना, दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना, अटल पेंशन योजना, दुर्घटना बिमा योजना, इत्यादि सैकड़ों योजनायें इस समय आम आदमी के लिए लांच की गयी है, जिसका फायदा लोगों की मिल रहा है l फिर भी आम आदमी असमंजस में होने के कई कारण सामने देखने को मिल रहें है, एक तो देश देश में एक नई कर प्रणाली, जीएसटी, के आने से लोगों को कुछ समझ नहीं आ रहा है, दूसरा, कच्चे तेल की अंतराष्ट्रीय कीमतें बढ़ जाने से एकाएक देश में लोहा और अन्य कई मेटालों और उनसे जुडी हुई कई वस्तुओं के भाव बढ़ गए, तीसरा, रूपया एकाएक निचले स्तर पर आ गया, जिससे कारोबारियों में खलबली मच गयी है l इधर सामाजिक फ्रंट पर अगर देखें तब पाएंगे कि लोगों के जीवन से चैन  जा रहा है l एक अनंत यात्रा के सहभागी बन गए है, लोग, जिसका कोई थोर नहीं दिखाई दे रहा है l रोजाना, मानो एक परीक्षा में बैठना पड़ता हो, l देश में हो रही लगातार बलात्कार और योन शोषण की घटनाएँ इस बात की और इशारा कर रही है कि हम एक अनियंत्रित यात्रा की और अग्रसर है, जिसमे हमारा व्यवहार पसान युग के मानव सा लग रहा है l ऐसा भी नहीं है कि कुछ सकारात्मक नहीं घट रहा है l 2014 में देश में नई भाजपा सरकार आने के पश्चात लोगों में इस बात का संतोष था कि देश में जीने के कुछ अच्छे हालात पैदा होंगे, और हुए भी l देश में पिछले चार वर्षों में एक भी बड़ा जन आन्दोलन नहीं हुवा है l औपचारिक और अनौपचारिक रूप से l पर व्यतिगत और राजनैतिक विचारों के द्वंद्व ने देश के नागरिक को अकेला और उपेक्षित सा खड़ा कर दिया है l रोजाना एक नया विचार और नई बात, किसी को भी असमंजस में डाल सकता है l अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार का अतिक्रमण, नकारात्मक व्यक्तियों का प्रकट होना, शिक्षा, संस्कार और सांस्कृतिक क्रांति की सफलता को निजी अहं, विश्व पूंजीवाद-उपभोक्ताकरण और पश्चात्याकरण, जैसी स्थितयां आम आदमी को भ्रमित करने के लिए काफी है l  

राजनीति निम्न दर्जे पर जाने के पश्चात, इस समय एक संक्रमण काल से देश गुजर रहा है l आधा-अधुरा सा विकास l कभी पश्चिम की तर्ज पर तो कभी स्वदेशी मॉडल l 4जी में तो हमने प्रवेश कर लिया है, पर अगर गुणवत्ता की और देंखे तब पायेंगे कि अभी भी शहरों में लोगों को खासी परेशानी हो रही है l लोगों ने दुबारा लैंडलाइन का सहारा ले लिया है l फिर भी देश के लोगों ने सक्रत्मकता को अपना हथियार बना लिया है, अल्बर्ट आइन्स्टाइन की तरह, जिन्हें बचपन में पढने के तकलीफ थी, स्कूलों से कई दफा निकले गए, कॉलेज के दाखिला परीक्षा में वे फेल हो गए थे l पर लगन के पक्के थे, विज्ञान की उन गुत्थियों को सुलझाया, जिसे समझ पाना मुश्किल था l मेजर ध्यानचंद, जिनके जीवन में हॉकी का नामोनिशान नहीं था, पर जब सेना में भर्ती हुए, तब उन्होंने एक खेल चुनने के तहत हॉकी चुनी, और फिर जुट गए अभ्यास में और फिर नतीजा हम सभी के सामने है l  इस समय भारत भी एक स्वर्णिम युग के प्रारंभिक दौर में चल रहा है l आशा और निराशा दोने के साथ l चुनौतियाँ मुँह बाये खड़ी है, जिजीविषा और अदम्य साहस के साथ क्षुद्र और मंझले दर्जे के व्यापारी अपने काम को अंजाम दे कर देश के विकास में अपना योगदान दे रहें है l उसके हाथों को मजबूत करने की जरुरत है l उल्लेखनीय है कि 2010-12 की वैश्विक मंदी के दौर में भी भारत अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूती से बनाये रखने में सक्षम रहा l इसका मुख्य कारण था,भारत के छोटें और मंझले व्यापारी, जिन्होंने असंगठित मार्किट में स्थिरता बनाये रखी l
हम भारतीय मूलतः एक डरी हुई कौम है l हम शक्ति, सम्पदा सभी कुछ चाहतें है, स्टीवे जॉब्स और मार्क जुकेर्बेर्ग बनाना चाहतें है l पर किसी अनजाने डर से हम किसी के सामने भी अपने शक्ति दिखाने में डरतें है l इसलिए हम असमंजस में है l कभी प्राचीनता को अपनातें है तो कभी आधुनिक बनतें है l इस प्रपंच से निकल कर यथार्थ में चलना होगा, तभी हमारा कल्याण संभव है l इस शान्ति श्लोक का साथ अपनी बात ख़त्म करता हूँ –सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः,
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भाग्भवेत्।
ऊँ शांतिः शांतिः शांतिः (अर्थ - "सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।")
          

Friday, April 20, 2018


खेल कूद में भारत का उत्कृष्ट प्रदर्शन संभव हैं
राष्ट्रमंडल खेलों में जिस तरह का प्रदर्शन भारत ने दिखाया है, उससे तो यही लग रहा है कि आने वाले दिनों में भारत खेल की दुनिया में अपना परचम लहरा सकेगा l जिस भारत को कभी एक अदद पदक के लिए जूझना पड़ता था, वह 4 अप्रैल से 15 अप्रैल तक आस्ट्रेलिया में संपन्न हुए 21 वें राष्ट्रमंडल खेलों में कुल पदक तालिका में 66 पदकों के साथ, तीसरे स्थान पर रहा l खेल जगत के दिग्गज माने जाने वालें कनाडा जैसे राष्ट्र को पछाड़ कर उसने 26 स्वर्ण पदक हासिल किया है l इस एतिहासिक जीत से भारत में खेलों को एक नया उछाल तो मिल सकेगा ही, साथ ही में खेल प्राधिकरणों को भारत में विभिन्न खेलों की ट्रेनिंग और आधारभुत संरचना नए रूप से स्थापित करने का मौका मिलेगा l कुश्ती, निशानेबाज़ी, बॉक्सिंग और बैडमिंटन कुछ ऐसी स्पर्धाएं है, जिसमें सबसे अधिक पदक भारतीय खिलाडियों ने दिलवाएं l जिन खेलों में भारतीय खिलाडियों को नैसर्गिक कला हासिल थी, उन स्पर्धाओं में खिलाडियों ने आसनी से पदक हासिल कर लिया l ऐसा प्रतीत हो रहा है कि भारत में खेलें जाने वालें परंपरागत खेलों में भारतीय खिलाडियों को एक ऐसा हुनर हासिल है कि वे दुनिया भर के तेज धावकों को पीछे छोड़ सकतें है l गौरतलब है कि प्राचीन भारत में क्षत्रियों को शारीरिक विकास के लिए रथ दौड़, धनुर्विद्या, तलवारबाजी, घुड़सवारी, मल्ल-युद्ध, कुश्ती, तैराकी, भाला फेंक, आखेट आदि का प्रशिक्षण दिया जाता था। इसके अलावा अन्य वर्ग भी बैलगाड़ियों और दक्षिण में नौका की दौड़ में भाग लेते थे। हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो के अवशेषों से ज्ञात होता है कि ईसा से 2500-1550 वर्ष पूर्व सिन्धु घाटी सभ्यता