Friday, July 7, 2017

जीएसटी लागु होने के बाद का दृश्य
रवि अजितसरिया 

एचएसएन कोड बना एक बड़ी समस्या
देश भर में जीएसटी कर प्रणाली को लागु हुए एक सप्ताह हो गया है और व्यापरियों में एचएसएन कोड को लेकर और टेक्स स्लेब की जानकारी के अभाव में, भारी अफरा-तफरी सी मची हुई है l छोटे व्यापारियों को अभी भी नहीं मालूम की कौन सी आइटम कौन से स्लेब में जा रही है l व्यापारी इसके चलते अपना माल नहीं बेच पा रहें है l एचएसएन कोड को लेकर संशय इसलिए भी है क्योंकि एक ही तरह के दिखने वाले माल में अलग अलग एचएसएन कोड है, जिसके चलते कर भी लग-अलग है l एचएसएन कोड यानी सामंजस्य प्रणाली नामकरण(हर्मोनाइज्द सिस्टम नोमेंक्लेचेर) एक बहुउद्देश्य अंतराष्ट्रीय उत्पाद नामकरण प्रणाली है, जिसे विश्व सीमा सगठन ने विकसित किया है, परिभाषित है, जिसमे 5000 से अधिक सामान शामिल है, क़ानूनी और तार्किक पहलुओं को समझने के लिए बनाई गयी है l पूरी प्रणाली में सामानों का वर्गीकरण, सीमा कर के भाव और इनपुट क्रेडिट का पता चलता है, और गैर-दस्तावेजी डाटा इंटरचेंज में सहयोगी है l दुनिया भर में ये कोड निर्यात, आयत और वितरण के लिए इस्तेमाल किये जाते है l ये कोड दो, चार, छह और आठ डिजिट के हो सकतें है l भारत में ये कोड कोई भी जीएसटी इनवॉइस बनाने के समय अंकित करना आवश्यक है l अब एचएसएन कोड की पढाई, व्यापरियों को करनी पड़ेगी, नहीं तो भारी नुकसान होने की संभावनाएं है l अब व्यापरियों को कौन पढ़ायेगा, यह एक लाख टेक का प्रश्न है l ज्यादतर व्यापरियों का कहना है कि सरकार को व्यापरियों पर विश्वास करना होगा, जिसे चीजे आसानी हो जाएगी, और व्यापारी नई प्रणाली में आ कर कारोबार कर सकेंगे l इधर सरकार की तरफ से ऐसा कहा जा रहा है कि ऐसे व्यापारी, जो वर्षों से वेट के दौरान एक सिस्टम के तहत चल रहे थे, उनके लिए जीएसटी एक वरदान बन कर आयी है l यह इसलिए भी कहा जा रहा है क्योंकि जीएसटी के तहत पंजीकृत व्यापारी उन सभी सुविधाओं का लाभ उठा सकेंगे, जो उन्हें, पहले नहीं मिल रही थी l मसलन उत्पादन और बिक्री के उपर हो रहे खर्चे पर कोई इनपुट का नहीं मिलना, जो जीएसटी प्रणाली में मिल सकेगी l ठीक ऐसे ही उत्पादन के लिए खरीदी गयी प्लांट एंड मशीनरी और अन्य खर्चे जीएसटी के तहत क्लेम होना, ना सिर्फ उत्पादक को लाभ पहुचायेगा, बल्कि उसे उत्पादन शुल्क से छुट के साथ जीएसटी कर में भी इनपुट दिलाएगा l जीएसटी आने से सिर्फ इंडस्ट्री और कंज्यूमर को फायदा ही नहीं होगा बल्कि मालढुलाई भी 20 फीसदी सस्ती हो जाएगी। जाहिर है, इसका फायदा आम उपभोक्ता से लेकर लॉजिस्टिक्स इंडस्ट्री तक को होगा। यही वजह है कि लॉजिस्टिक्स इंडस्ट्री भी जीएसटी स्वागत कर रही है। अगर जीएसटी पूरी तरह से सफल रहा तो सबसे ज्यादा फायदा इंडस्ट्री को होने वाला है। क्योंकि जीएसटी युग में उन्हें अलग-अलग करीब 18 टैक्स नहीं भरने होंगे। टैक्स भरने की प्रक्रिया आसान हो जाएगी और टैक्स का बोझ भी काफी कम हो जाएगा। l ये  
सभी कागजी बातें अभी सुंदर लग रही है, पर व्यापरियों पर कितना अतरिक्त बोझ बढ़ जा रहा है, इसका अंदाजा तो व्यापारियों को खुद को ही है l बाज़ार में जीएसटी प्रणाली में शिफ्ट हुए व्यापारियों से पूछने पर पता चला कि वे जल्द से जल्द जीएसटी के तहत अपना कारोबार शुरू करना चाहतें है, जिससे वेट से जीएसटी प्रणाली में शिफ्ट होने के दौरान जो बिक्री का नुकसान व्यापारियों को हुवा, उस नुकसान की भरपाई हो जाये, चाहे इसके लिए अधिक कर भी देना क्यों ना पड़े l
जीएसटी में समस्याओं को ले कर बात करे, तब पाएंगे कि इस वक्त व्यापारी जुंझ रहा है, एचएसएन कोड को लेकर l सरकार ने हर वस्तुओं का एक कोड निर्धारित किये है, जिसके सामने कर के भाव निर्धारित किये गएँ है l छोटे व्यापारियों को दिक्कत यह है कि उन्हें अपने माल के कोड कौन बताएं l मान लीजिये, उनके अपने सप्लायर उन्हें बेचे गये सामान पर कोड बता भी दे, तब भी पुराने सामानों पर कोड ढूँढना घास में से सुई ढूंढने के बराबर है l बड़े व्यापारिक संगठनों को इस समय व्यापारियों की मदद के लिए आगे आना चाहिये, और एचएसएन कोड के अलावा, इनवॉइस के फॉर्मेट और इनवॉइस काटने के तरीके की बारीकियों के बारे में समझाएं l अभी व्यापारी इस उलझन में है कि पुराने पड़े हुए मेमो और इनवॉइस का क्या करें l इस बाबत भी सरकार ने कोई स्पष्ट निर्देश नहीं दिए है, जिससे तमाम तरह की बातें निकल कर आ रही है l हालाँकि, कुछ छोटे व्यापारियों ने अपने जीएसटी के नम्बरों की स्टाम्प लगा कर अपना व्यापार शुरू कर दिया है, पर असमंजस अभी भी जारी है l जीएसटी के विशेषज्ञ चार्टर्ड अकाउंटेंट ओ पी अगरवाला का कहना है की जीएसटी को लेकर जो बातें सरकार की तरफ से आई, वे सभी ठीक है, जीएसटी कानून एक वृहत और कारगार कानून है, पर जब उन बातों पर वस्तविकता का धरातल पर तोलते है, तब पातें है कि अभी ख़ुशी होने की कोई वजह दिखाई नहीं दे रही है l भारत में अभी भी निरक्षर लोगों की संख्या पढ़े लिखे लोगों से अधिक है l व्यापार के क्षेत्र में तो छोटे-मोटे व्यापरियों की संख्या करोडो में है, जिन्हें जीएसटी की एबीसी भी नहीं मालूम. ऐसे व्यापरियों के लिए समस्या आ सकती है l एक पंजीकृत व्यापारी के बिना कम्पुटर के चलना मुश्किल सा लग रहा है l उन्होंने एक उदहारण देते हुए समझाया कि जीएसटी के तहत सभी खरीद और बिक्री की प्रति-वस्तु डिटेल माह के अंत में दाखिल करनी होगी, जो बिना कम्पुटर के संभव ही नहीं l सरकार को एचएसएन कोड लेन की जल्दीबाजी नहीं करनी चाहिये थी l इससे मामला उलझ सा गया है l उन्होंने आशा की उम्मीद जताते हुए कहा कि अभी लोग एक ट्रेन में चढ़े है, दो चार स्टेशन के बाद ही लोगों को एडजस्ट होने में लग ही जायेगा l तब तक थोड़ा धैर्य रखें l गुवाहाटी के बड़े व्यापारियों ने अपने सिस्टम को जीएसटी व्यवस्था के तहत शिफ्ट भी कर लिया है और धड़ल्ले से माल बेच रहें है l यहाँ एक फायदा व्यापरियों को मिलने वाला है कि व्यापारी एकीकृत प्रणाली के तहत रजिस्टर्ड हो सकेगें, जहाँ उन्हें सर्विसे टेक्स के झंझट से मुक्ति मिलेगी और जीएसटी के तहत दिए गये कर का इनपुट मिल सकेगा l एक अन्य सबसे बड़ा फायदा व्यापारियों को इस वक्त दिखाई दे रहा है, और वो है, विभिन्न प्रकार के कागजों से मुक्ति l  
वेट प्रणाली में सी फॉर्म और अन्य कई तरह के फॉर्म व्यापारियों को दाखिल करने होते थें, जिनसे जीएसटी प्रणाली में मुक्ति मिलेगी l इधर सरकार ने अगले दो महीने तक जीएसटी के प्रावधानों को समझने के लिए व्यापारियों को रिटर्न भरने की छुट दी है, जिससे व्यापारियों ने राहत की सांस ली है l  

हाल ही में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि जीएसटी तमाम अडचनों के बावजूद, 1 जुलाई से उम्मीद से ज्यादा आसानी से लागू हो गया l पिछले दिनों खबर आई थी कि देश में आधे से अधिक लोगों जीएसटी के बारे में जानकारी नहीं है l एक सर्वेक्षण में देश के 3.6 लाख लोगों की राय ली गई, जिसमे यह पता लगा कि तेलुगू भाषी दो राज्यों आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के लोगों को जीएसटी के बारे में सबसे अधिक जानकारी है l इन राज्यों की 64 फीसदी आबादी को इस कर के बारे में पता है l जीएसटी के बारे में सबसे कम जानकारी तमिलनाडु के लोगों को है l असम में भी स्थिति बहुत ज्यादा उत्साहजनक नहीं दिखाई पद रही है l फिर भी यह साफ़ दिखाई दे रहा है लोग बहुत जल्द ही जीएसटी प्रणाली में शिफ्ट हो कर व्यापार करना चाहतें है l  

Friday, June 23, 2017

देश की सूरत बदलेगा जीएसटी
रवि अजितसरिया

इस समय देश के व्यापारियों के समक्ष एक परीक्षा की घड़ी है l क्योंकि ऐसा अनुमान है कि देश भर में एक जुलाई से एकीकृत कर ढांचा, यानी गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी ) लागु हो जायेगा, जिससे देश भर में आय कर को छोड़ कर सभी राज्यों के के विक्री कर, सेवा कर,  केन्द्रीय उत्पादन शुल्क, चुंगी, इत्यादि, एक सम्मिलित कर प्रणाली में शामिल हो जायेंगे और देश में दोहरे कर, बहु कर प्रणाली का अंत हो जायेगा l ऐसा माना जा रहा ही कि जीएसटी के आने से अधिकतर चीजों के भाव कम हो जायेंगे, पर जब तक वास्तविकता की धरातल पर, इन सभी स्थितियों को परखा नहीं जाएगा, कुछ भी कहना मुश्किल है l एक अनुमान अनुसार, देश भर में लगभग 30 करोड़ छोटे और माध्यम दर्जे के व्यापारी है, जो अलग अलग तरह के माल बेच्तें है l इनमे अधिकतरों के पास कम्प्यूटर और इन्टरनेट जैसी सुविधा नहीं है l नयी प्रणाली में अगर कोई भी व्यापारी अपने व्यापर के हिसाब से कर प्रणाली में आता है, तब उसको कर सलाहकारों के पास जाने के अलावा कोई चारा नहीं रहा गया है, जो छोटें व्यापरियों के लिए महंगा पड़ेगा l हालाँकि 10 लाख का व्यवसाय करने वालें व्यापारियों को कर प्रणाली से मुक्त रखा गया है, पचहतर लाख का टर्नओवर करने वाले व्यापारियों के लिए कम्पोजीशन स्कीम भी लागु करने का प्रावधान है l ज्यादातर व्यापारियों को अभी तक यह नहीं पता है कि उनके पास जमा पुराना स्टॉक को किस प्रकार नए कर ढांचे में समाहित किया जायेगा, जिससे ज्यादा कर देने कि सूरत में, उन पर दोहरी मार ना पड़े l पुराने स्टॉक पर दिया गए कर की वापसी के लिए जीएसटी में पर्याप्त उपाय किये गएँ है, पर अभी भी इस पूरी कवायद में कर अधिकारियों की क्या भूमिका रहेगी, यह किसी को समझ में नहीं आ रहा है l इस पशोपेश में देश में बड़े पैमाने पर विरोध भी शुरू हुए है, मसलन सूरत के कपडा व्यापारियों ने इसलिए विरोध किया हिया क्योंकि टेक्सटाइल पर शुरू से ही भारत में कर नहीं था, क्योंकि यह घरेलु और माध्यम, दोनों दर्जे के उद्योग है, जिस पर देश के करोड़ों लोग आश्रित हिया l इनमे वे लोग भी शामिल है, जो इन उद्योगों के लिए दलाली का काम करतें है, जिन्हें ऑर्डर-बुकिंग एजेंट, आढ़तिया, दलाल या कमीशन एजेंट कहा जाता है l ऐसे लोगों के लिए जीएसटी एक मुसीबत बन कर आई है l वर्तमान ढांचे में बिक्री शब्द के मायने अलग है, जबकि जीएसटी कर प्रणाली में बिक्री बोल कर कोई शब्द ही नहीं है l इसमें सप्लाई शब्द को अंतर्भुक्त किया जाया है, जिसमे एक जाने से दुसरे के पास सामान ट्रान्सफर होते ही जीएसटी को आमंत्रित करेगी l यह अभी साफ नहीं है कि इस नयी प्रणाली से उन सभी मध्यस्थकारियों को जीएसटी में पंजीकरण करवाना होगा और कर देना होगा या नहीं l अगर गौर से देखा जाये, तब पाएंगे कि ऑर्डर बुकिंग एजेंट, कोई माल बिक्री नहीं करता है, बल्कि एक कंपनी को दुकानदारों से मिलवा कर दोनों से मामूली कमीशन वसूलता है l इसमें दुकानदारों की पेमेंट की गारंटी एजेंट की रहती है l यह सिलसिला कपड़ा व्यवसाय में सालों से चल रहा है, जिससे लाखों परिवारों की रोजी-रोटी चल रही है l 
जीएसटी ने बिक्री शब्द को सप्लाई में बदल कर उसमे कई पेच डाल दिए है l एक जने के पास से सामान दुसरे जाने के पास क्या गया, जीएसटी लागु हो जाएगी, चाहे वह बेचने के लिए ट्रान्सफर हुवा है, या फिर आगे सुप्लाई के लिए लिया गया हो l देश भर के लाखों कपड़ा व्यवसाइयों का कहना हिया कि टेक्सटाइल और कच्चे माल पर कभी भी कोई कर देश भर में नहीं था, और हेंडलूम जैसे उद्योग को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से केन्द्रीय कर सीएसटी तक भी नहीं लिया जा रहा था l अब हेंडलूम व्यापारियों नयी प्रणाली में पंजीयन को करवाना ही पड़ेगा, साथ ही पांच प्रतिशत कर भी अदा करना पड़ेगा l कुछ का मानना है कि दलालों और एजेंटों के उपर सर्विस कर भी लगाया जा सकता है l इसमें धंधे की कोई सीमा भी नहीं है l इधर शहर के एक जाने-माने जीएसटी के विशेषज्ञ का मानना है कि दस लाख तक की सीमा एक ऐसी सीमा है, जिसमे छोटे और निम्न-माध्यम दर्जे के व्यापारी आ जायेंगे और बड़े आराम से व्यापार कर सकेगे, दस लाख का जो पंजीयन द्वार है, जिसको पार करने से ही जीएसटी का प्रावधान लागु होंगे l दस लाख की लिमिट में बुकिंग एजेंट, दलाल और मध्यथ्कारी भी आ जायेंगे l दस लाख के कमीशन के बाद वे पंजीयन करवाएं और मजे से क्रेडिट ले और कर का भुगतान करें l सेवा कर और उत्पादन शुल्क कर हटने से देश भर में आवश्यक वस्तुवों के कम से कम 12 प्रतिशत भाव कम होने का दावा सरकार जता रही है l इस दावे में कितना दम है, इसके पता तो आने वाले छह महीनों में लग ही जायेगा l कुछ व्यापारियों का यह भी दावा है कि जीएसटी के लागु किये जाने से सरकार को कुछ खास फायदा नहीं होगा, और व्यापारियों को भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ेगा l एक व्यापारी ने नाम नहीं छपने की शर्त पर बताया कि कला बाजारियों को रोकने के लिए अब तक सरकार ने जो भी कदम उठायें है, वे सभी बेकार साबित हुए है l इंस्पेक्टर राज बढेगा और भ्रष्टाचार बढने की भी संभावनाएं है l
जीएसटी पर अभी तक हुए सेमिनारों और कक्षाओं में व्यापरियों की जिज्ञासाओं का अंत अभी नहीं हुवा है l इसी डर से कि कही रह गए स्टॉक पर इनपुट ना मिले, व्यापरियों ने अभी बाजार से माल उठाना लगभग बंद कर दिया है l इधर ग्राहकों को ऐसा लगने लगा है कि जीएसटी के बाद जब भाव कम हो जायेंगे, तब वे सामान खरीदेंगे, इसलिए उन्होंने भी अपना हाथ खींच लिया है l इसका प्रमाण हमें तब मिलता है, जब हम कई बड़ी कंपनियों द्वारा ऑफर की और देखतें है, जो कुछ क्षेत्रों में पच्चास प्रतिशत तक है l
जीएसटी के प्रावधानों की और देखें, तब पाएंगे कि उत्पादन शुल्क और सेवा कर और राज्यों के विक्री करों को एक साथ सम्मिश्रित कर देश भर में एक कर लागु करके सरकार ने एक बड़ी छलांग लगाने का निर्णय लिया है l प्रावधानों के अमल के लिए हो सकता है कि शुरुवाती दौर में कुछ उलझनें आयें, पर यह तय है कि आवश्यक वस्तुओं के भाव गिरेंगे l अगर व्यापारियों को प्रथम दौ वर्षों तक प्रावधानों को समझने और अमल में लाने के लिए रियायतें दी जाती है और इन्सपेक्टोरों और अधिकारीयों द्वारा परेशान नहीं किया जाता है, तब यह तय है कि यह कानून देश की सूरत ही बदल देगा l       