में कई प्रकार के अस्त्र-शस्त्र और खेल के उपकरण प्रयोग किए जाते थे l छिपाछई, पिद्दू, चर-भर, चक-चक चालनी, दड़ी दोटा, गो, किकली (रस्सीकूद), मुर्ग युद्ध, बटेर युद्ध, गोल-गोलधानी, सितौलिया, अंटी-कंचे, पकड़मपाटी आदि सैकड़ों खेल हैं,जिनमें से कुछ का अब अंग्रेजीकरण कर दिया गया है। इनके अब कुछ अलग से अंग्रेजी नाम है, जिनकी प्रतिस्पर्धाएं अब अंतराष्ट्रीय स्तर पर होती है l कुछ खेलों को रद्दो-बदल करके एक नया रूप दिया गया है l घुड़सवारी, नौकाचालन, भला-फैक, शतरंज, कुश्ती, निशानेबाजी, आदि खेलों में भारत के लोगों को निपुणता तो हासिल थी ही, साथ ही अगर हम यह कहें कि इनका जन्म भारत में हुवा है, तब कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी l प्राचीन भारत में शारीरिक श्रम की प्रतिष्ठा थी, जिसके बल बुत पर भारत में उन खेलों को महत्त्व दिया जाता था, जिसमे शारीरिक कष्ट और श्रम होता था l कुश्ती एक ऐसा खेल था, जिसमे भारत को सदियों से महारत हासिल थी l इसमें भारत के नामी पहलवानों ने काफी नाम किया था l पर नए नियमों और एस्ट्रो टर्फ पर भारतीय खिलाडियों को खेलने नहीं आने की वजह से धीरे-धीरे भारतीय खिलाडी पिछड़ते चले गए l मणिपुर की तीन महिला खिलाडियों ने बॉक्सिंग और वेटलिफ्टिंग में स्वर्ण पदक झटक लिया है l मणिपुर की महिला खिलाडियों के पास बॉक्सिंग और वेटलिफ्टिंग में नैसर्गिक हुनर प्राप्त है, जिसे उन्होंने प्रदर्शित किया है l थांग-टा तथा सारित-साराक मणिपुर में प्रचलित प्रसिद्ध युद्ध कलाएँ हैं। मणिपुर की युद्ध कला थांग-टा मणिपुर की अति प्राचीन मार्शल आर्ट हुएन लाल्लोंगका परिष्कृत रूप है। छीबी गद-गा मणिपुर में प्रचलित प्रसिद्ध युद्धकौशल है। इसमें विजय प्राप्त करने के लिये शारीरिक बल की अपेक्षा कौशल महत्त्वपूर्ण होता है। खोंग खांजोई तथा लामजेई मणिपुर का एक अन्य प्रसिद्ध खेल हैं। मल्लखंभ जमीन से लगभग 9 पफीट की उफँचाई पर लकड़ी के खंभे पर खेला जाने वाला खेल है। वहां के लोगों ने इन्ही खेलों को खेल कर अपने शरीर की बनावट तो संजोया है l इसी तरह तीरंदाजी, चक्काफेक, भाला फैक, कुश्ती जैसे खेलों में युगों से भारत में निपुणता हासिल है, जिसके लिए अगर आधारभूत संरचना बनाई जाये, तब भारत खेल जगत का सिरमौर बन सकता है l मनुष्य के व्यक्तित्व के चहुँमुखी विकास में खेल-कूद की महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है। इनसे मनोरंजन तो होता ही है, शारीरिक क्षमता भी बढ़ती है। खेलों से स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की भावना उत्पन्न होती हैं जो समाज को जोड़ने में अपनी भूमिका निभाते हैं। खेल-कूद में उत्कृष्ट उपलब्धियों से राष्ट्र का सम्मान व प्रतिष्ठा बढ़ती है, लेकिन पुराने जमाने के खेल-कूद से अलग, आज के खेल अत्यंत प्रतिस्पर्धा वाले बन गये हैं। 