Friday, June 2, 2017

पुरानी जिंदगी पर नई जिंदगी का बसेरा

शिक्षा के प्रचार प्रसार ने आम लोगों के जीवन में एक नई आशा का संचार किया है l अगर ऐसा नहीं होता तब दसवीं और बारहवीं के बोर्ड के परीक्षाओं में गावों और छोटे शहरों के बच्चें अच्छे नंबर ले कर शहर के बच्चो से आगे नहीं जातें l इतना ही नहीं, सर्वभारतीय स्तर की प्रतियोगितामुलक परीक्षा में भी श्रमिकों एवं कामगारों के बच्चों ने कामयाबी दिखा कर यह सिद्ध कर दिया है कि प्रतिभा सिर्फ बड़े शहर से ही निकल कर नहीं आती, बल्कि देश के उन छोटे शहरों में भी बसती है, जिनको अगर मौका दिया जाये, तब वे भी चमक कर सामने आ सकती है l इस बात की भविष्यवाणी पहले से की जा रही थी कि वर्ष 2017 कि परीक्षाओं के परिणाम चौकाने वाले होंगे, जिसमे गावों में रहने वालें दिहाड़ी मजदूरों, श्रमिकों की संताने, शहर में महंगे स्कूलों में पढ़ रहें बच्चों से अधिक अंक लेकर आयेंगे l और हुवा भी वही l जिलों और कस्बों में रहने वाले बच्चों ने दसवी और बारहवी के बोर्ड की परीक्षाओं में प्रथम बीस छात्रों ने स्थान पाया है l अब हर क्षेणी के अभिभावकों ने यह तय कर लिया है कि वे अपना पेट काट कर भी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलवायेंगे l देश की मीडिया इस समय गावों की और दौड़ लगा रही है और रोजाना बच्चों को खोज कर उसके अभिभावकों के जीवन चरित्र टेलीविजन के परदे पर दिखा रही है l लड़कियों ने भी इन दस वर्षों में लडकों से आगे निकल कर यह सिद्ध कर दिया है कि वे भी कुछ कर सकने की माद्दा रखती है l पिछले तीन वर्षों से सिविल सर्विस की परीक्षा में लड़कियों ने प्रथम स्थान प्राप्त किया है, जो साधारण परिवार से आती है l 2017 के सिविल सर्विसे के परिणाम में कर्नाटक की नंदिनी ने प्रथम स्थान अर्जित किया, जिसने दसवीं की परीक्षा कन्नड़ मीडियम के स्कूल से पूरी की थी l गावों के प्रतिशत शहर से उपर जा रहें है l इस सच से भी कोई नकार नहीं सकता कि अंक लाने की दौड़ में दिनोंदिन भारी प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है l जिनके 700 में से 690 अंक आ रहें है, वे सोचते है कि 10 नंबर कहाँ गए l जिनके कम अंक आ रहें है, वे इस बात से चिंतित है कि उनको कहा दाखिला मिलेगा l परीक्षाओं के परिणाम आते ही बच्चों के लिए ख़ुशी है तो नए दाखिले के लिए टेंशन भी है l इस दमघोंटू प्रतिस्पर्धा ने आजकल के बच्चों को बेहद मुश्किल में डाल दिया है l सौ में सौ अंक कुछ इस तरह से आ रहें है, मानों अंतरिक्ष में उड़ने जैसा आसान हो गया हो l एक समय तीस नंबर पास के नंबर होतें थे, जिसको पाने के लिए भारी जुगत लगनी पड़ती थी, आज सौ नंबर भी कम पड़ रहें है l सबसे परेशान करने वाली बात यह है कि नब्बे अंक प्राप्त करने वाले छात्र ख़ुशी मनाये या दुःख l क्योंकि उनको देश के अच्छे शैक्षणिक संस्थानों में नब्बे नंबर से दाखिला मिल पाने बेहद मुश्किल वाला कार्य है l देश की शिक्षा व्यवस्था में अंक महत्वपूर्ण रोल अदा करतें है l जिसको जितने ज्यादा अंक, उतने ही बड़ी ख़ुशी, फिर चाहे, छात्र कैसे भी अंक क्यों न अर्जित करें l उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए इस समय, ज्यादा से ज्यादा अंक लाने जरुरी है, जिससे छात्र को देश की नामी-गिरामी शैक्षणिक संस्था में दाखिला मिले सके, जिससे उसका भविष्य सुधर सके l इस दमघोंटू प्रतिस्पर्धा में आज का युवा पूरी तरह से उतर गया है,  
जिससे येन केन प्रकरण वाली प्रवृति छात्रों के मन में घर कर गयी है l शायद किसी अनजाने भय ने बच्चों और उनके अभिवावकों, दोनों की रातों की नींद हराम कर रखी है l फिर भी वे इस प्रतिस्पर्धा में भाग लेना चाहतें है l किसी किस्म का चांस नहीं, बस पढाई-पढाई l आज खुशहाली के मायने बदल रहे है, अभिभावक अपने बच्चो को हर क्षेत्र में अव्वल देखने व सामाजिक दिखावे के चलते, उनसे ज्यादा अंक लाने की मांग कर रहें है, जिससे उनका दाखिला किसी अच्छे कालेज में हो सके, और आगे जा कर वे किसी बड़ी कंपनी में नौकरी पा सके l पर कम अंक पाने वाले छात्रों के साथ यह एक दुविधा है कि वे कहाँ जाये, क्या कम अंक आने से शिक्षा लेने का अधिकार उनके पास से समाप्त हो जाता है ? यह प्रश्न आज एक यक्ष प्रश्न बन कर लोगों के दिल-दिमाग पर हावी हो रहा है l एक मनोवेज्ञानिक दबाब से आज का छात्र परेशान है l पूरी दुनिया में अब युवाओं ने व्यापार, आन्दोलन और राजनीति को बखूबी संभाल लिया है l यह इसलिए संभव हुवा है कि शिक्षा का व्यापक प्रचार-प्रसार हुवा है, जिससे रोजगार सम्मत शिक्षा व्यवस्था स्थपित हुई और युवाओं को एक नई मंजिल मिल गई l  
वे अब मुक्त मन से शिक्षा ले कर अपने भविष्य की और अग्रसर है l ज्ञान, कुशलता, आत्मविश्वास और व्यक्तित्व में सुधार करती शिक्षा, हमारे जीवन में दूसरों से बात करने की बौद्धिक क्षमता को तो बढ़ाती ही है, साथ ही परिपक्वता भी लाती है और समाज के बदलते परिवेश में रहना सिखाती है। यह सामाजिक विकास, आर्थिक वृद्धि और तकनीकी उन्नति का रास्ता है। इतिहास गवाह है कि उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों ने ना सिर्फ सामाजिक क्रांति की मशाल को संभाला है, बल्कि देश के लोगों के समक्ष आज आदर्श बन कर लोगों को प्रेरित कर रहें है l उच्च स्तर की दिमागी क्षमता रखने वाले युवा पूरी दुनिया में आज भारत का प्रतिनिधित्व कर रहा है l पूर्वोत्तर भारत के बीस युवाओं ने इस बार संघ लोक सेवा आयोग द्वारा संचालित सिविल सर्विस की परीक्षा पास की है l यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि प्राय सभी सफल प्रतियोगी साधारण परिवार से आतें है l इसके बावजूद भी, एक कटु सत्य यह भी है कि पूर्वोत्तर जैसे पिछड़े क्षेत्रों में रहने वाले लोग जीवन में आधारभूत आवश्यकताओं की कमी के कारण अभी भी उचित शिक्षा प्राप्त नही कर पा रहे हैं। वे आज भी अपने दैनिक जीवन की आवश्यकताओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। शिक्षा के क्षेत्र में आई जागरूकता ने सभी लोगों को बराबर मौका तो दिया है, पर संसाधनों की कमी ने अभी भी बेहद गरीब बच्चों को इसका लाभ लेने के लिए वांछित कर रखा है l देश में बेहतर वृद्धि और विकास के लिए प्रत्येक क्षेत्र में समान रुप से शिक्षा के बारे में जागरुकता लाने की आवश्यकता है।
लोग अपने जीवन में शिक्षा के महत्व और क्षेत्र के बारे में जागरुक हो रहे हैं और लाभान्वित होने की कोशिश कर रहे हैं। इस पूरी कवायद में समाज शास्त्रियों की एक बड़ी भूमिका है, जो लोगों को हर समय उचित मशविरा देकर उनको किसी अवसाद से बचाए, जिससे कठिन समय में भी वे कोई गलत कदम ना उठाये l  


Friday, May 19, 2017

दिल और दिमाग के संघर्ष में फंसा धर्म
रवि अजितसरिया
आरती लिये तू किसे ढूंढता है मूरख,
मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में?
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे,
देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में।(रामधारी सिंह दिनकर )

अभी देश में धार्मिक कानूनों और परम्पराओं पर उच्चतम न्यायलय की पांच सदस्यीय बेंच, ट्रिपल तलाक पर बहस कर रही है l इस बहस के शुरू होने से पुरे देश में धर्म और धार्मिक भावनाओं पर लोगों की अलग-अलग राय खुल कर सामने आई है l प्रगतिवादी जनता का यह मानना है कि भारत को अब धर्म और आस्था से निकल कर आगे जाना है जबकि रुढ़िवादी तबका धर्म को जीने का आधार मानता है l चाहे कोई भी धर्म हो, सदियों से भारत में धार्मिक अनुपालनाओं ने बहुसंख्यक समाज को प्रति पल जीवन जीने के गुर सिखाये है l जीवन जीने के गुर हम इसलिए कहते है क्योंकि हर धर्म मानवता के लिए बना हुवा है, जो शांति और संप्रिती का सन्देश देतें है l ना जाने कब से, धर्म और आस्था के नए स्वरुप को लेकर प्रगतिवादियों ने संग्राम किये, और धर्म के विरुद्ध जा कर अपने हिसाब से जीवन को संजोने की कौशिश की है l परम्पराओं के विपरीत जा कर एक नए धर्म की स्थापना भी अभी तक हजारों लोगों ने की है l ईश्वर और भगवान् को अनेको रूपों में धरती पर बसाने की चेष्टा भी की है l मानव ने अपने आप को भगवान् घोषित करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी है l धर्म गुरुओं ने भारत की सनातन परम्पराओं को जीवित रख कर एक सेतु का कार्य भी किया है l  भारत में, अगर देखा जाये, तब पाएंगे कि भारत एक आस्था प्रधान देश है, जहाँ लोग भगवान् को ढूंढने पहाड़ों पर कठिन यात्रा करतें है, और मन की शांति पातें है l मनुष्य को जब भी धर्म के विश्लेषणों जरुरत पड़ी, इन गुरुओं, दिगम्बरों और पैगम्बरों ने मानव को सही राह दिखाई है l
समय के परिवर्तन के साथ विचार धाराओं और आस्थाओं को मानाने वालों में, शिक्षा के व्यापक प्रचार प्रसार से, व्यापक परिवर्तन देखने को मिल रहें है l संभवतः दिल और दिमाग में एक गहरा संघर्ष इस समय भारतीय समाज के समक्ष चल रहा है, जिसमे राजनीति और आर्थिक कारण भी शामिल है l शायद यह एक परीक्षा की घडी है, जहाँ एक तरफ विज्ञान आधारित सुंदर धरती बसाने की कल्पना है जो तर्क विज्ञान सापेक्ष है और दूसरी और सदियों से चल रहे धार्मिक सिद्धांत, जो इस दुनिया के सञ्चालन का दावा करतें है l इस कठिन घडी में फैसला कुछ तर्कों और सिद्धांतों का हवाला दे कर नहीं हो सकता बल्कि मनुष्य के जन्म और उसकी सामाजिकता, उसके विश्वास को ध्यान में रख कर ही हो सकता है l  
इस बात को भी कोई नकार नहीं सकता कि समय समय पर धार्मिक मान्यताओं और परम्पराओं में विकृतियाँ आई है, जिससे धार्मिक आस्थाओं को मानाने वालों में कमी भी आई है l ये विकृतियाँ इस लिए आई है क्योंकि मनुष्य ने अपने स्वार्थ के लिए उन मुलभुत सिद्धांतों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया, जो मानवता के लिए अभिशाप साबित होने लगा l धर्म के उन मुलभुत सिद्धांतों, जो कभी मनुष्य के रहन सहन और सामान्य अचार-व्यवहार को संचालित कर रहें थे, वे अब मनुष्य के लिए अभीशाप बन गयें है l इतने सारे अंतर्विरोध कि प्रगतिवादी विचारधारा के लोगों को यह लगने लगा कि अब यह धर्म उनका धर्म नहीं है, बल्कि एक नए विचार के साथ, मुलभुत विचारों से बिलकुल भिन्न, एक खंडित धर्म उनके सामने पेश किया जा रहा है l ऐसे में अदालतों के समक्ष इस तरह के प्रश्न आने स्वाभाविक है, चाहे वह कोई भी धर्म के क्यों ना हो l इसके अलावा कर्मकांड और पाखंड में लिप्त धर्म ने बची-खुची आशा को भी धूमिल कर दिया है l धर्म के ठेकेदार ही धर्म के दुश्मन बन गये है l धर्म को बाज़ार में ला कर ऐसे खड़ा कर दिया गया कि लोग उससे दूर भागने लगे है l हिंदी फिल्म पीके और ओ माई गॉड कुछ ऐसी ही फिल्मे थी, जिनमे धर्म के स्वरुप पर बहस दिखाई गई है, जिसे लोगों ने पसंद भी किया है  l ऐसा भी नहीं है कि धर्म को मानने वालों की संख्या घटी है, पारिवारिक और सामाजिक कारणों से भी लोग धर्म में आस्था रखते है l दुनिया भर में अभी भी करोड़ों लोगो ऐसे है जो कोई भी धर्म को नहीं मानते l वे मानवता में विश्वास रखतें है l धर्म हमेशा से तर्क का विषय रहा है l कई लोग यह सवाल करतें है कि क्या धर्म के ना होने पर पृथ्वी पर मानवता ख़त्म हो जाएगी ? इस प्रश्न का जबाब, हालाँकि, कुछ भी सटीक नहीं है, पर धर्म मनुष्य के जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है l उसे एक ऐसी शक्ति की जरुरत है, जो उसे मुसीबत की घडी में धीरज और संबल प्रदान करें l धर्म यह सब कर सकता है, बेशर्त व्यक्ति पर वह थोपा नहीं जाए, बल्कि व्यक्ति स्वेच्छा से उसे अपनाये और उसके होने के अहसास में आनंद में डूब जाये l अगर ऐसा नहीं होता तब, लोग धर्म के बाहर अध्यात्म को नहीं तलाशते l उनकी जिज्ञाशाओं का कोई ठोर नहीं है l
धर्म कोई डराने की चीज नहीं है, बल्कि महसूस करने का भाव है l रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद, महर्षि अरविन्द और गाँधी जैसे महापुरुषों ने हमेशा से ही धर्म की आवाज को बुलंद किया, एक नई पहचान दी, जिसमे मानव धर्म भी शामिल था l इसलिए आज उनके करोड़ों अनुयायी है, जो धर्म की एक नई व्याख्या को समझने में सक्षम है l इसी भाव को भगवान् महावीर और बुद्द्ध ने भी समझा और मानव धर्म की स्थापना के लिए आध्यात्मिक धर्म की स्थापना की थी, जो विधि-विधानों के परे हो, धर्म गुरुओं के अधीन ना हो l पर ऐसा नहीं हुवा, मनुष्य ने अपनी सुविधा के लिए धर्म को कर्म-काण्ड और तमाम तरह की पूजा-अर्चना के माध्यम से ही पाने का रास्ता अपनाया, जो आज एक ऐसी अवस्था में पहुच गया है कि धर्म लोगों के आपसी भाईचारे का कारण नहीं बन कर, सामाजिक संकीर्णता पैदा कर रहा है l  
वेद उपनिषदों और अनेक धर्मों के धर्म ग्रंथों में निहित तत्वों को समझने के लिए उसे जीवन के यतार्थ और उस प्रभाव करने वाली क्रियाओं को एक साथ समझना होगा, ताकि हम अपने लिए एक ऐसे धर्म का चयन कर सके, जो हमें राह दिखने में सक्षम हो l किसी डर से किया गया ईश्वरीय कार्य, इंसान को मानसिक रूप से कमजोर बना देता है l
मनुष्य के जन्म और सभ्यता के विकास में धर्म का एक बड़ा रोल रहा है, इस बात को हम नकार नहीं सकते l सदियों से धर्म ने मनुष्य को नैतिकता का पाठ पढाया है l धर्म के प्रति आस्था रखने वाले लोग, पाषण युग में भी थे और आज इक्कीसवी सदी में भी है l आज हम एक मानव निर्मित पृथ्वी पर वास करतें है, जहाँ उसके कानून है, मान्यताएं है, जिनको मानना इश्वर को मानाने जैसा है l ईश्वर के होने की जड़े इतनी मजबूत है कि रुढ़िवादी ताकतें तमाम आचार संहिता लगाये, कल्पनाये गढ़े, पर आज का मनुष्य उन आंचार संहिताओं से उपर उठ एक गतिमान संसार का स्वप्न देख रहा है l जिस धर्म के लोगों ने अपने विकास की यात्रा में विज्ञान, समाज शास्त्र और मानवता को स्वंत्रता से अपनाया है, उस धर्म के लोगों ने विकास की नई बुलंदियों को छु कर, पूरी दुनिया पर राज किया है l  