1920 के दशक में प्रचलित हुआ मार्शल आर्टशब्द मुख्य रूप से एशिया में प्रचलित युद्ध के तरीकों तथा पूर्वी एशिया में जन्मे युद्ध के तरीकों के संदर्भ में था। मार्शल आर्ट को विज्ञान एवं कला, दोनों का मिश्रित रूप माना जाता है। केरल में प्रचलित प्रसि( मार्शल आर्ट कलारिपयट्टूको प्राचीन समय में वन्य-जीवों से अपनी रक्षा के लिये सीखा जाता था। कलारिपयट्टू के बहुत सारे लय एवं आसन जानवरों की मुद्रा एवं उनकी ताकत से प्रेरित हैं तथा उसके नाम भी उसी पर आधारित हैं। केरल के इस मार्शल आर्ट को विश्व का सर्वाधिक प्राचीन एवं सबसे वैज्ञानिक रूप माना जाता है। कलारिपयट्टू युद्धकला का प्रभाव भारतीय शास्त्राीय नृत्य कथकली में भी दिखाई देता है। ठोडा हिमाचल प्रदेश की प्रसिद्ध युद्ध कला है, जिसमें धनुष-बाण का प्रयोग होता है। गतका पंजाब के निहंग समुदाय के बीच प्रचलित युद्धकला है, जिसमें खिलाड़ी एक-दूसरे पर वार तथा बचाव करके अपने कौशल का प्रदर्शन करते हैं। मर्दानीमहाराष्ट्र का परंपरागत युद्ध कौशल है, जिसका विकास 15-16वीं शताब्दी में मराठा शासन के दौरान हुआ। पारीकदा युद्ध कला पश्चिम बंगाल एवं बिहार में प्रचलित है। इस युद्धकला की गतियाँ पशु-पक्षियों की गतियों पर आधारित होती हैं। कथी सामू तथा पाईका अखाड़ा युद्ध(कला क्रमशः आंध्र प्रदेश एवं ओडिशा में प्रचलित है।अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह में निवास करने वाली निकोबारी जनजाति के बीच दो प्रकार के खेल प्रचलित हैं- असोल आप और असोल ताले आप। निकोबार में होने वाली परंपरागत कुश्ती को किरिप कहा जाता है। सालदू भी यहाँ प्रचलित एक अन्य प्रकार की कुश्ती है। धोपखेल असम में रंगोली बिहू के अवसर पर खेला जाने वाला एक प्रसिद्ध खेल है, जिसमें 11-11 खिलाडि़यों की एक-एक टीम खुले मैदान में आसमान में उछाली गई गेंद को पकड़ने का प्रयास करते हैं। वल्लमकली केरल में प्रचलित प्रसिद्ध सर्प-नौका दौड़ है, जो ओणमके अवसर पर आयोजित की जाती है। हियांग तन्नाबा मणिपुर में प्रचलित प्रसिद्ध( नौका दौड़ संबंधी खेल है, जो लाई हराओबा उत्सव के अवसर पर आयोजित की जाती है। इन्सुकनावर मिजोरम में डंडे से खेला जाने वाला एक प्रसिद्ध खेल है, जिसमें सिर्फ पुरुष ही भाग लेते हैं। इस तरह से भारत के विभिन्न राज्यों में परंपरागत रूप से खेले जाने वाले खेल और कलाओं को अगर आधुनिक रूप दिया जाता है, तब उसका सीधा असर हमारे खेल की गुणवत्ता पर पड़ेगा l ख़ुशी का विषय है कि असम ने अपने यहाँ खेले जाने वाले परम्परगत खेलों को बढ़ावा देने के लिए आयोजन भी शुरू कर दिया है l आधुनिक उपकरणों, बुनियादी ढाँचे और परिष्कृष्ट वैज्ञानिक सहायता से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेल-कूद परिदृश्य पूरी तरह से बदल गया है। अत्याधुनिक खेल उपकरणों, बुनियादी ढाँचे और वैज्ञानिक सहायता की बढ़ती माँग को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने कई क़दम तो उठाये हैं, पर सरकारी लालफीताशाही और राजनीति ने सब कुछ गड़बड़ कर दिया है l अब वह समय आ गया है कि भारत अपने हुनर को पहचाने और देश के सभी भागों में खेल के बढ़ावे के लिए आधारभूत ढांचा तैयार करे, जिसे आने वाले दिनों में हम सबसे अधिक स्वर्ण प्राप्त कर सकें l