Friday, May 12, 2017

सपनों के दुनिया में भारत का आम आदमी
रवि अजितसरिया

किसी भी बड़े शहर की खासियत होती है, गगनचुम्बी मकानों की लड़ी, चौड़ी-चौड़ी सड़कें जिसपर सरपट दौड़ती हुई लम्बी-लम्बी गाड़ियाँ, शहर हमेशा दुधिया प्रकाश में डूबा हुवा, खाने और रोजमर्रा के जीवन में जरुरत की अनगिनत दुकानें, हमेशा भीड़-भाड़ और हल्ला l भारत के बड़े शहरों में हर तरह से जिया जा सकता है l यानी कम और ज्यादा पैसों में भी l मसलन, कोलकाता जैसे शहर में बीस का नाश्ता मिल सकता है तो हजार का भी l हर इनकम ग्रुप के लिए इस शहर में जगह है l कुछ लोग कहतें है कि कोलकाता के मध्यमवर्ग के लोग आज भी एक संघर्षमय जीवन जीतें है l बड़ी सुबह काम पर लग जातें है, और देर रात तक काम करतें है l कोई बागड़ी मार्किट की बगल वाली तंग गलियों पर डोसा की दूकान लगता है, तो कोई चौरंगी की चौड़ी फुटपाथ पर पूरी-भाजी और भात का ठेला लगता है l सभी अपना कार्य इस बड़े शहर में इतनी खूबसूरती से करतें है कि दूर दूर से लोग शाम होते ही मैदान के पश्चिम कौने में स्थित विक्टोरिया मेमोरियल के सामने वाली सड़क पर चाट और आइसक्रीम के ठेले पर लोगों की भारी भीड़ दिखाई देती है l इसका अभिप्राय यह निकलता है कि भारत में अभी भी संघर्ष और जिजीविषा के बिना मध्यमवर्ग के लिए दो वक्त का खाना मयस्सर नहीं है l इस स्थिति का अगर विश्लेषण किया जाये, तब पायेंगे, कि भारत अभी भी माध्यम वर्गीय भारत है, विकसित या ऐसा कुछ भी नहीं है l ये जो बड़े शहरों में विकास की खनक जो हमें दिखाई देती है, वह सब एक मिथ्या है, छलावा है, पश्चिम को दिखाने के लिए, मोटे रूप में कहा जाये तब कहेंगे कि विदेशी मुद्रा जमा करने के लिए l हम अभी भी अंग्रेजी दासता से मुक्त नहीं हुए है l कुछ लोगों के पास इतना धन है कि समाये नहीं और कुछ लोग सड़क पर भूखे सोने पर मजबूर है l कुछ लोग इसी भारत में रहने के लिए इतने बड़े बंगले बना लेतें है कि उसमे एक दो हज़ार लोगो रह सकते है, और बहुतों के पास झोपडी तक नहीं l कहने के लिए यहाँ गरीबों के लिए सैकड़ों योजनायें चल रही है, पर आज तक उन योजनाओं के लाभ से भारत में गरीब कम नहीं हुए l सभी योजनाओं का लाभ उन लोगों को ज्यादा मिलता है, जो सुबह शाम पार्टी के कार्यालय की चोखट पर खड़े रहतें है l मानो,अंग्रेज साब को सलाम मारने के लिए, भारत के लोग पैदा हुए हो l कब मिलेगी ऐसे लोगों को सामंतवाद के दंश से मुक्ति l एक स्वप्न में जी रहें है भारत के लोग l हम आज भी एक पिछड़ा देश है l कुछ लोगो तो रोजाना पच्चास रुपये से भी कम कमातें है l अब कल्पना की जा सकती है कि ऐसे लोगो कैसे अपने परिवार का भरण पोषण करतें होंगे l उपर से राजनीतिक पार्टियों के नेता उन्हें सपने दिखा कर वोट वसूल लेतें है, और फिर वापस मुड़ कर भी नहीं देखतें l देश में सामान्य तंत्र कुछ ऐसा बना हुवा है कि आम लोगों की समस्या तंत्र को अपने आप दिखाई नहीं देती l कोई जब तक शिकायत नहीं करता, तंत्र जगता नहीं l एक-आध शिकायत से तो बिलकुल ही नहीं l यहाँ के कर्यकयों में जरुरत से ज्यादा कर्मचारी है, पर जब शिकायत करने सरकारी कार्यालय जावो, तब जबाब मिलेगा कि जिम्मेदार अधिकारी छुट्टी पर है, दुसरे दिन आईये l क्या कर्मरत अधिकारीयों को सड़क पर बुझी हुई स्ट्रीट लाईट और उससे सड़क पर पसरा हुवा अँधेरा अपने आप दिखाई नहीं देता ? उन्हें हमेशा शिकायत की जरुरत क्यों आन पड़ती है l अंग्रेजों द्वारा बनाये हुए तंत्र में उपर मंत्री, उनके नीचे सचिव, फिर कमिश्नर, फिर बाबु और फिर इंस्पेक्टर l हुए ना देख रेख के लिए आधा दर्जन सरकारी कर्मचारी, फिर भी शहर की स्ट्रीट लाईट बुझी हुई दिखाई देगी l गावों की बात ना ही करें तो अच्छा है l भारत में थ्री टियर सिस्टम में कही ना कही छेद हो गया है, जिससे वह चरमरा कर अनियंत्रित हो चला है l कभी कभी तो जिसकी लाठी-उसकी भैंस वाली कहावत यहाँ चरितार्थ होती दिखाई देती है l यदा-कदा अंधेर नगरी चौपट राजा, टका सेर खाजा और टका सेर भाजा वाली कहावत भी हमें याद आने लगती है l विवेकानंद, अरविन्द, गाँधी और लचित जैसी महान आत्मा हमें याद आती है, और हम कुछ उनकी तारीफ करतें है तो कुछ उनको दुबारा धरती पर आने के लिए आह्वान भी करतें है l जब जीने का यह संघर्ष असीम वेदनाओं और असफलताओं के बीच से गुजरता है, तब हममे से ही कुछ लोग टूट जातें है और विद्रोह करने लगतें है l यह सब इसलिए होता है, जब वर्त्तमान तंत्र अपना काम ठीक से नहीं करता, और असवेदनशील हो कर, अंग्रेजों की तरह वर्ताव करने लगता है l बड़े-बड़े भाषणों से आम आदमी का पेट नहीं भरता l रोजगार सृजन सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है l कब तक मनरेगा जैसी योजना से जनता की पेट भराई की जाएगी l कब तक सरकारी बाबुओं के एक बड़े तबके को मीटिंगों और राजनेताओं के स्वागत के लिए लगाये जाते रहेंगे l इस स्थिति से हमें जल्द निकलना होगा, नहीं तो इन परिस्थितियों में वास्तविक विकास कम से कम भारत में तो संभव नहीं है l जिस तरह से हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने एक आजाद भारत का स्वप्न देखा था, क्या वह यही भारत है l घोर गरीबी, आपधापी, अराजकता और अविश्वास l एक और अमीरी की पराकाष्ठा है और दूसरी और अभाव और जातिवाद की पराकाष्ठा, दोनों स्थिति इसी समाज में पल-बढ़ रही है, जिसका कोई ठोर दिखाई नहीं दे रहा है l इतनी सारी विषमताएं कि एक आम आदमी चैन से नहीं रह सकता l रोजाना योजनाओ का अम्बार लग रहा है,, पर गरीब तो गरीब ही है, उनके रहने का स्तर भी वही है l बिलकुल फणीश्वर रेणु कि बहुचर्चित पुस्तक मैला आँचल में वर्णित गावं मेरीगंज की तरह, जातिवाद का विभीत्स चहरा l जातिवाद की जड़े अब भारत में इतनी दिखाई नहीं देती, पर जातिवाद के तीखे तेवर अभी भी अपने पैर जमाये हुए है l

भारत एक असीम संभावनाओं का देश है l यहाँ के लोग बड़े आशावादी है, जिन्होंने हजारों वर्षों से कई सभ्यताओं के संघर्ष देखे और सहें है l नए भारत के विकास के लिए संकीर्ण राजनीति से उपर उठ कर जाति विहीन समाज का गठन करना होगा, नहीं तो सभी कोशिशें मंथर गति से चलेगी, जिससे समस्त उर्जाएं व्यर्थ हो जाने की प्रचुर संभावनाएं है l              

Thursday, May 4, 2017

मेरे राम का मुकुट भीग रहा है
 रवि अजितसरिया

“मोरे राम के भीजे मुकुटवा, लछिमन के पटुकवा
मोरी सीता के भीजै सेनुरवा त राम घर लौटहिं।
(मेरे राम का मुकुट भीग रहा होगा, मेरे लखन का पटुका (दुपट्‍टा) भीग रहा होगा, मेरी सीता की माँग का सिंदूर भीग रहा होगा, मेरे राम घर लौट आते)
उपरोक्त शीर्षक देश के महान लेखक, चिन्तक और ललित निबंधकार विद्यानिवास मिश्र के निबंध संकलन का है, जिसे आज इसलिए लिया गया है क्योंकि आज यह वाक्य अचानक प्रासंगिक और सामायिक हो गया है l चारों और राम नाम की गूंज सुनाई पड़ रही है, जिसे कुछ लोग धर्म से जोड़ रहें, तो कुछ उसकी राजनीति कर रहें है l कुछ उसकी खा भी रहें है l राम सिर्फ धर्म और आस्था के प्रतिक नहीं थे, बल्कि आदर्श शासन की प्रतिमूर्ति थे, जिसको लोकतंत्र का एक परिमार्जित रूप अगर कहे, तब कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी l बाल्मीकि रामायण में एक जगह लिखा है कि.. जब से राम का राम के रूप में अभिषेक हुवा है, तभी से अयोध्या में लोगों में एक नई स्फूर्ति दिखाई दे रही है, लोग स्वतः ही अपना-अपना कार्य कर रहे है..l विद्यानिवास मिश्र के निबंध में एक व्यक्ति के चिंतन के स्वरुप को राम के वनवास के समय के साथ जोड़ा गया है, जब राम बनवास गए थे, तब परिस्थितियों के उत्पन्न होने से हर पल को राम के बनवास के साथ जोड़ा जाता था l वे दुःख के क्षण हर पल मन को कचोटते थे l आज के भारत के प्रसंग में अगर यह कहा जाए कि राम के आदर्श राज की जबरदस्त मांग होने लगी है, तब कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी l भारतीय जनता पार्टी जब सन 2014 में पुरे दमखम के साथ दश में सत्ता में आई, तब कुछ इसी तरह के विचार लोगों के मन में उभर कर आये थे, एक नई आशा के साथ लोगों ने इस भगवा पार्टी को शासन पर बिठाया था l तब से आज तक, देश में हजारों बदलाव हुए, कड़े निर्णय लिए गए, तब भी लोगों ने पार्टी का साथ दिया है l उत्तर प्रदेश इसका जीता-जाता उदारहरण है l आर्थिक क्षेत्र में सरकार ने इन तीन वर्षों में अप्रत्याशित प्रगति की है l उसका सकल घरेलु उत्पाद तेजी से बढ़ कर दुनिया के कई प्रगतिशील देशों से आगे है, भारत विश्व की पांचवीं बड़ी आर्थिक महशक्ति बनने कि कागार पर है l उसका विदेशी मुद्रा भण्डार 370 बिलियन डॉलर तक पहुच गया है l देश में लगातार नए प्रकल्पों की घोषणाएं हो रही है l आगामी 1 जुलाई से देश में नया कर ढांचा जीएसटी के आने से विभिन्न स्तर पर लगने वाले कर पर रोक लगेगी, जिससे एक ही भाव में देश में सामान मिलने लगेंगे l इसमें कोई शक नहीं है कि देश बदल रहा है l देश के लोगों के चहरे पर ख़ुशी दिखाई दे रही है l इसका जीता-जाता उदहारण है, चुनावों में भाजपा की जीत l अगर ऐसा नहीं होता तब हाक ही के दिल्ली के निकाय चुनाव में आम आदमी पार्टी जीतती l  

मगर जिस तरह से आर्थिक क्षेत्र में सरकार ने तेजी दिखाई है, उससे आने वाले दिनों में लोगों के जीवन यापन में बढ़ोतरी निश्चित रूप से दिखाई देगी l पर आंतकवाद के मुद्दे को जिस तरह से संभाला गया, उससे घरेलु आंतक और सीमा पर आंतक, दोनों बढ़ गया है l ऐसा माना जा रहा था कि सरकार सख्ती दिखा कर देश से आंतकवाद नाश कर देगी l पर ऐसा नहीं हुवा l देश में आन्तरिक आंतकवादी हमलों में हमारे जवान मर रहें है, सीमा पर पाकिस्तान हमारे जवानों के शवों के साथ दरिंदगी दिखा रहें है l कश्मीर में सेना पर लगातार छात्र पत्थर फेक रहें है l तब शहीद जवानों की विधवाओं को सीता मय्या की मांग भींगती हुई नजर आती है, राम का मुकुट भींगते हुए नजर आता है l जब शहीद जवानों के बच्चे रोते बिलखते हुए सरकार से बदले की कार्यवाई की मांग करती है, तब उस समय तो सरकार कह देती है कि जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जायेगा, बदला लिया जाएगा, पर ऐसा नहीं होता, घटना के कुछ ही दिनों बाद, पहले वाली घटना जैसी एक नई घटना दुबारा घट जाती है, मनो देश में खुफिया विभाग विफल हो गया हो l असम के सन्दर्भ अगर देंखे, तब पायेंगे कि भाजपा सरकार शासन आये हुए अब एक वर्ष होने को है l जैसा की 2014  में देश में भाजपा पुरे दमखम के साथ आई थी, ठीक वैसा ही माहोल असम में भी 2016 के समय दिखाई दे रहा था l खास करके हिंदी भाषियों के मन में एक नया उत्साह दिखाई दे रहा था, कि राज्य में एक ऐसी पार्टी सत्ता में आई है, जिसने हमेशा से ही हिंदी भाषियों का साथ दिया, वह हिंदी भाषियों की सुरक्षा और अश्मिता के प्रति संवेदनशील होगी l भ्रष्टाचार के मामले में सरकार ने कुछ बड़ी कार्यवाही करके, राज्य के लोगों के मन में विश्वास जमाया है l अभी राज्य की भाजपा कार्यकारिणी में 11 हिंदी भाषियों कों लेना इस बात का गवाह है कि भाजपा हिंदी भाषियों के प्रति संवेदनशील और सजग है l पर जब हम अख़बारों की सुर्ख़ियों कि और देखतें है तब पातें है कि राज्य के हिंदी भाषियों को राज्य में कानून-व्यवस्था को लेकर भारी आक्रोश और रोष है l तब, यहाँ के हिंदी भाषियों को राम का मुकुट भींगता हुवा नजर आता है, लक्ष्मण का पटुवा भींगता हुवा नजर आता है l पूर्वोत्तर में वास करने वालें लाखों हिंदी भाषियों की जान-माल की सुरक्षा का जिम्मा सरकार पर है l पूर्वोत्तर में रोजगार कर रहें व्यापारियों को अगर खुले मन से व्यापार के लिए प्रोत्साहित किया जाये, तब यह तय है कि पूर्वोत्तर में विकास कि एक नई बयार बहने लगेगी, और जब सर्वांगीण विकास होगा, तब यहाँ के स्थानीय लोगों में भी एक नए उत्साह का संचार होगा l दिल्ली के प्रति पूर्वोत्तर का नजरिया सकरात्मक होगा और उन्हें विश्वास होगा कि भारत में विकास की बयार किस और से बहती है l इस भ्रम को झुठलाया जा सकता है कि दिल्ली से ही विकास की हवा बहती है, जो पूर्वोत्तर राज्यों के पास पहुचते-पहुचते धीमी गति हो कर रुक सी जाती है l असम अपने दमखम पर खड़ा हो सकने में सक्षम है, बस कड़ी राजनैतिक इच्छा शक्ति की जरुरत होगी l   
अनादि काल से हम अपने देश में रामराज्य के बारे में सुनते आ रहे हैं। हर युग में जनता रामराज्य के आने के स्वप्न देखती आई है। रामराज्य का मतलब है, राम जैसे पुण्यपुरुष के शासन में होने वाला राज्य । राजा यदि राम जैसा महायोगी होगा, तभी ऐसा राज्य धरती पर हो सकता है,जिसकी कल्पना लोग आज कर रहें है । अभी देश के लोग, वर्तमान शासन से बड़ी अपेक्षा लगाये हुए है l उनको, शासक की बुद्धिमत्ता, विचारधारा और निर्णयों पर पूरा भरोसा है l   



Wednesday, April 26, 2017

चमचमाते बाज़ार का साइड सिंड्रोम  
रवि अजितसरिया

इस समय भारत का सभ्य समाज अपने जीवन के एक सबसे जरुरी उपक्रम शादी और वैवाहिक अनुष्ठानों के आयोजनों को लेकर बेहद परेशान नजर आ रहा है l खासकरके, शादी के दौरान होने वाले खर्चे को लेकर l इस पूरी कायावाद में आधुनिक सोच लोगों पर एक मनोवैज्ञानिक दबाब डाल रही है, जिससे ऐसे आयोजन एक दिमागी खेल की तरह हो गए है, जिसमे दोनों पक्ष अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च करने के लिए उतावलापन दिखातें हुए नजर आते है l ऐसा माना जा रहा है कि बदलते दौर में अब कम बजट की शादी का आयोजन करना बेहद मुश्किल काम हो चला है, जिससे माध्यम दर्जे और निम्न माध्यम दर्जे के लोगों की मुश्किलें बढ़ गयी है l आज ऐसे लोग, एक तनावग्रस्त जीवन जी रहें है l शादी के दौरान होने वाली रस्मों का निभाने में जो आधुनिकता का तड़का आया है, वह दोनों पक्ष के लिए एक मुश्किल का सबब बन गया है l इसे हम चमचमाते बाज़ार के साइड सिंड्रोम कहते है l आधुनिक शादी में देर रात तक फेरों का टलना, इस बात का गवाह है कि वर और उसके पक्ष के लोग, फेरे से पहले सभी तरह के छद्म आनंद की दुनिया में डूब कर वह सब पा लेना चाहतें है, जिसकी चाह उन्होंने कभी की होगी, मानो पूरी गाथा इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाये, और वे एक प्रशंसा के पात्र बन जाए l हर पहलु में आधुनिकता, कुछ नयापन, क्षणिक सुख, जिसकी चाह एकाएक पनपती है, एक मृगमरीचिका जैसी, वह शादी जैसे आयोजन में दिखाई देने लगी है l जो एक आम शादी को एक महँगी शादी में बदल कर दोनों पक्षों के लिए परेशानी पैदा करती है l शादी मात्र एक रश्म ही नहीं, बल्कि उस नए रिश्ते को निभाए जाने के लिए एक संकल्प है, जिसे दो जने लेतें है l भारतीय सामाजिक अचार संहिता और रिवाज कुछ ऐसे है कि भारतीय शादी मात्र दो जनों का संबंध नहीं बल्कि दो परिवारों के बीच रिश्तेदारी है, जिसे जन्मो तक निभाना पड़ता है l कुछ दाम्पत्य सूत्र, जिनके अपने दर्शन होतें है, जिनके अपने तर्क होतें है, वें सूत्र गहनता के बीच एकाएक जीवंत लगने लागतें है, जिन्हें निभाने के लिए दो परिवार प्रस्तुत होतें है l इसी परंपरा को निभाने ले किये, शादी जैसे आयोजन, जिसे आजकल महोत्सव का रूप दे दिया गया है, दोनों पक्ष अपनी हैसियत से आगे जा कर आयोजित करतें है l कुछ सामाजिक शर्म और कुछ आत्मीय संतुष्टि के लिए तो कभी एक पक्ष के जिद के लिए l दोनों पक्षों के रिश्तेदारों की एक बड़ी फौज को एकाएक स्वयं कुछ अधिकार प्राप्त हो जातें है, जो अक्सर आयोजकों को मीठी-मीठी गुदगुदी भरे अनुभव दे जातें है l संवादों की मुखर दुनिया,सम्प्रेषण की कला, बढ़ता मीडिया का असर हमारें इर्द-गिर्द एक व्यू रचना किये हुए है l इधर सुंदर, सप्राण, जीवंत गुणों को आत्मसात करके, एक नई दुनिया रचने को आतुर, हमारा सुंदर मन, हर पल खुशिया चाहता है l इस चढ़े परवान के लिए हम खुशियाँ मनातें है l  यह भी एक कटु सत्य है कि जीवन की आप धापी के बीच, ऐसे अयोजनों को आयोजित करना अब एक जने की बस की बात नहीं रह गयी है l उसे वैवाहिक आयोजक(इवेंट मेनेजर) की जरुरत पड़ने लगी है,  
जो उसके सारे कार्य निबटा कर उसको सरदर्दी से मुक्ति दिला सकता है l बस आयोजक को पाकेट ढीली करने की आवश्यकता रहती है l कार्ड की छपाई से लेकर कर टेंट और डिजायन तक, सारे कार्य इवेंटवालें लोग निबटा सकते है, बशर्ते उसे सभी कार्यों के लिए ठेका दे दिया जाए और चैन की नींद सोये l बड़े महानगरों की तर्ज पर इस समय असम में भी इस तरह के इवेंट मैनेजमेंट ग्रुप सक्रीय हो कर यह दायित्व निभा रहें है l पर, इससे शादी के आयोजन पर लोगों का खर्च पहले से कई गुना बढ़ गया है l यहाँ एक बार और महत्वपूर्ण है कि बाजारवाद की चाशनी में डुबो कर रस्मों को महंगा बनाया जा रहा है, जिसका सीधा असर आयोजकों की जेब पर पड़ रहा है, और दोनों पक्षों में से किसी को कुछ भी हाथ नहीं आता है l   
फिजूलखर्ची और अनावश्यक दिखावे को लेकर सैकड़ो लेख लिखे जा चुके है, सभाएं की जा चुकती है, पर ज्यो-ज्यो दवा दी गई, मर्ज बढ़ता ही गया, वाली तर्ज पर, समाज में आयोजनों में फिजूलखर्ची बढती चली गयी l अब तो आलम यह है कि छोटे से छोटे आयोजनों में भी मार्केटिंग वालें लोगों को आयोजन सफल करने के लिए लगाया जाता है l आयोजन की सफलता के लिए मेजबान अपनी पूरी ताकत लगा देता है, चाहे, उसका एक नकारात्मक प्रभाव समाज पर क्यों ना पड़ रहा हो l इस समस्या से माध्यम वर्ग और निम्न-माध्यम वर्ग बुरी तरह से जुंझ रहा है l फिजूल-खर्ची और आडंबर का प्रभाव शादी विवाह पर सबसे ज्यादा पड़ा है l हमने कई शादियों को लेन-देन की भेंट चढ़ते भी देखा है और कई शादियों को शादी वाले दिन से ही असफल होते भी देखा है l इस समस्या को लेकर न जाने कितनी बार हमारी सामजिक और प्रतिनिधि संस्थाएं समाज में बैठकें और सभाएं कर, इस विषय पर प्रस्ताव भी ले चुकी है, पर हर बार इन सब का कोई नतीजा समाज में नहीं निकलता है l समाज में इन तथा-कथित उत्सवों की वजह से लोगों के जीवन में जब तूफ़ान आने लगे है l अब समय आ गया है कि हम अपने आप को बदले और शादी-विवाह जैसे शुद्ध और पवित्र आयोजनों पर बाजारवाद से निकले हुवे लोक-लुभावन प्रभाव को तो ना थोपे, और इसकी पवित्रता को बनाये रखे, जिससे शादी पवित्र रस्म अपनी सफलता के सोपान तय करे l समाज में बढ़ते तालक और विवाह विच्छेद के मामले बढ़ने से समाज-शास्त्रियों की चिंता इसलिए भी बढ़ी है कि कही अधिक महत्वाकांक्षाएं तो इन शादियों के सफल होने के मार्ग में तो नहीं आ रही है l पर अनेक मामले और अनेक कारण l  

अगर समाज के सभी घटक एक साथ बैठ कर फिजूल खर्ची और दिखावे के रोकथाम के लिए निर्णय लेवे तब शायद कुछ बात बन जाये l समाज की प्रतिनिधि संस्था इस कार्य के लिए अग्रणी भूमिका ले सकता है l सवाल यह भी नहीं की अमुक आयोजन में इतनी आयटम होनी होनी चाहिये, अहम् सवाल यह है कि फिजूलखर्ची और दिखावे वाली मानसिकता को कैसे बदला जाये l सोच के बदलने से परिस्थिति स्वयं बदल जाएगी, ऐसी उम्मीद की जा सकती है l

Friday, April 21, 2017

हिंदी का अपमान या असमिया का
रवि अजितसरिया


पिछले दिनों असम में दो बड़ी घटनाओं की चर्चा सर्वत्र रही, जिसको राष्ट्रिय मीडिया ने गौर देखा और विचार मंथन भी किया l पहली थी, गुवाहाटी के नूनमाटी के बिहू उत्सव के दौरान असम के लोकप्रिय असमिया गायक जुबिन गर्ग को हिंदी गीत गाने से रोका जाना और दूसरी इस घटना के ठीक तीन दिनों बाद असम में संयुक्त हिंदी सलाहकार समिति की बैठक का होना और उस बैठक में केन्द्रीय मंत्री एम् वन्कैया नायडू और असम के मुख्यमंत्री सर्वानन्द सोनोवाल द्वारा एक साथ यह कहना कि देश के विकास के लिए राष्ट्रभाषा एक महत्वपूर्ण माध्यम है l मुख्यमंत्री सर्वानन्द सोनोवाल ने सभी से हिंदी सिखने की अपील भी की  है l दरअसल में हिंदी के राष्ट्रभाषा होने से देश भर में हिंदी के विकास और उपयोग के लिए बनी समितियां और भाषा परिषदों ने आपने काम ठीक से नहीं किये है l नहीं तो, हिंदी के साथ क्षेत्रीय भाषाओँ का भी ठीक उसी तरह से विकास हो जाता, एक संयुक्त परिवार की तरह, जहाँ कम-ज्यादा जानने और करने वालें, हर तरह के सदस्य, छोटे से बड़े हो जातें है, और अपनी राह पा ही लेतें है l लेकिन स्थिति यह है कि देश के दक्षिण और पूर्व भाग में हिंदी के उपयोग को लेकर भारी मतभेद है l एक तरफ स्थानीय भाषा का उपयोग और उसकी महत्ता, उसका जुड़ाव, माध्यम और दूसरी और हिंदी एक संपर्क भाषा का होना l कितना विरोधाभास प्रतीत हो रहा है l दरअसल में, हिंदी को जानने और पढने वालें लोगों को हमेशा से ही देश की अन्य भाषा और उसके साहित्य के प्रति भी उतना ही अनुराग रहा है जितना की हिंदी के प्रति उनका लगाव है, बस शर्त एक ही है कि देश कि प्रादेशिक भाषाओँ के साहित्य को हिंदी में अनुवाद कर उसको राष्ट्रिय पटल पर रखा जाये, ताकि हिंदी पट्टी के लोग भी उस समृद्ध भाषा की मिठास का अनुभव कर सकें l रविंद्रनाथ ठाकुर को अपनी रचनवाली ‘गीतांजलि’ के लिए नोबेल पुरस्कार ही तो मिला था, जो उन्होंने बंगाली में ही तो लिखी थी l बाद में उसका अनुवाद अंग्रेजी(मतभेद अलग करते हुए) और अन्य भाषा में हुवा, तब जा कर पूरी दुनिया की नजर उस पर पड़ी l इस तरह से क्षेत्रीय भाषाओं को विश्व पटल पर ले जाने के लिए उसका अनुवाद होना अत्यंत जरुरी है l हिंदी यह काम आसानी कर सकती है, अनुवाद, पहचान और स्थापना, तीनों काम एक साथ l असम के मामले में अगर देंखे, तब पाएंगे कि जिन्होंने ने भी राष्ट्रिय पटल पर ख्याति प्राप्त की है, उन्होंने, हिंदी की और रुख किया और अपने असमिया गीतों को हिंदी में अनुवाद कर उनको राष्ट्र के सामने पेश किया l सुधाकंठ भूपेन हजारिका एक अन्यतम उदारहण है, जिन्होंने अपने गीतों को हिंदी में अनुवाद कर पुरे देश में अपना नाम किया l सुधाकंठ का गीत दिल हम हम करें, आज भी लोग अनायास ही गुनगुना लेतें है l क्या इससे हमे आनंद की अनुभूति नहीं होती ? जुबिन, अंगराग महंत जैसे गायकों का समूचे देश में एक सुनाम है, जिन्होंने असमिया गीतों को असम की चाहरदीवारी से बाहर ले जा कर, एक अलग राग बनाई हैं l उन्होंने लगभग हर भाषा में गीत गायें है l अंगराग के कोक स्टूडियो में गाये  
हुए टुकारी गीतों को आज लोग इतना पसंद कर रहें है कि उनकी मांग पुरे देश में है l हाल के बिहू का मौके पर उन्होंने मुंबई में कई कार्यक्रमों में मुंबई के श्रोताओं का सामने असमिया गीतों की झड़ी लगा दी, जिसे वहां उपस्थित जनता ने तालियाँ बजा कर, पेश किये हुए बिहू नृत्य और गानों को सराहा l यह असमिया भाषा और गीत संगीत की जीत थी, उस गायक की विजय थी, जिसने असमिया गीतों को बड़े मंच पर ले जार कर पुज्वाया l यहाँ एक बात और सिद्ध होती है कि गीतों कि कोई भाषा नहीं होती l अगर गौर से पंजाबी गीतों की और देंखे, तब पायेंगे कि उस भाषा और राग के गीतों की धुनें हमें देश के किसी भी कोने में हर कभी सुनाई पड़ जाएगी l किसी भी समारोह में पंजाबी गीतों की मांग हमेशा रहती है l पंजाबी गीतों पर युवा सबसे ज्यादा थिरकतें है l क्या इससे पंजाबी भाषा और अधिक मजबूत होती नहीं दिखाई देती l हालाँकि इस बात पर मतभेद है कि जुबिन गर्ग ने जब करार किया था, तब उसे तोडना नहीं चाहिए था l यात्रा वृतांत लेखक सांवरमल सांगनेरिया ने असमिया वैष्णव धर्मगुरु श्रीमंत शंकरदेव को विश्व दरबार में पहुचाने का कार्य किया है l ऊन्होने गुरु के उपर 450 पृष्ठ की एक पुस्तक हिंदी भाषा में लिख कर, सम्पूर्ण भारतवर्ष को इस संत के बारे में बताया ही नहीं बल्कि इस पुस्तक के माध्यम से असमिया जाति, संस्कृति और चरित्र का एक ठोस परिचय हिंदी पट्टी के लोगों के सामने रखा है l इतना ही नहीं उनकी पुस्तक का मलयालम और मराठी अनुवाद भी हो चूका है l उनकी इस पुस्तक पर मुंबई विश्वविद्यालय पर छात्र शोध कार्य कर रहें है l यह सब इसलिए संभव हुवा, की उन्होंने असम को अपना कर्म क्षेत्र बनाया, नहीं तो वे भी मुंबई में बड़े आराम से बस कर अभी तक राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार प्राप्त कर रहे होतें l पर एक असमिया की भांति उन्होंने ज्योति प्रसाद अगरवाला के बारे में पुस्तक लिख कर पुरे भारत वर्ष में इस सांस्कृतिक के बारे में विस्तार से बताया l मलयालम भाषा में उनकी श्रीमंत शंकरदेव पर लिखी हुई पुस्तक का अनुवाद सिर्फ इसलिए हुवा क्योंकि देश के इस महान संत के बारे में लोग जानना चाहते है l इस तरह से भारतवर्ष में अंगराग और जुबीन आज जाने जातें है, तब उससे असम का नाम उज्जवल होता है, जिससे असमिया गीत और संगीत को मान्यता प्राप्त होती है l इसमें कही भी दो राय नहीं है कि असम प्रदेश में हिंदी बोलने और समझने वालों की तादाद बड़ी है, जिसका मुख्य कारण है, पिछले कई वर्षों से असम का सर्वभारतीय मुख्यधारा में शामिल होकर एक अपनी पहचान बनाना l असम के मुख्यमंत्री सर्वानन्द सोनोवाल और वित्त मंत्री हिमंत विश्व शर्मा का नाम पुरे भारतवर्ष के लोगों की जबान पर है l यह इसलिए संभव हुवा कि असम उन रुढ़िवादी बेड़ियों से निकल कर, एक नए क्षितिज पहुचने को आतुर है l यहाँ भाषा अब आड़े नहीं आयेगी l असमिया सार्वभौमिकता की रक्षा करना, हर असमियावासी का नैतिक धर्म है, जिसके लिए यहाँ कई आन्दोलन हुवें है l असमिया बिहू मंच पर अगर असमिया पारम्परिक गीत अगर गाने है, तो इसमें हर्ज ही क्या है l बस जरुरत इस बात की है कि इस पूरी कवायद में कोई दूसरी भाषा का अपमान ना हो l इस सुचना क्रांति के समय में पूरा विश्व एक नजर आ रहा है l ओनलाईन  

कम्युनिटी ग्रुप, सोसिएल मिडिया जैसी जगहों पर सगज राजनेता और फिल्म अभिनेताओं को आम लोगों से सक्रीय रूप से जुड़े हुए रहने के लिए उनसे वार्तालाप करना रहता है, जिसमे भाषा कही भी आड़े नहीं आती l यहाँ उन्माद के लिए कोई जगह नहीं है l बस, जैसा कि ऑस्कर वाइल्ड ने लिखा है कि दुनिया में केवल व्यक्ति रहते हैं और समाज उनके मन में...सूचना क्रांति का हिस्सा बनने की जरुरत है, ना कि उससे किनारा करने की l अपने संस्कारों की जड़ों को सींचने के लिए युवाओं में बोध करवाने की जिम्मेवारी भी हमारी है l हमें अपने संस्कारों में जीवंतता घोलनी होगी ना कि शुष्कता l संक्षेप में अगर कहे, तब कहेंगे कि दुःख कि इस धरती पर आंनद का राग हमेशा गूंजता रहे और बिखरते रहे उत्सवों और त्योहारों का रंग, जिससे समस्त मानवजाति अपने दुःख और वेदनाओं को कुछ समय तक भूल कर आनंद में सराबोर हो जाये l